सूचना : वार्षिक सेमिनार

‘नागरिक’ पाक्षिक की ओर से इस वर्ष वार्षिक सेमिनार का आयोजन वाराणसी में किया जा रहा है। सेमिनार का विषय ‘बदलता मीडिया एवं जनसरोकार’ है। 
    

आजाद भारत में वैसे तो मुख्यधारा का मीडिया मजदूर-मेहनतकश जनता के हितों के बजाय शासक वर्ग के हितों को ही समर्पित रहा है। पर बीते 10 वर्षों के फासीवादी पार्टी के शासन में यह मीडिया जन सरोकारों से पूरी तरह कट चुका है। ऐसे में जनता के मुद्दों को समर्पित जनपक्षधर मीडिया को खड़ा करने की चुनौती और बढ़ जाती है।
    

‘नागरिक’ पाक्षिक सभी पाठकों-शुभेच्छुओं से इस सेमिनार को सफल बनाने में हर तरह के सहयोग का आह्वान करता है। 
            

सम्पादक
‘नागरिक’ पाक्षिक

कार्यक्रम : का. नगेन्द्र स्मृति वार्षिक सेमिनार
दिनांक : 17 नवम्बर (रविवार) 2024
स्थान : वाराणसी (उ.प्र.)

आलेख

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मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

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सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।