शर्म, मगर उनको आती नहीं ....

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50
/sharm-magar-unako-aati-nahin

नोएडा में मजदूरों का आंदोलन होने के बाद से मीडिया चैनल योगी जी का गुणगान गाने में लगे हुए हैं कि उन्होंने एक झटके में 21% वेतन वृद्धि कर दी।

सुनने में ये वृद्धि ठीक ही लगेगी लेकिन असलियत बहुत क्रूर है। इसे वास्तविक सैलरी के आंकड़ों से समझते हैं। नोएडा-गाजियाबाद में अकुशल मजदूरी 11,313 ₹ से बढ़ाकर 13,690 ₹, अर्धकुशल 12,745 ₹ से 15,059 ₹ और कुशल 13,940 ₹ से 16,868 ₹ रुपए कर दी गई। इसी वेतन वृद्धि का ढिंढोरा पीटकर योगी जी का गुणगान किया जा रहा है।

इन सब में सोचने वाली बात ये है कि वृद्धि से पहले अकुशल मजदूरों को सिर्फ 11,313 रूपये का वेतन दिया जा रहा था जो आज के समाज में जीने लायक भी नहीं और ये बात योगी जी को भी पता ही होगी। यानी उनकी मजदूरों के इस अथाह शोषण में सहमति थी।

दूसरी बात ये कि अगर मजदूरों का ये आंदोलन नहीं हुआ होता तो क्या वेतन वृद्धि होती? नहीं, बिल्कुल नहीं। यानी योगी जी की दयालुता नहीं बल्कि ये वृद्धि मजदूरों के आंदोलनों के दबाव में ही कि गयी है। यह मज़दूरों कि एक छोटी सी जीत है।

तीसरी बात ये कि जिस वृद्धि की वाहवाही की जा रही है उसका हाल भी देखिए। वृद्धि के बाद भी कुशल मजदूर को सिर्फ 16,868 रुपए मिलेंगे। आज की मंहगाई के हालात में ये रुपए कितने कम हैं, इसे हर मेहनतकश जानता है। और इस पर भी वो सरकारें जो अपनी अय्याशियों और विधायकों की खरीद-फरोख्त में अरबों रुपए खर्च कर देती हैं, अपनी छाती पीट रही हैं।

जिस वृद्धि पर शर्म आनी चाहिए उसका ढोल पीटा जा रहा है। सच तो ये है कि ये ढोल फटा हुआ है।

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।