ट्रेड यूनियनें और संघ-भाजपा का खूनी फासीवादी रथ

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इस समय संघ-भाजपा पूरी शिद्दत के साथ देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को अंजाम दे रहे हैं। एक के बाद एक साम्प्रदायिक घटनाएं करवाकर संघ-भाजपा अपनी फासीवादी मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। मस्जिदों की खुदाई से आगे बढ़कर संघी ताकतें मुसलमान शासकों की कब्र उखाड़ने तक जा पहुंची हैं। होली जैसे रंगों के त्यौहार पर प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर नेताओं तक ने मुसलमानों के खिलाफ जमकर बयानबाजी की। हिन्दू फासीवादी संगठनों की शह पर उपद्रवी तत्वों ने मस्जिदों के बाहर डीजे लगाकर त्यौहार का साम्प्रदायिकीकरण किया व यहां तक कि मस्जिदों में घुसने के प्रयास किए। प्रशासनिक अधिकारियों की बयानबाजियों से इन साम्प्रदायिक ताकतों के हौंसले इतने बुलंद हुए कि वे सरेआम सड़कों पर मुसलमानों के खिलाफ उत्पात मचाते रहे। हिन्दू फासीवादियों का प्रभाव पिछले 10 वर्षों में इतना बढ़ चुका है कि फिल्मों से लेकर गीतों व स्थानीय गीतों तक में साम्प्रदायिकता का जहर घोला जा रहा है।     
    
समाज में चल रही इस साम्प्रदायिक राजनीति को ट्रेड यूनियनों को कैसे देखना चाहिए? यह सवाल ट्रेड यूनियनों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है। पिछले 10 वर्षों से मोदी सरकार सत्ताशीन है और तीसरी बार भी वह एन.डी.ए. के गठबंधन से सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हो गई। देश की केन्द्रीय सत्ता में भाजपा के काबिज होने का पूरा फायदा आर.एस.एस. उठा रहा है। यहां तक कि देश की संवैधानिक संस्थाओं तक में मोदी सरकार ने आर.एस.एस. की सोच वाले व यहां तक कि आर.एस.एस. को समर्थन करने वाले लोगों को बैठा दिया है। मोदी सरकार एक तरफ तो बहुसंख्यक हिन्दू आबादी की धार्मिक भावनाओं को हिन्दू राष्ट्र के अपने साम्प्रदायिक एजेंडे के तहत भड़का रही है तो वहीं दूसरी तरफ अंबानी-अडाणी सरीखे एकाधिकारी पूंजीपतियों को मजदूरों के श्रम की लूट की छूट दे रही है तथा छोटी-मझौली खेती-किसानी को भी इन्हीं पूंजीपतियों के सुपुर्द करने पर तुली है। 
    
मजदूरों के 44 केन्द्रीय श्रम कानूनों को खत्म कर 4 घोर मजदूर विरोधी लेबर कोड्स में तब्दील कर मजदूरों से स्थाई कार्य पर स्थाई नौकरी, 8 घंटे के कार्य का अधिकार एवं हड़ताल करने का अधिकार छीनने के प्रावधान; साथ ही महिला मजदूरों को रात की पाली में कार्य करने के प्रावधान और मजदूरों के यूनियन बनाने के अधिकार का आपराधीकरण करने की साजिश इन नए लेबर कोड्स में की गयी है। ठेकाकरण की प्रथा को कानूनी बनाकर उसे नीम ट्रेनिंग, प्रशिक्षण का नाम देकर 2-3 वर्षां के लिए मजदूरों को भर्ती करने का ऐसा रूप दे दिया गया है कि न तो ये मजदूर श्रम कानूनों के दायरे में आते हैं और न ही ये मजदूर संगठित हो सकते हैं। स्थाई मजदूरों की छंटनी कर बची-खुची पुरानी यूनियनों को खत्म किया जा रहा है। 
    
संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्र के परस्पर सम्बद्ध दो रूप हैं। पहला वो जिसके तहत संघी अपने फासीवादी आंदोलन के जरिये मुसलमानों पर हमला बोल बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को गोलबंद कर रहे हैं।
    
वहीं इस दूसरे भारत की भी तस्वीर है जो फैक्टरियों में मजदूरों की बनती है, छोटे-मझौले किसानों की बनती है, महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा की बनती है। इन पर जो हमलें किए जा रहे हैं वह न तो मीडिया कवर करता है और न ही नेता पक्ष-विपक्ष कुछ बोलता है। कुछ दिनों पहले भारत के अलग-अलग औद्योगिक इलाकों में मजदूरों के आंदोलन हुए हैं जिसे किसी भी राष्ट्रीय मीडिया में कवर नहीं किया गया। तमिलनाडु में सैमसंग मजदूरों का यूनियन बनाने को लेकर चला आंदोलन, पश्चिमी बंगाल में चाय-बागान के मजदूरों का अपने बोनस-भत्तों को लेकर चला आंदोलन, गुड़गांव में मारूति के बर्खास्त मजदूरों व बेलसोनिका मजदूरों का चला आंदोलन, रुद्रपुर में डॉल्फिन फैक्टरी के मजदूरों का चला आंदोलन इत्यादि। इन सभी मजदूर आंदोलनों का दमन किया गया। डॉल्फिन फैक्टरी के मजदूरों के आंदोलन को किस तरह कुचला गया यह सब हमारी आंखों के सामने घटित हुआ। न्याय के लिए संघर्ष करने वाले मजदूरों के ऊपर ही रुद्रपुर प्रशासन ने गुण्डा एक्ट के मुकदमे दर्ज कर हिन्दू राष्ट्र के मंसूबे को जाहिर कर दिया कि यह हिन्दू राष्ट्र असल में अंबानी-अडाणी का हिन्दू राष्ट्र होगा। सैमसंग मजदूरों की यूनियन का पंजीकरण हाईकोर्ट के दखल से मिला लेकिन वहां छंटनी अब भी जारी है। मारूति मजदूरों को फैक्टरी गेट से 500 मीटर दूर धरना लगाने की छूट के कोर्ट के आदेश को न लागू करवाने के लिए हरियाणा में काबिज भाजपा सरकार ने पूरी पुलिस की ताकत झोंक कर मजदूरों को धरना नहीं लगाने दिया। बेलसोनिका मजदूरों के 1 जून 2023 के त्रिपक्षीय समझौते को हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी लेबर कमिश्नर लागू नहीं करवा रहा है। यही संघ-भाजपा का नया भारत है जहां अंबानी-अडाणी की पूंजी की रक्षा की जाएगी और उसकी तरक्की की जाएगी। ये कुछ वो झलकियां हैं जो हमें पता हैं। संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्र का दूसरा रूप है जिसे छिपा कर लागू किया जा रहा है। 
    
पिछले वर्ष फरवरी 2024 से फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की गांरटी को लेकर खनौरी व शम्भू बॉर्डर पर बैठे पंजाब के किसानों का धरना बीते 21 मार्च को भारी पुलिस बल लगा कर उठा दिया गया। किसानों की मांगें पूरी करने के बजाय पुलिस बल लगा कर धरना ही उठा दिया गया और मीडिया में यह कोई खबर नहीं दिखाई गई। ऐसा होगा हिन्दू राष्ट्र जहां किसानों की मांगों को पुलिस के डंडे तले कुचल दिया जाएगा। 
    
यह संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्र के दो आयाम हैं जिसमें मुस्लिमों पर हो रहे हमलों को मीडिया से लेकर फिल्मों व गीतों के जरिये जायज ठहराया जा रहा है। मीडिया इन हमलों को हिन्दू राष्ट्र के लिए जरूरी बता रहा है और नए हमलों की जमीन तैयार कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ मजदूरों-किसानों पर हो रहे हमलों को इस साम्प्रदायिक राजनीति की परतों में दबाने के लिए फासीवादी निजाम की तरफ मामला बढ़ाया जा रहा है। ट्रेड यूनियनों को इन दोनों आयामों पर सोचकर अपने वर्ग संघर्ष की ओर मुख करना होगा। ट्रेड यूनियनें ही अपने वर्ग संघर्ष से मजदूर-मेहनतकश विरोधी नए भारत के खूनी रथ को रोक सकती हैं। मजदूर वर्ग ही इन जालिमों के अत्याचारों से मुक्ति दिला सकता है।                -अजीत, गुड़गांव

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