यह वर्ष फासीवादी निजाम कायम करने के लक्ष्य के साथ सत्तासीन मोदी सरकार के सामने एक के बाद एक चुनौती पेश कर रहा है। पहले ठेका मजदूरों के संघर्षों की लहर ने पूरे उत्तर भारत में खुलेआम पूंजीपति वर्ग को चुनौती दी। पूंजीपतियों की लूट की खातिर मजदूरों के खून की आखिरी बूंद को भी निचोड़ने में जुटी सरकारों को पीछे हटना पड़ा और जगह-जगह न्यूनतम मजदूरी बढ़ानी पड़ी। साथ ही मजदूरों पर पुलिसिया कहर-फर्जी मुकदमों ने पुलिस-प्रशासन का पूंजीपरस्त रुख सबके सामने स्पष्ट कर दिया।
इसके पश्चात पेपर लीक के मामलों में छात्रों-युवाओं के जंतर मंतर संघर्ष ने मोदी सरकार को सीधे चुनौती पेश की। पुलिसिया दमन के बाद भी जब छात्रों-युवाओं ने झुकने से इंकार कर दिया तो मोदी सरकार को पीछे हटते हुए अपने शिक्षा मंत्री को इस्तीफा दिलाना पड़ा। इस संघर्ष की खासियत यह रही कि इसने समूची आबादी में मोदी सरकार द्वारा कायम की गयी भय-दहशत को एक झटके में तार-तार कर दिया और जगह-जगह छात्र-युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने लगे।
इसके बाद चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की करतूतों के खुलासे ने समूची चुनावी प्रक्रिया व एस आई आर को कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्षी दल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने लगे। इस घटनाक्रम ने पहले से लग रहे उन आरोपों को सच साबित कर दिया कि चुनाव आयोग भाजपा के पक्ष में काम कर रहा है। कि इस व्यवस्था में पैसे-बाहुबल का तो चुनावों पर पहले से ही जोर चलता था अब चुनावी प्रक्रिया भी एक खास दल के पक्ष में झुका कर पूरी तरह बेमानी बना दी गयी है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हर बीतते दिन के साथ जोर पकड़़ रही है। एस आई आर से लेकर फार्म-6 में बदलाव पर शीर्ष न्यायपालिका के फासीवादी ताकतों के समर्थन में खुद न्यायपालिका के न्याय पर प्रश्न चिन्ह (?) लगा दिये हैं।
अंत में जमुई-दिल्ली-समस्तीपुर में एक के बाद एक महिला हिंसा की खबरों ने साबित कर दिया कि संघ-भाजपा के शासन में महिला हिंसा की करतूतें आसमान छूने लगी हैं। रही-सही कसर नेताओं के महिला विरोधी बोलों ने पूरी कर दी। दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्री राम कालेज ने 10 दिन आनलाइन कक्षाओं का फरमान सुना मानो एक तरह से तंत्र की विफलता पर मोहर लगा दी कि वे छात्राओं को सुरक्षा नहीं दे सकते इसलिए वे घर से पढ़ाई करें। कालेज की छात्राओं ने कालेज की इस तानाशाही के विरोध में व बलात्कार पीड़िता को न्याय के लिए प्रदर्शन शुरू किये तो उसमें दिल्ली के बाकी कालेजों की छात्रायें भी साथ में खड़ी होती गयीं।
एक के बाद एक मुद्दे पर बढ़ता जनाक्रोश न केवल मोदी सरकार की विफलता को सामने ला रहा है बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था की असलियत भी उजागर कर रहा है। असलियत यही है कि पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर-मेहनतकशों-छात्रों-युवाओं-महिलाओं को केवल क्रूर शोषण-अपमान-बेकारी ही झेलनी पड़ती है और व्यवस्था का हर अंग पुलिस-प्रशासन -न्यायपालिका-चुनाव आयोग-सरकार सभी निर्लज्जता से जनता के शोषण-उत्पीड़न में जुटे हैं। फासीवादी ताकतों के आगे समर्पण में ये अपने ही कानूनों को धता बताने में नहीं हिचक रहे हैं। मजदूर वर्ग पर हमले के मामले में तो ये पूंजीपतियों के पाले में लम्पटों सरीखा व्यवहार कर रहे हैं।
ऐसे में व्यवस्था के इन दरकते एक-एक पहियों को एजेण्डा बना विपक्षी दल जहां इसी पूंजीवादी व्यवस्था में सत्तासीन होना चाहते हैं। वहीं मजदूर-मेहनतकशों-युवाओं-महिलाओं को इस असलियत को पहचानना होगा कि व्यवस्था के पहिये ही नहीं समूची व्यवस्था ही उनके हितों के खिलाफ है। फासीवादी ताकतों ने इन पहियों के ऊपर पड़ा आवरण नोंच डाला है और पहियों को जनता को सीधे कुचलने में लगा दिया है। शायद इसीलिए टाटा-अम्बानी-अडाणी ने मोदी-शाह को सत्ता पर पहुंचाया था। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि पहियों की मरम्मत के बजाय समूची व्यवस्था की असलियत को पहचाना जाये और पहियों के खिलाफ लड़ते हुए लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था बदलने की लड़ाई तेज की जाये।