जेन जी आक्रोश पर सवार हो आगे बढ़ती काकरोच जनता पार्टी

Published
Tue, 06/16/2026 - 09:55
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भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को काकरोच कहे जाने की प्रतिक्रिया में काकरोच जनता पार्टी पैदा हुई थी। अमेरिकावासी अभिजीत दिपके द्वारा सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक रूप से पैदा की गयी यह पार्टी अपने कार्टूनों से शीघ्र ही लोकप्रियता ग्रहण करने लगी। इस लोकप्रियता से घबराकर मोदी सरकार ने दिपके पर तरह-तरह से हमले करने शुरू कर दिये। उसे विपक्षी दलों की साजिश, पाक एजेण्ट आदि तमगे बांट दिये गये। उसके सोशल मीडिया के कई हैण्डेल ब्लाक कर दिये गये। पर इस सबसे काकरोच जनता पार्टी की लोकप्रियता बढ़ती गयी। इस लोकप्रियता पर सवार पूंजीवादी राजनीति में किस्मत आजमाने दिपके भारत आ गये और जंतर-मंतर, पुणे, लखनऊ, अमृतसर में प्रदर्शन कर चुके हैं। प्रदर्शनों का सिलसिला अभी आगे बढ़ने की संभावना है। काकरोच पार्टी एन जी ओ से जुड़े कई प्रवक्ता घोषित कर चुकी है। 
    
इन प्रदर्शनों की मुख्य मांग शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की है। पेपर लीक प्रकरण के दोषी के बतौर शिक्षा मंत्री से इस्तीफे की मांग की जा रही है। अभी तक मोदी सरकार इन प्रदर्शनों पर सीधे हमलावर नहीं हुई है यद्यपि यह इन्हें विफल करने के लिए छात्र नेताओं को हाउस अरेस्ट व अन्य कार्यवाहियां कर रही है। नेपाल के अनुभव से मोदी सरकार सबक लिये हुए है कि दमन से युवा प्रतिक्रिया और तेज हो सकती है। 
    
इन प्रदर्शनों में जहां ढेरों युवा स्वतः स्फूर्त तरीके से शामिल हो रहे हैं वहीं वामपंथी-एनजीओ तरह-तरह के छात्र संगठन भी अपने नारों-मुद्दों के साथ इनमें शिरकत कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों को आसानी से मिल रही पुलिसिया अनुमति, इनकी फंडिंग को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ लोग तो दिपके को संघ-भाजपा की बी टीम करार दे नौजवानों का आक्रोश गलत दिशा में मोड़ने का इसे एक प्रयास मान रहे हैं। 
    
जहां तक प्रश्न दिपके व उसके द्वारा प्रचारित काकरोच जनता पार्टी का है तो निश्चय ही ही ये भ्रष्टाचार मुक्त पूंजीवाद का स्वप्न युवाओं को परोस रही है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमंे न्यायधीश ईमानदार होंगे, मीडिया सरकारी प्रभाव से मुक्त होगा व भ्रष्टाचारी जेल में होंगे। जाहिर है भ्रष्टाचार मुक्त पूंजीवाद का यह स्वप्न कुछ वर्ष पूर्व अन्ना हजारे व केजरीवाल ने भी परोसा था। अब केजरीवाल का छोटा संस्करण नये मंसूबों के साथ हाथ में अंबेडकर की पुस्तक लेकर मैदान में है। तब अन्ना आंदोलन की लहर पर सवार हो मोदी प्रधानमंत्री की गद्दी पर पहुंचे थे। आंदोलन को खड़ा करने में संघ-भाजपा पर्दे के पीछे से सक्रिय थे। अब केजरीवाल का छोटा संस्करण नई महत्वाकांक्षाओं के साथ सामने है। 
    
छात्रों-युवाओं की बेरोजगारी व शिक्षा संदर्भी अन्य समस्याओं का समाधान काकरोच पार्टी के ‘भ्रष्टाचार मुक्त पूंजीवाद’ में नहीं बल्कि मजदूर वर्ग के समाजवाद में है। पूंजीवाद में कुछ राहत के लिए भी जरूरी है कि देश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियां पलटी जाये व कल्याणकारी राज्य की बहाली हो। पर ये मांगें भी काकरोच जनता पार्टी के एजेण्डे नहीं हैं। 
    
ऐसे में छात्रों-युवाओं के प्रदर्शनों की चल रही लहर (या लहर पैदा करने के प्रयास) के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। जहां पेपर लीक प्रकरण से जोड़ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की जायज मांग इसका एक पक्ष है जिसका समर्थन किया जाना चाहिए। वहीं शिक्षा व रोजगार के सवाल को पूंजीवादी दायरे में चंद नीम हकीमी नुस्खों से पेश करना युवा आबादी को बरगलाना भी है। ऐसे में परिवर्तनकारी शक्तियों-क्रांतिकारी शक्तियों की भूमिका बहुत बढ़ जाती है। वे ही हैं जो सड़कों पर उतर रही युवा आबादी को सही दिशा की ओर मोड़ सकते हैं और छात्रों-युवाओं को समाजवादी क्रांति के लिए तैयार कर सकते हैं। 

ये प्रदर्शन अभी भांति-भांति की संघ-भाजपा विरोधी ताकतों के आक्रोश को अभिव्यक्त कर रहे हैं पर सरकार का एक भी गलत कदम इन्हें और भड़का सकता है। 

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