पूंजीवादी जनतंत्र और धनतंत्र
आजकल अपने देश में चुनावों में पैसे के खेल को लेकर काफी चर्चा है। इस चर्चा को तब काफी बल मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने छः साल बाद आखिरकार चुनावी बांड की संवैधानिकता पर अपना
आजकल अपने देश में चुनावों में पैसे के खेल को लेकर काफी चर्चा है। इस चर्चा को तब काफी बल मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने छः साल बाद आखिरकार चुनावी बांड की संवैधानिकता पर अपना
उत्तराखंड में अतिक्रमण हटाने के नाम पर विध्वंस की कार्रवाई और उसके बाद हुई हिंसा में पांच लोगों की मौत, एक ऐसे पैटर्न को रेखांकित करती है जो बीजेपी शासित राज्यों में आम ह
दिनांक 8 फरवरी को भारत में 17 संघर्षशील और क्रांतिकारी श्रमिक संगठनों/यूनियनों के एक समन्वय मंच, मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिल
हल्द्वानी के बनभूलपुरा में 8 फ़रवरी के प्रकरण, जिसमें एक मदरसा और नमाज स्थल ढहाने के बाद भड़की हिंसा में पुलिस फायरिंग में 5-6 लोगों की मौत हो चुकी है, जबक
एक जर्मन कहावत है, ‘‘बदलाव और बेहतरी के लिए बदलाव; दो अलग बातें हैं’’। जर्मनी के ही उदाहरण से हम जानते हैं कि अपने दौर में हिटलर ने भी जर्मनी के सामाजिक-राजनैतिक ढांचे मे
19 जनवरी को आई आई टी कानपुर के छात्रों ने प्रशासन के खिलाफ संस्थान में प्रदर्शन और सभा की। 18 जनवरी को संस्थान में शोध छात्रा प्रियंका की आत्महत्या से छात्र आंदोलित हो गए
आज समाज में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। साम्प्रदायिक दंगां से लेकर महिला अपराधों तक, हत्या से बलात्कार तक, सभी की संख्या पहले से कहीं ज्यादा है। और इन अपराधो
इस समय संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय सर्वोच्च अदालत में इस बात को लेकर मुकदमा चल रहा है कि क्या 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद डोनाल्ड ट्रम्प समर्थकों ने जो विद्रोह करने की कोशिश की थी और जिसमें
उत्तराखण्ड सरकार की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।