विविध
आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का बरेली में प्रदर्शन
दिनांक 16 फ़रवरी को जहां एक ओर देश भर में किसान और मजदूर संगठन, दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के दमन के विरोध में भारत बन्द और हड़ताल कर रहे थे वहीं जनपद बरेली में बड़ी संख
सांप्रदायिक सौहार्द बचाने हेतु कौमी एकता मंच का गठन
हल्द्वानी/ 25 फरवरी को क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा हल्द्वानी में सांप्रदायिक सौहार्द को बचाने हेतु भाईचारा बैठक बुलाई गई जिसमें अलग-अलग स्थानों स
भोजनमाताओं का सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
प्रगतिशील भोजनमाता संगठन द्वारा उत्तराखंड में कुमाऊं के हल्द्वानी में 24 फरवरी और गढ़वाल के हरिद्वार में 25 फरवरी को जोरदार विरोध-प्रदर्शन किए गये।
16 फरवरी : ग्रामीण भारत बंद एवं औद्योगिक हड़ताल के मौके पर रैली, सभा, ज्ञापन एवं पुतला दहन
मोदी सरकार की मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के विरोध में 16 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत ग्रामीण बंद एवं औद्योगिक हड़ताल को व्
आपका नजरिया : बढ़ती गरीबी वाला ‘नया भारत’
मोदी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बोलते नहीं थकते कि भारत में विकास की गंगा बहे जा रही है। लेकिन ये विकास की परिभाषा मोदी सरकार की है न कि आम जनता की। आम जनता की वि
उत्तर प्रदेश के विद्युत विभाग में कर्मचारियों के शोषण-उत्पीड़न और दमन की दास्तान
विद्युत विभाग को आप और हम सर्व प्रथम उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के नाम से जानते थे जिसकी स्थापना वर्ष 1959 में हुई थी। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के गठन के सम
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कृष्ण और सुदामा की आड़ लेते भ्रष्टाचारी
चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के नाम पर लाये गये इलेक्टोरल बांड खुद ही भ्रष्टाचार का माध्यम बन गये। ये भ्रष्टाचार इतना बढ़ता गया कि इस चंदे का 90 प्रतिशत तक सत्ताधारी पा
उत्तराखंड सरकार के बजट में मजदूरों एवं कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं
मैंने समाचार पत्र में पढ़ा था। मुझे मजदूरों व कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं मिला उत्तराखंड सरकार के बजट में।
म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन में फिलिस्तीन कहां?
म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन, 2024 फरवरी के तीसरे सप्ताह में सम्पन्न हुआ। कहने के लिए तो यह सुरक्षा सम्मेलन था और इसमें बार-बार ‘‘शांति’’ और ‘‘सहयोग’’ की दुहाई दी जा रही थी। ल
राष्ट्रीय
आलेख
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।