अजब-गजब राष्ट्रवाद

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आज की राजनीति में राष्ट्रवाद एक प्रमुख स्थान रखता है और इसकी अनुगूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे सकती है। स.रा.अमेरिका में ट्रम्प इसका ध्वजवाहक है तो रूस में पुतिन, तुर्की में एर्दोगन तो चीन में शी जिनपिंग, हंगरी में विक्टर ओर्बान तो सर्बिया में अलेक्जेण्डर वुसिक, भारत में मोदी तो पाकिस्तान में शाहबाज शरीफ। ये सभी अलग-अलग ढंग से राष्ट्रवाद का नारा लगाते हैं परन्तु इनमें से हर कोई अपने-अपने देश में अपने को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा नायक घोषित करता है। ट्रम्प ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ जैसे नारे गढ़े हैं तो पुतिन रूस का पुराना वैभव व साम्राज्य कायम करना चाहते हैं। कोई कहता है कि ‘इक्कीसवीं सदी हमारी सदी है’ तो कोई ‘विश्व गुरू’ बनना चाहता है। 
    
पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का इतना शोर है कि लगता है मानो पूरी दुनिया एक मछली बाजार है। मछली बाजार में जिस तरह हर ओर से मछली बेचने और उसके खरीददारों का शोर उभरता है, हर ओर मछली की गंध छायी रहती है, ठीक उसी तरह से दुनिया की राजनीति में, राष्ट्रवाद का शोर और उसकी गंध छायी हुयी है। मछली बाजार से एक बार बस गुजर जाइये, शोर और गंध आपके साथ चिपक सी जाती है। कुछ ऐसा ही हाल राष्ट्रवाद की राजनीति का है। 
    
सं.रा.अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी सैनिक शक्ति है। पूरी दुनिया में उसके सैनिक अड्डे फैले हुए हैं और उसकी मुद्रा को वैश्विक हैसियत हासिल है। ऐसा देश जिसका राजनीति से लेकर व्यापार तक सबमें दबदबा है। ऐसे देश को भी राष्ट्रवाद की ओट लेनी पड़ती है। महज इसलिए कि वह पूरी दुनिया में अपने दबदबे को, अपनी श्रेष्ठता को हमेशा के लिए कायम रख सके। अपना प्रभुत्व ऐसा कायम करे कि कोई उसकी बराबरी की हिम्मत न कर सके। यह राष्ट्रवाद का सिर्फ एक पहलू है, बाह्य पहलू है। 
    
राष्ट्रवाद का दूसरा पहलू, आंतरिक पहलू है। राष्ट्रवाद को दो शत्रु चाहिए। एक बाहरी और दूसरा घरेलू। इन दोनों शत्रुओं के बगैर राष्ट्रवाद अपने आपको जिन्दा नहीं रख सकता है। कौन उसका बाह्य, कौन उसका घरेलू शत्रु होगा, ये राष्ट्रवाद के चरित्र से तय होता है। लेकिन यह सच है कि ऐसा राष्ट्रवाद नहीं हो सकता जिसके घोषित तौर पर एक साथ दो शत्रु न हों। और अक्सर ही वह अपने घोषित घरेलू शत्रु का दमन बाहरी शत्रु से लड़ने के नाम पर ही करता है। और अक्सर ही वह स्वघोषित आंतरिक शत्रु से लड़ने के नाम पर बाह्य शत्रु का ऐसा हव्वा खड़ा करता है कि उसके आंतरिक शत्रु का दमन आसान और सर्वमान्य हो जाये। ऐसा करते वक्त वह कोशिश करता है कि उसके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी पस्त होकर खामोश हो जायें। बाहरी और घरेलू शत्रु के दम पर ही राष्ट्रवाद जिन्दा रहता है। जिस दिन उसका कोई बाहरी दुश्मन नहीं होगा तो उस दिन उसका भीतरी दुश्मन भी खत्म हो जायेगा। या फिर इसका उलटा। और जिस दिन भी ऐसा होगा राष्ट्रवाद अपनी आयु पूरी कर लेगा। 
    
किसी भी देश में देखिये राष्ट्रवाद को एक साथ दो मोर्चे पर लड़ते हुए देखा जा सकता है। ट्रम्प जितना पूरी दुनिया में आक्रमकता दिखा रहा है ठीक उसी तरह वह घरेलू मोर्चे पर भी आक्रामक है। किंचित उसे जितनी घरेलू मोर्चे पर अलग-अलग वजह से चुनौती मिलती जाती है उसके लिए वह बाह्य मोर्चे पर अधिक उग्रता का प्रदर्शन करता है। और इस उग्रता के साथ और उग्रता जोड़कर वह घरेलू मोर्चे पर अपने विरोधियों से लेकर आम जनों पर (खासकर उन पर जिनको आसानी से लक्षित किया जा सकता है यानी अप्रवासी, शरणार्थी, अश्वेत, औरतें, धार्मिक अल्पसंख्यक व एलजीबीटीक्यू जैसे सामाजिक समूह, मानवाधिकार व पर्यावरण कार्यकर्ता आदि) हमला करता है। 
    
सं.रा.अमेरिका में जो ट्रम्प करता है वही शी जिनपिंग चीन में और पुतिन रूस में करता है। ऐसा ही हंगरी में विक्टर ओर्बान व तुर्की में एर्दोगान करता है। ऐसा ही सब कुछ भारत में और पाकिस्तान में भी घटता है। दोनों ही ने एक-दूसरे को अपना शत्रु घोषित किया हुआ है और दोनों ही इस नाम पर अपने भीतरी विरोधियों से लेकर आम जन के उत्पीड़न-दमन में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सीमा के बाहर सीमा के भीतर भी युद्ध चलता रहता है। सेना या अर्द्ध सैनिक बल (जो सेना जैसे ही हैं) कथित भीतरी शत्रुओं के खिलाफ भी उसी तरह से युद्ध लड़ते रहते हैं। देश के भीतर के इन कथित शत्रुओं को न तो देश का नागरिक यहां तक कि इंसान भी नहीं समझा जाता है। बलूच या पख्तून या पूर्व में बांग्लाभाषियों के साथ पाकिस्तानी शासकों के व्यवहार पर एक नजर डाल लीजिये। यही बात भारत के ऊपर भी लागू हो जाती है। धार्मिक अल्पसंख्यकों से लेकर कश्मीरी, मणिपुरी, नागा आदि राष्ट्रीयताओं के साथ वही कहानी दुहरायी जाती है जो पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों या उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के साथ दुहरायी जाती है। दोनों ही देशों ने जितने युद्ध एक-दूसरे से लड़े हैं उससे कई गुना युद्ध अपने देश के भीतर लड़े हैं। हजारों हजार निर्दोष व निहत्थे नागरिक इन दोनों ही देशों में इनकी आजादी के बाद से आज तक मारे जा चुके हैं। और युद्ध निरन्तर जारी है। और आगे भी तब तक जारी रहेगा जब तक इन दोनों ही देशों में खुद मजदूर मेहनतकश वास्तविक शासक नहीं बन जाते हैं। कदाचित कहीं वे बगावत न कर दें, सत्ता में अपनी दावेदारी न कर दें इसलिए राष्ट्रवाद का इतना हल्ला काटा और मेहनतकशों पर दबाव बनाया जाता है। भारत और पाकिस्तान या अन्य देशों के मजदूरों-मेहनतकशों को समझना ही होगा कि इन शासकों का राष्ट्रवाद अन्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा उनके ही खिलाफ लक्षित है। भारत और पाकिस्तान का हालिया चार दिन-रात के युद्ध में, घरेलू कारण ही कहीं ज्यादा जिम्मेदार थे और उसके निशाने पर देश के भीतर के एजेण्डे ही ज्यादा थे। 
    
और फिर इनका राष्ट्रवाद कैसा राष्ट्रवाद है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने इनकी घिग्गी बंध जाती है। दोनों लड़ाकू बिल्ले अमेरिका के धमकाने या पुचकारने पर शांत हो जाते हैं। एक-दूसरे के सामने या अपने घर के शेर, अमेरिका के सामने ढेर हो जाते हैं। 
    
हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी साहब का व्यवहार देखिये। ट्रम्प के सामने ये ढेर हैं। वह इनकी ही नहीं हमारे देश के लोगों की सरेआम बेइज्जती करता है। हथकड़ियों में हमारे महान देश के लोगों को अमेरिका से भूखा-प्यासा संगीनों के साये में भेजता है। भारत के प्रधानमंत्री के मुंह में दही जम जाता है और हालिया चार दिनी युद्ध में अमेरिका हमें हमारी औकात बताता है। मोदी साहब के मुंह से अमेरिका के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं फूटता है और अब ये महाशय देश में शान से फौजी ड्रेस में अपने पोस्टर लगवाते हैं। और अपना ऐसा स्वागत करवाते हैं मानो न जाने कौन सी जंग फतेह कर ली है। ट्रम्प के सामने जिनकी जुबान नहीं खुलती वे देश के भीतर दहाड़ने लगते हैं। यही हाल शरीफ बंधुओं का भी है। खोखला, छिछला, लचर राष्ट्रवाद ऐसा ही होता है। ऐसा ही इनका वर्तमान है और ऐसा ही इनका इतिहास व भविष्य है। नकली लड़ाई या नूरा कुश्ती के स्वघोषित विजेता चाहे यह दावा करे कि ‘नया भारत घुस के मारता है’ या फिर अपनी घोषित जीती हुयी लड़ाई के जनरल को ‘फील्ड मार्शल’ की उपाधि दे दे। क्या फर्क पड़ता है।  

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