अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्र सड़कों पर

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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अल्बानिया में शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर 13 अक्टूबर से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब प्रधानमंत्री ईदी रामा के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें पांचवें दिन भी जारी रहीं। प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकारी ईमारतों में आग लगा दी गयी है। पुलिस जहां आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और वाटर केनन का इस्तेमाल रही है वहीं प्रदर्शनकारी पेट्रोल बम का इस्तेमाल कर रहे हैं। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया हुआ है। प्रदर्शनकारी अलबानिया के दक्षिणी तट पर ट्रम्प के दामाद कुशनर द्वारा बनाये जा रहे आलीशान रिसोर्ट के कारण होने वाले पर्यावरण प्रदूषण की वजह से भी नाराज हैं।
    
अल्बानिया की राजधानी तिराना में शिक्षा मंत्रालय के सामने प्रदर्शनकारी भ्रष्टाचार और विश्वविद्यालयों की खराब परिस्थतियों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। शुरू में तो यह प्रदर्शन केवल शिक्षा के मुद्दे को लेकर ही था लेकिन युवा नौकरी की समस्या से भी लगातार जूझ रहे हैं। सरकारी भ्रष्टाचार को भी युवा आबादी एक बड़ी समस्या के रूप में देखती है। ऐसे में अब मामला प्रधानमंत्री के इस्तीफे तक पहुंच चुका है। 
    
इस समय दुनिया के कई देशों में छात्र आबादी सड़कों पर है। फ्रांस, भारत, चिली, स्पेन आदि देशों में सभी जगह छात्र आबादी एक बड़ी भूमिका इन आंदोलनों में निभा रही है। ये सभी सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और उस जवाबदेही में विफल होने पर ये उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। 
    
आज दुनिया में ठीक वैसे ही हालात बन रहे हैं जैसे 2011 में उस समय बने थे जब ट्यूनेशिया में एक युवा ने अपने ऊपर पेट्रोल डालकर आत्मदाह कर लिया था। भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार को लेकर उस समय तानाशाहों के खिलाफ आंदोलनों ने तमाम तानाशाहों को गद्दी छोड़ने को मजबूर कर दिया था। तानाशाहों को सत्ता से उतार फेंका गया। लेकिन उस समय भी तानाशाही की जमीन, उस तंत्र को निशाना नहीं बनाया गया जिसमें यह तानाशाही जन्म लेती हैं। इसलिए तानाशाही का तो अंत हुआ लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था जिसका तंत्र, जिसका हर रूप व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी के लिए सदैव ही तानाशाही वाला रहता है, बना रहा। और जल्द ही यह पूंजीवादी, तथाकथित लोकतंत्र अपने असली रूप में आ गया और उसने फिर से जनवाद  को कुचलना शुरू कर दिया। और फिर से लोग अपने जीवन में और अधिक घुटन महसूस करने लगे।
    
आज युवा आबादी के सामने एक अंधकारमय भविष्य है। वे पढ़ाई करते हुए शिक्षा व्यवस्था में कमियों से जूझ रहे हैं। इसके अलावा वे सरकार और पूंजीपतियों की खुली लूट को भी देख रहे हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ शुरू हो रहे आंदोलन समाज की दूसरी समस्याओं को भी अपना मुद्दा बना रहे हैं। 
    
यही हाल अल्बानिया का है। अल्बानिया के प्रधानमंत्री 2013 से सत्ता पर काबिज हैं। वे पिछले साल ही चैथी बार प्रधानमंत्री बने हैं। पिछले साल ही अल्बानिया को यूरोपीय संघ में शामिल किया गया है। और 2028 तक अल्बानिया को यूरोपीय संघ की सदस्यता लेनी है। अल्बानिया को यूरोपीय संघ में शामिल होने को वे अपनी एक बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं। मानो अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने से वहां की समस्याएं छू मंतर हो जाएंगी। जबकि हकीकत यह है कि यूरोपीय संघ का एक बड़ा देश फ्रांस खुद छात्रों के आंदोलन से जूझ रहा है। खुद मैक्रों की सरकार खतरे में है और दक्षिणपंथी हावी हो रहे हैं। 
    
इसके अलावा अल्बानिया के प्रधानमंत्री तर्क दे रहे हैं कि पिछले साल ही उन्हें जनादेश प्राप्त हुआ है और इसलिए वे पद नहीं छोड़ेंगे। मूर्ख शासक भूल जाते हैं कि श्रीलंका में भारी बहुमत से जीतने वाले राजपक्षे की सरकार को चुनाव के डेढ़ साल बाद ही किस तरह वहां की जनता ने हटा दिया था। और राष्ट्रपति के घर को आग लगा दी थी। 
    
अल्बानिया की छात्र आबादी अपने संघर्ष को किस दिशा में ले जाएगी यह वहां की क्रांतिकारी ताकतों पर निर्भर करता है।

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