धप्प की आवाज के साथ कार का गेट बन्द हो गया। इसमें कुल चार लोग बैठे थे। आगे के दो लोग एक-दूसरे को जानते थे और पीछे बैठे लोग एक-दूसरे से अनजान थे। कार चलाने वाला कार का मालिक था। उसके बगल में बैठा हुआ आदमी बड़े शहरों की तरह उसकी जान पहचान का था, ये दोनों दिल्ली के निवासी हो चुके थे। ड्राइवर पीछे से शायद यूपी का लग रहा था और उसके बगल में बैठा आदमी छत्तीसगढ़ के किसी आदिवासी समुदाय से। उसके रंग-रूप और चेहरे की बनावट से ऐसा लग रहा था। लेकिन दिल्ली के खान-पान और पैसों ने उसे काफी मोटा कर दिया था। रास्त में उसने बताया वह अपना मकान बेच देगा। उसके मकान की कीमत करीब सवा दो करोड़ होगी। उसने बताया कि उसने ऊपर एक एक्स्ट्रा मंजिल बना रखी है जो नक्शे से पास नहीं है। ऊपर की मंजिल का तीस लाख एक्स्ट्रा लेगा क्योंकि उसमें से दस-पन्द्रह लाख अधिकारी को देगा क्योंकि बेचने के लिए या तो उसे तोड़ना पड़ेगा या अधिकारी को रिश्वत खिलानी पड़ेगी। रिश्वत से तीनों का फायदा है। उसका मकान मेन रोड से गेट के बाद दूसरा है। चारों लोगों को लम्बी दूरी सफर नहीं करनी थी। बातों ही बातों में हम लोग श्मशान घाट पहुंच गये। अन्दर जाकर पूछा कि अभी कोई बाॅडी आयी है कि नहीं तो गार्ड ने बताया कि सुबह से अभी कोई बाॅडी नहीं आयी। अंतिम संस्कार करने वाले/होने वाले व्यक्ति, उसके सगे सम्बन्धियों के आधार कार्ड उसमें लगने थे।
थोड़ी ही देर में एक छोटे हाथी अर्थात टैम्पू में रखकर डेड बाॅडी आ गयी और उसके साथ तीन लोग उसी में खड़े होकर आ गये। इसमें से एक इनका बड़ा बेटा था जो करीब पन्द्रह-बीस साल पहले यहां से गांव चला गया था क्योंकि वह यहां सेटल नहीं हो पाया। कल रात ही गांव से वह यहां पहुंचा था। गाड़ी में मकान की कीमत बता रहा था, वह छोटा बेटा था। छोटे बेटे की प्लानिंग थी कि परिवार में बिना बताये कल शाम ही अंतिम संस्कार करना चाहता था। लेकिन पडोसियों ने गांव फोन कर दिया, फिर भी रुकने को तैयार नहीं था। वजह थी अंतिम संस्कार करके और फिर डेथ सर्टिफिकेट लगाकर उस मकान को बेचकर दूसरे भाई को कह देता कि मैं गांव की जमीन में हिस्सा नहीं लूंगा।
इसी बीच बाकी लोग भी गाड़ियों और बाइक से श्मशान घाट पहुंच गये थे। ड्राइवर अर्थात गाड़ी का मालिक जिसकी गाड़ी में हम आये थे, उसने बताया कि यहां दो किलोमीटर दूर एक बड़ा प्रोजेक्ट आ गया है। उसका नक्शा बहुत अच्छा है। बेसमेंट में तो सिर्फ पार्किंग रहेगी, ग्रांउड फ्लोर और फस्र्ट फ्लोर पर माॅल रहेगा, उसके ऊपर कमर्शियल शाॅप्स रहेंगी और उसके ऊपर रेजिडेन्शियल होगा। अगर यहां पर एक शाॅप और ऊपर एक फ्लेट मिल जाये तो कहीं पर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
पंडित दाह सस्ंकार के सारे क्रिया कर्म करवा रहा था और चूंकि ये लोग गांव की पृष्ठभूमि से आये थे तो हर चीज को फालो कर रहे थे। दोनों भाई जिनके बीच मकान और गांव के जमीन को लेकर युद्व होना था, हर संस्कार को फालो कर रहे थे। हमारे बाद जो डेड बाॅडी आयी थी, वह शायद यहीं के निवासी हो चुके थे और समय की अहमियत समझते थे। उसी पंडित ने उनका दाह संस्कर हमसे पहले करवा दिया और चले भी गये।। दाह वाली जगह में खूब हरी-भरी, पेड़-पौधे, शेड और पानी की सुविधा थी और जगह इतनी बड़ी कि उसकी कीमत पांच सौ करोड़ से कम नहीं होगी और उस पर लिखा था ‘स्वर्ग लोक’। -एक पाठक, दिल्ली