बनभूलपुरा (हल्द्वानी) की घटना में शासन-प्रशासन की भूमिका की न्यायिक जांच की मांग; उत्तराखण्ड सरकार का पुतला दहन

हल्द्वानी के बनभूलपुरा में 8 फ़रवरी के प्रकरण, जिसमें एक मदरसा और नमाज स्थल ढहाने के बाद भड़की हिंसा में पुलिस फायरिंग में 5-6 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि फायरिंग व पथराव में बड़ी संख्या में आम नागरिक, पुलिसकर्मी और पत्रकार घायल हैं तथा चारों ओर तनाव पसरा हुआ है, में शासन-प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़ा करते हुये रामनगर एवं रुद्रपुर में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा भारत की राष्ट्रपति एवं मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन प्रेषित कर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में पूरे मामले की न्यायिक जांच कर गुनहगारों को सजा देने की मांग की गई है। साथ ही जांच निष्पक्ष हो सके इसके लिये जिले के पुलिस व प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों के निलंबन व स्थानांतरण की भी मांग की गई है तथा बनभूलपुरा के आम नागरिकों पर कठोर धाराओं में मुक़दमे दर्ज करने, मनमानी गिरफ्तारी और दमन पर रोक लगाने इत्यादि मांगों को प्रस्तुत किया गया है।

ज्ञापन में सवाल खड़ा किया गया है कि जब 3 फरवरी को प्रशासन कथित मदरसे और नमाज स्थल को सील कर अपने कब्जे में ले चुका था और उसके बाद दूसरा पक्ष भी उच्च न्यायलय में अपनी याचिका लगा चुका था, जिस पर उच्च न्यायालय ने सुनवाई हेतु 14 फ़रवरी की तारीख भी मुकर्रर कर दी थी, तब ऐसी क्या आपात स्थिति आ गई थी कि शासन-प्रशासन द्वारा 8 फरवरी को ही आनन-फानन में भारी पुलिस बल लगाकर विवादित जगह को ढहा दिया गया। 
    
इसके अलावा ज्ञापन में कहा गया है कि जब बनभूलपुरा के पूरे ही क्षेत्र को अतिक्रमण के नाम पर हटाने पर 5 जनवरी, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई है और पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है तब फिर इसके एक छोटे से हिस्से, जिसे मदरसा व नमाज स्थल बताया जा रहा है, को ढहाने की प्रशासन को भला क्या सूझी ?
    
इसी तरह ज्ञापन में सवाल खड़ा किया गया कि जब खुफिया विभाग द्वारा प्रशासन को स्पष्ट जानकारी दी जा चुकी थी कि यदि बुल्डोजर की कार्यवाही होती है तो इसका स्थानीय नागरिकों की ओर से भारी विरोध होगा तब शासन-प्रशासन द्वारा ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्टों को क्यों नजरअंदाज किया गया? क्या प्रशासन पर कोई राजनीतिक दबाव था? 
    
ज्ञापन में कहा गया कि आज सत्ता में मौजूद फ़ासीवादी ताकतें पूरे देश में सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति कर रही हैं और उत्तराखंड को भी लगातार इस नफरत भारी राजनीति की प्रयोगशाला बनाने की कोशिशें हो रही हैं, खुद केंद्र के मंत्री और प्रदेशों के मुख्यमंत्री ‘‘लव जेहाद’’ और ‘‘लैंड जेहाद’’ जैसे आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं ऐसे में 8 फरवरी की प्रशासन की कार्यवाही तमाम संदेहों को जन्म दे रही है।
    
नैनीताल जिले के रामनगर में 12 फरवरी को उपजिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन प्रेषित करने की कार्यवाही में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, इंकलाबी मजदूर केंद्र, किसान संघर्ष समिति, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति एवं परिवर्तनकामी छात्र संगठन के प्रतिनिधि एवं अन्य प्रबुद्ध नागरिक शामिल रहे; जबकि रुद्रपुर में इंकलाबी मज़दूर केंद्र, मजदूर सहयोग केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, भाकपा, भाकपा माले, समता सैनिक दल, लुकास टी वी एस एवं इंट्रार्क मजदूर संगठन के प्रतिनिधिनियों ने जिलाधिकारी के माध्यम से अपना ज्ञापन प्रेषित किया।    
    
हरिद्वार में 11 फरवरी 2024 को विभिन्न सामाजिक संगठनों ने मिलकर बीएचईएल के सेक्टर 4 के चौराहे पर हल्द्वानी में हुई सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में सभा कर उत्तराखंड सरकार का पुतला दहन किया।
    
सभा में वक्ताओं ने कहा कि धामी सरकार अतिक्रमण हटाने के नाम पर वर्षों से बसी आबादी को उजाड़ने की जिद पर अड़ी है। इस नीति ने बीते एक वर्ष से पूरे प्रदेश में जनता को परेशान कर रखा है। आये दिन बुलडोजर से बस्ती उजाड़ना इस सरकार का प्रिय खेल बन चुका है। प्रदेश में कई बस्तियां उजाड़ हजारों लोगों के सिर से छत छीनी जा चुकी है और लाखों लोग कभी भी सिर से छत छीने जाने की आशंका में जी रहे हैं। आये दिन अवैध अतिक्रमण के नाम पर मजारें ध्वस्त करने की खबरें प्रसारित कर हिन्दू फासीवादी यह प्रचारित करने में जुटे हैं कि मुस्लिम ही ज्यादातर अतिक्रमणकारी हैं। इस तरह सरकार प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहती है।
    
कार्यक्रम में प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, इंकलाबी मजदूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, एवरेडी मजदूर यूनियन, सिमेंस वर्कर्स यूनियन (सी एंड एस इलेक्ट्रिक लिमिटेड), भेल मजदूर ट्रेड यूनियन, राजा बिस्किट मजदूर संगठन आदि शामिल रहे।            -विशेष संवाददाता

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