चन्द्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम

/chandrashekhar-azad-ke-shahadat-diwas-par-vibhinna-programme

27 फरवरी 2025 को अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद के शहादत दिवस के अवसर पर इमके, प्रमएके, पछास व क्रालोस ने मिलकर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया और आजाद के दिखाये रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।

पंतनगर- 27 फरवरी 2025 को इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं ठेका मजदूर कल्याण समिति पंतनगर द्वारा शहीद स्मारक पंतनगर पर सभा में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के चीफ, आजादी के नायक शहीद चन्द्रशेखर आजाद को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई।
    
सभा में वक्ताओं ने कहा कि शहीद चन्द्रशेखर आजाद सामंत, राजा-रजवाड़े, विदेशी अंग्रेजी साम्राज्यवादियों के कट्टर दुश्मन और मजदूर वर्ग की सच्ची, पूर्ण आजादी के हिमायती थे। वे हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एकता के समर्थक और कट्टरता के खिलाफ थे।

रुद्रपुर- अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस के अवसर पर 27 फरवरी को क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के बैनर तले शहीद अशफाक उल्ला खां पार्क, खेड़ा कालोनी, रुद्रपुर (उत्तराखंड) में श्रद्धांजलि सभा की गई। उसके पश्चात खेड़ा कालोनी में जुलूस निकालकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। अमर शहीदों के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में चंद्रशेखर आजाद की तस्वीर पर पुष्प अर्पित किये गए।
    
श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद 25 साल से भी कम उम्र में 31 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। 
    
चंद्रशेखर आजाद ने अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल सहित अनेक क्रांतिकारी शहीदों के साथ मिलकर 9 अगस्त 1925 को काकोरी नामक स्थान पर ब्रिटिश हुकूमत के खजाने को लूटा था। जिसे काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना में शामिल सभी क्रांतिकारियों को ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था। अशफाक उल्ला खां सहित चार क्रांतिकारियों को ब्रिटिश हुकूमत ने दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया था। किन्तु चंद्रशेखर आजाद को ब्रिटिश हुकूमत जीते जी कभी नहीं पकड़ सकी।
    
वक्ताओं ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद ने शहीदे आजम भगतसिंह के साथ ऐसे ही कई एक्शनों में भाग लिया था। लाला राजपत राय जी की हत्या के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उसकी ही भाषा में सबक सिखाने को ब्रिटिश अफसर स्काट की हत्या हेतु लिए गए एक्शन में भी वे और भगतसिंह साथ थे। 9 फरवरी 1928 को दिल्ली में देशभर से आये क्रांतिकारियों की हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे। इस बैठक में भगतसिंह के प्रस्ताव पर क्रांतिकारी दल का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया। दल का उद्देश्य भारत में भी रूस की तर्ज पर मजदूर राज यानी समाजवाद की स्थापना करना निर्धारित किया गया। चंद्रशेखर आजाद को दल का अध्यक्ष और कमाण्डर इन चीफ (सेनापति) बनाया गया।1929 में रालेट एक्ट और मजदूर विरोधी श्रम कानूनों के विरोध में ब्रिटिश एसेम्बली में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बहरी ब्रिटिश हुकूमत को सुनाने को जो बम फेंका गया, पर्चे बांटे गए उस एक्शन की प्लानिंग भी चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में हुई बैठक में ही बनाई गई थी।
    
वक्ताओं ने कहा कि आज चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों की इस पाक धरती की गद्दी पर संघ-भाजपा और बड़े पूंजीपतियों का नापाक गठजोड़ कायम हो गया है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा हमारे देश के नागरिकों को बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड़कर बेइज्जती करते हुए भारत छोड़ा गया। किन्तु राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्र का नारा उछालने वाले सत्ताधीशों की इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई। जिससे स्पष्ट हो गया कि इनका राष्ट्रवाद फर्जी है; इस देश के अल्पसंख्यकों, मजदूरों और आम जनता के खिलाफ ही लक्षित है।

बरेली- बरेली में पी डब्लू डी के भीतर ‘प्रेरणा सदन सभागार’ में अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय ‘‘शहीदों की क्रांतिकारी विरासत और बढ़ता हिंदू फासीवादी खतरा’’ रखा गया था।

लालकुआं- अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की शहादत दिवस पर काररोड बिन्दुखत्ता लालकुआं में इंकलाबी मजदूर केन्द्र और प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र द्वारा संयुक्त रूप से श्रृद्धांजलि सभा एवं ‘‘शहीदों की विरासत और मौजूदा चुनौतियां’’ विषय पर चर्चा मण्डल का आयोजन किया गया।

हल्द्वानी- हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में पछास, प्रमएके और क्रालोस ने सभा कर चंद्रशेखर आजाद को याद किया और उनके सपनों के समाजवादी भारत की लड़ाई को  आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।  
        -विशेष संवाददाता
 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।