बीते दिनों एक मनोरंजक वाकया घटित हुआ। दुनिया के पहले ट्रिलेनियर (खरबपति) एलन मस्क ने अम्बानी पर हमला बोलते हुए कहा कि अम्बानी ने टेलीकाम क्षेत्र में भारत में एकाधिकार कायम कर लिया है और मोदी सरकार उनके स्टारलिंक को भारत में आने की छूट न देकर अम्बानी के हित में काम कर रही है। इस तरह भारत के असली प्रधानमंत्री अंबानी हैं।
मस्क के इस बयान पर भारत सरकार सफाई देने लगी कि सरकार पर गलत आरोप लग रहा है और स्टारलिंक सारे प्रावधान पूरे कर भारत में आ सकती है। स्टारलिंक को सुरक्षा सम्बन्धी छूट न देकर भारत आने से रोका हुआ है। उधर ट्रम्प के इस बयान पर राहुल गांधी ने तंज कसा कि अंबानी के साथ अडाणी भी सरकार चला रहा है और मस्क की कंपनी भारत आयेगी तो उसे दूसरे खिलाड़ी का पता चलेगा।
मामला बेहद साफ है कि भारत में टेलीकाम क्षेत्र में अम्बानी की जियो शीर्ष कम्पनी है और दुनिया के सबसे दौलतमंद इंसान की स्टारलिंक जियो को चुनौती देने के लिए भारत मे उतरना चाहती है और भारत सरकार जियो के हित में स्टारलिंक को नहीं आने दे रही है।
खरबपति मस्क इस मामले में बड़ी मासूमियत से खुद के साथ हो रहे अन्याय को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं मानो अम्बानी तो एकाधिकार कायम कर रहा हो पर मस्क एकाधिकारी न हो। वास्तविकता यही है कि मस्क की तमाम कम्पनियां अपने विभिन्न क्षेत्रों में एकाधिकार के दम पर ही मस्क को दुनिया का सबसे बड़ा इंसान बना पायी हैं। महज कुछ वर्षों में मस्क की दौलत 114 अरब डालर से 1000 अरब डालर के पार पहुंच गयी। इस मामले में उसकी दौलत भारत के अडाणी से भी तेज गति से बढ़ी। आज वह इस हैसियत में पहुंच गया कि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से दोस्ती व दुश्मनी खुलेआम कर रहा है। ढेरों देशों की सरकारें उसके इशारे पर नाच रही हैं। और यही मस्क भारत सरकार के उसकी दौलत के आगे न नाचने पर अपने साथ अन्याय व अम्बानी के एकाधिकार की शिकायत कर रहा है।
मस्क के बरक्स भारत के शीर्ष पूंजीपति अम्बानी-अडाणी काफी पीछे हैं और भारत सरकार इनके इशारों व हितों में काम कर रही है। ऐसे में स्टारलिंक के भारत में खुलेआम कारोबार की छूट के लिए जरूरी है कि मस्क मोदी को अम्बानी-अडाणी की जेब से निकाल अपनी जेब में डाल लें।
आज के एकाधिकारी पूंजीवाद यानी साम्राज्यवाद के दौर में मस्क-अम्बानी-अडाणी सभी एकाधिकारी हैं। आपसी प्रतियोगिता में ये न केवल सरकारों के नियम-कानून बदलवाते हैं बल्कि सरकारें गिराने व बदलने में भी लगे रहते हैं। इनकी प्रतिद्वन्द्विता-बाजार की होड़़ का परिणाम अपने मजदूरों का और क्रूर शोषण कर अपना मुनाफा बढ़ाना व प्रतियोगिता में टिकने का प्रयास होता है। ये भी परजीवी जोंके यही प्रतियोगिता कर रही हैं। सरकारें इनके इशारों पर नाच रही हैं।
ऐसे में इन जोंकों की बढ़ती मुनाफे की हवस ने मजदूर-मेहनतकशों के जीवन को कंगाली-भुखमरी तक पहुंचा दिया है। मजदूर वर्ग का हित इसी में है कि जल्द से जल्द इन जोंको व इनकी पालतू सरकारों से मुक्ति पा ले। ऐसा केवल इंकलाब से ही हो सकता है।