‘‘ग्रोथ की सांस अभी चल रही है..’’

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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मोदी सरकार आये दिन भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी विकास दर के कसीदे गढ़ती है। कहा जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। और बस चंद साल ही बचे हैं जब भारत दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था (स.रा.अमेरिका व चीन के बाद) बन जायेगा। 
    
ऐसी बातों के बीच एक खबर ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ में छपती है जो कहती है, ‘‘एच डी एफ सी म्यूच्युल फण्ड की रिपोर्ट बताती है कि तमाम झटकों के बीच भी ग्रोथ की सांस अभी चल रही है’’। (बिजनेस स्टैण्डर्ड 23 जनवरी)
    
यह कटु स्वीकारोक्ति है। कुछ अप्रचारित तथ्य व सभी की जानकारी में आयी बातें इसकी तस्दीक करती हैं। निम्न तथ्यों पर गौर किया जाए। 
 
* अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई एम एफ) के अनुसार भारत का ऋण- जीडीपी के 80 फीसदी से अधिक है। यानी भारत देशी-विदेशी निजी-सार्वजनिक ऋण के जाल में फंसा हुआ है।

* भारत के राजस्व व्यय का 28 फीसदी वेतन; 15 फीसदी पेंशन; 25 फीसदी मौजूदा ऋण पर ब्याज; 15 फीसदी सब्सिडी व कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है। यानी कर्ज में डूबी भारत सरकार और उसके मंत्रियों-अधिकारियों-फौजी अफसरों-सांसद- विधायकों व कर्मचारियों (घटते) पर भारत के राजस्व का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। भारत के मजदूरों-किसानों के हिस्से जिनकी संख्या करोड़ों में है नाम मात्र का ही हिस्सा आता है। यही कारण है कि भारत की शिक्षा-रोजगार-स्वास्थ्य का इतना बुरा हाल है।
 
* भारत का माल व्यापार घाटा बढ़ा है। 
 
* विदेशी निवेशक निकासी बढ़ा रहे हैं।
 
* रुपया डालर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। इस वक्त वह प्रति डालर 91.99 रुपये के स्तर से नीचे गोता लगाने को तैयार है। यानी व्यापार घाटा और महंगाई दोनों बढ़ेंगी।
 
* भारत के राजस्व में वृद्धि नहीं हो रही है।

* भारत में पारिवारिक बचत में गिरावट आ रही है। अब यह 10 फीसदी से घटकर 7 फीसदी हो गयी है।

* सोने का दाम प्रति दस ग्राम 1 लाख 58 हजार के पार जा चुका है।
    
उपरोक्त तथ्य यह बतलाने को पर्याप्त है कि मोदी सरकार भारत की अर्थव्यवस्था के विकास, मजबूती और भविष्य के बारे में जो दावे करती है, वे कितने सतही और झूठे हैं।  

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।