गुजरात में 12 घंटे कार्य के प्रावधान का विधेयक पारित

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गुजरात सरकार ने दिनांक 10 सितम्बर 2025 को गुजरात विधानसभा ने कारखाना अधिनियम 1948 में संशोधन करने वाले एक विधेयक को पारित कर दिया। संशोधन किये गए विधेयक में गुजरात सरकार ने काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिए हैं। विधेयक में कहा गया है कि किसी भी श्रमिक को सप्ताह में चार दिन कार्य करना होगा। यानि सप्ताह में काम के घंटे की सीमा 48 रखी गई है। इसके साथ ही विधेयक में यह भी जोड़ दिया गया है कि श्रमिक अगर सप्ताह में 6 दिन काम करना चाहता है तो इसमें श्रमिक की सहमति अनिवार्य होगी। 
    
इस कानून में ओवर टाइम घंटों की त्रैमासिक सीमा 75 घंटों से बढ़ाकर 125 घंटे कर दी गई है। इस विधेयक ने महिलाओं से रात्रि पाली में काम कराने की इजाजत दे दी है। 
    
गुजरात सरकार के उद्योग मंत्री बलवंत सिंह राजपूत ने इस विधेयक को मजदूरों के पक्ष का बताते हए कहा कि इस विधेयक से श्रमिकों के हितों की रक्षा होगी और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। उद्योग मंत्री ने कहा कि इससे गुजरात का विकास भी होगा। 
    
केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने गुजरात सरकार के इस फासीवादी फरमान की सिर्फ मुंहजबानी निंदा की है। 
    
मोदी सरकार ने 44 केन्द्रीय श्रम कानूनों को खत्म कर 4 श्रम संहिताओं में समेट कर इन श्रम संहिताओं में श्रम विरोधी प्रावधान कर दिए हैं। 8 घंटे कार्यदिवस की जगह पर 12-12 घंटे कार्य का प्रावधान इन्हीं मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं में शामिल है। हड़ताल करने का संवैधानिक अधिकार, यूनियन बनाने का संवैधानिक अधिकार, स्थाई कार्य पर स्थाई रोजगार का कानूनी प्रावधान इत्यादि सब मजदूर अधिकारों को कमजोर कर निष्क्रिय बना दिया गया है। मोदी सरकार द्वारा पारित इन श्रम संहिताओं को अघोषित तौर पर लागू किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारें इन श्रम संहिताओं के प्रावधानों को कानून बना कर लागू कर रही हैं। गुजरात सरकार का यह कदम मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को लागू करने की कवायद है।
    
गुजरात सरकार द्वारा कारखाना अधिनियम में बदलाव कर 8 घंटे की जगह 12 घंटे का कार्यदिवस के पीछे का तर्क यह है कि इससे गुजरात का विकास होगा और श्रम अधिकारों की रक्षा होगी, मजदूरों को पहले की तुलना में ज्यादा मजदूरी मिलेगी। गुजरात सरकार का यह दावा विशुद्ध धोखा है कि मजदूर सप्ताह में 4 दिन ही 12 घंटे कार्य कर सकता है, अगर वह पूरे सप्ताह कार्य करेगा तो उसकी सहमति अनिवार्य होगी। हम व्यवहार में देख रहे हैं कि फैक्टरी की चारदिवारी के भीतर श्रम कानूनों की क्या हालत है। लम्बे समय से मजदूर, खासकर ठेका मजदूर 12-12 घंटे कार्य पहले से ही कर रहे हैं। क्योंकि बढ़ती महंगाई ने मजदूरों को मजबूर किया कि वह 12-12 घंटे कार्य करे। ओवर टाइम की क्या हालत है यह हम देख ही रहे हैं कि ठेका मजदूरों को न तो ओवर टाइम का डबल भुगतान किया जाता और न ही बोनस दिया जाता है। मजदूरों की सहमति फैक्टरी में कोई मायने नहीं रखती जो भी मायने रखता है वह है फैक्टरी मालिकों के अपने कानून। नौकरी का डर व भय दिखा कर मजदूरों से जबरदस्ती ओवर टाइम करवाया जाता है और यहां तक कि रविवार को भी मजदूरों से कार्य करवाया जाता है। श्रम संहिताओं में ‘‘रखो व निकालो’’ की छूट देकर मोदी सरकार ने मालिकों का काम और भी आसान कर दिया है।
    
मोदी सरकार, श्रम संहिताओं को अब इसी तरह से टुकड़ों-टुकड़ों में लागू करेगी। इसी तरह व्यवहार में इन श्रम संहिताओं को एक-एक राज्य में लागू किया जा रहा है। एक बड़ा देशव्यापी मजदूर आंदोलन ही जो वर्गीय गोलबंदी पर टिका हो, वही मोदी सरकार के इस फासीवादी फरमान को पीछे धकेल सकता है।  
 

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