विदेशी धरती से भारत के प्रधानमंत्री ने जब भारत की अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि दर (7.8 प्रतिशत) के लिए देश के लोगों को बधाई दी तब लोगों को पहले आश्चर्य हुआ फिर लोगों को शक हुआ और अंत में लोगों ने उसे मजाक का विषय बना दिया।
विदेश से मोदी जब देश में लौटे तो उन्होंने पाया कि देश में जश्न का तो कोई माहौल ही नहीं है तो उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ के बाद ‘नाराज फूफा’ का नया जुमला उछाला। किसी शादी-ब्याह के घर में एक-दो नाराज फूफा तो चल सकते हैं परन्तु तब क्या होगा जब सारे घराती-बाराती नाराज फूफा की तरह व्यवहार करने लगें। मोदी के दुर्भाग्य से देश में दिमागी नक्सल के साथ-साथ नाराज फूफाओं की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। जिस नाराज फूफा, सुभाष गर्ग ने, मोदी सरकार के 7.8 फीसदी वृद्धि दर की पोल खोली, वे तो कुछ समय पूर्व, उनके पसंदीदा वित्त सचिव थे। रिटायर होने के कई साल बाद सुभाष गर्ग ने मोदी सरकार के आंकड़ों की बाजीगरी की पोल खोल कर रख दी। सुभाष गर्ग को कोई ‘घर का भेदी लंका ढाये’ भी नहीं कह सका।
जिस मामले में मोदी देश को विदेश से बधाई दे रहे थे वह असल में कोई बड़ा मामला नहीं है। उससे बड़ा मामला तो पिछले दिनों हो चुका था। और इस मामले में मोदी एण्ड कम्पनी एकदम चुप्प लगा कर बैठ गयी। हुआ यूं कि मोदी सरकार दावा कर रही थी भारत जल्द ही तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था (या 5 ट्रिलियन डालर) बन जायेगा। परन्तु वह अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद चैथे या पांचवे स्थान के लिए कभी जापान, कभी यूनाइटेड किंगडम, कभी फ्रांस से जूझता रहता है। कुछ समय पहले जापान चैथे, यूके पांचवे और भारत छठे स्थान पर पहुंच गया था। असल में जापान, यूके व भारत की अर्थव्यवस्था (फ्रांस की भी) करीब 4 ट्रिलियन डालर की है। ये अमेरिका (32.1 ट्रिलियन डालर) व चीन की (20.2 ट्रिलियन डालर) अर्थव्यवस्था से बहुत-बहुत पीछे हैं तो तीसरे नम्बर की जर्मनी (5.45 ट्रिलियन डालर) से कुछ पीछे हैं। मोदी सरकार देश की जनता की आंखों में आंकड़ों की धूल झोंककर धोखा देती रहती है।
हालिया मामले में मोदी सरकार ने वर्ष 26-27 की पहली तिमाही में जो 7.8 फीसदी की वृद्धि दर हासिल की वह आधार वर्ष 2011-12 को 2022-23 करने से हुई है। और इस आधार पर पहले के वर्षों के आंकड़े, उन आंकड़ों के आधार पर सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे और लूटी गयी वाह वाही, सब कुछ शक के दायरे में आ जाते हैं। या तो मोदी सरकार पहले झूठ बोल रही थी या फिर अब झूठ बोल रही है या दोनों बार ही झूठ बोल रही है। तीसरी बात की संभावना सबसे ज्यादा है कि वह दोनों बार ही झूठ बोल रही हो।
भले ही आंकड़ों में हेरा-फेरी करके कुछ भी साबित किया जा सकता हो परन्तु वास्तविक जीवन में हेरा-फेरी की संभावना काफी कम है। हकीकत तो कुछ और ही बात बयान कर रही है। बेरोजगारी अपने चरम पर है। पिछले पचास सालों में इतनी बेरोजगारी कभी नहीं रही। और इसी तरह महंगाई अपने चरम पर है। खाद्य पदार्थों खासकर तेल, चीनी, आटा, चावल, सब्जियों में लगातार बढ़ रही महंगाई ने पहले से ही ईंधन के दामों खासकर गैस के दामों में लगातार हो रही तेजी से त्रस्त भारत के मजदूर-मेहनतकशों के जीवन को कठिन से और कठिन बना दिया है। मजे की बात है जो महंगाई आम मजदूर-मेहनतकशों का जीवन दूभर कर रही है, उस महंगाई का भारत की अर्थव्यवस्था में दिखायी जा रही वृद्धि में अपना विशेष योगदान है। महंगाई को अर्थशास्त्र की भाषा में मुद्रास्फीति कहा जाता है जिसका अर्थ मुद्रा का फैलाव (स्फीति) है। मतलब कि पहले जो 1 किलो चीनी 45 रु. में मिल रही थी वह अब 65 रु. में मिल रही है। यानी 1 किलो चीनी के मामले में मुद्रा 20 रु. फैल गयी। और इस बात को सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में लागू करें तो वह मुद्रास्फीति के कारण भी बढ़ा हुआ दिखायी देगा। मोदी जी यह नहीं बताते कि 7.8 फीसदी वृद्धि दर में महंगाई या मुद्रास्फीति की दर का कितना योगदान है।
इस वर्ष के दो लोकप्रिय जनउभार के पीछे बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी (बदहाल शिक्षा के साथ) ही थे। पहला जनउभार इस वर्ष के अप्रैल-मई माह में भारत के बेहद कम मजदूरी व बढ़ती महंगाई से हैरान-परेशान मजदूरों का था। और दूसरा जनउभार जून-जुलाई माह में छात्र-युवाओं का था जो बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होने से परेशान थे। पेपर लीक का मामला महज मेडिकल कालेज आदि में दाखिल तक नहीं सीमित था बल्कि विभिन्न तरह की नौकरियों के पेपर भी आये दिन लीक हो रहे हैं, से भी जुड़ा हुआ था।
मोदी सरकार किसी भी कीमत पर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होगी कि दोनों हालिया जनउभार के पीछे न केवल उसकी खराब अर्थनीति बल्कि फासीवादी ढंग से इस दौरान आंदोलनकारियों का दमन भी किया जाना था। वह तो छात्र-युवाओं के साहस, धैर्य व अनूठे तरीकों की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने मोदी की बेशुमार पैसे के दम पर करीने से गढ़ी गयी छवि को तार-तार कर दिया। अब मोदी जितनी अपनी छवि बनाने की कोशिश करेंगे उतना ही उस पर पलीता लगता जायेगा। ठीक यही वक्त है जब मोदी सरकार 7.8 फीसदी की वृद्धि दर का ढिंढोरा पीट रही है। इधर मोदी रील बनाते हैं उधर युवा और यहां तक कि बच्चे भी टूटी सड़कों, बदहाल स्कूल-अस्पताल की रील बनाने लगते हैं। मोदी की नीतियों, अभियानों, प्रचार व बातों का इतना बड़ा राजनैतिक भण्डाफोड़ का कार्यक्रम स्वतः स्फूर्त ढंग से, अपने ही तरीके से, बिना किसी खास प्रयास के रोज-रोज बढ़ता ही जा रहा है।
जहां तक भारत के मजदूर-मेहनतकशों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो आम तौर पर ही अर्थव्यवस्था में वृद्धि और वह भी तेज वृद्धि उनके लिए तात्कालिक तौर पर अच्छी ही होती है। रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और मजदूरी के भी बढ़ते रहने की संभावना होती है। परन्तु किसी भी फैक्टरी या औद्योगिक शहर में काम करने वाला मजदूर अपने ही अनुभव से जानता है कि तेजी के बाद मंदी का दौर आता है। और बार-बार मंदी के आने का दुष्चक्र कभी खत्म नहीं होता। और पूंजीवाद में ऐसा होते रहना एक नियम है। ठीक इसी नियम की तरह ही बेरोजगारी भी है। बेरोजगार एक रिजर्व सेना के समान है जिसका इस्तेमाल पूंजीपति व उसकी सरकार मजदूरी को नीचे गिराने व मजदूरों पर कठोर नियंत्रण के रूप में करती है। और जो बात मंदी, बेरोजगारी पर लागू होती है वही बात थोड़ा भिन्न अर्थ में महंगाई पर लागू होती है। इस तरह मजदूर मेहनतकशों के जीवन में गरीबी, अभाव व असमानता का पूंजीवादी जहर घुला ही रहता है। और यह सच्चाई हर मजदूर जानता है कि जब फैक्टरी दबा कर चल रही हो तब मजदूर ‘फैक्टरी हित’ में बिना मजदूरी बढ़ाने की मांग किये भलमनसाहत में काम करें; की मांग फैक्टरी मालिक द्वारा की जाती है। और जब फैक्टरी की हालत ठीक न हो वह ‘फैक्टरी हित’ में चुप रहें, सहन करें और हो सके तो अपने बकाया वेतन आदि को छोड़ दें। यहां तक कि काम तक छोड़ दें। मतलब हर हाल में पूंजीपति के हितों के मातहत अपने को रखें।
आज के हालात देखे जाएं तो हर मजदूर-मेहनतकश सालों-साल से ठहरी हुयी मजदूरी, बढ़ती महंगाई, सर पर हर वक्त नाचती बेरोजगारी की तलवार, तंगहाल जेब, अभाव से हैरान-परेशान है। मोदी की रील वाली जुमलेबाजी पर वह क्या तो कान और क्या तो ध्यान दे। उसकी स्थिति उसे नाराज फूफा बनाने लायक भी नहीं है। वह तो पूंजीवाद में सिर्फ कोल्हू का बैल है। बैल जब तक काम करे तब तक उसे खाने को घास मिले और जब काम के लायक न रहे तो वह भूखा मरे। इसीलिए मजदूर-मेहनतकशों के सामने क्या रास्ता बचता है। वही रास्ता बचता है जो कभी पेरिस कम्यून के मजदूरों ने तो कभी रूस के मजदूरों ने दिखाया था। यानी पूंजीवाद की सत्ता के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकना और मजदूरों का राज कायम करना।