जमुई कांड मोरल पुलिसिंग का भयानक परिणाम है

Published
Sat, 09/26/2026 - 15:50

19 सितम्बर को बिहार के जमुई में एक घटना घटित हुई जिसने सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया। यह घटना थी दसवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न की। सोशल मीडिया पर खबर फैलने के बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी की कोशिशें तेज़ की जाती हैं और मुख्य अभियुक्त को पैर में गोली मारकर गिरफ्तार कर लिया जाता है। ठीक उत्तर प्रदेश की पुलिस की तरह।

दरअसल 19 सितंबर को एक छात्रा अपने सहपाठी के साथ बाइक पर कोचिंग से लौट रही थी। रास्ते में वे एक जगह फोटो खींचने के लिए रुकते हैं। उसी समय कुछ गुंडे उनको घेर लेते हैं और उनसे पूछताछ के नाम पर बदतमीज़ी करने लगते हैं। छात्रा का सहपाठी उसको गुंडों से बचाने की कोशिश करता है। लेकिन बदतमीज़ी बढ़ते-बढ़ते छात्रा के यौन उत्पीड़न तक जा पहुंचती है। ऐसी घटना मार्च 2026 में ही नालंदा में घटित हो चुकी है।

इस घटना ने सोशल मीडिया पर भूचाल तो ला ही दिया साथ ही कई तरह के सवालों को जन्म भी दे दिया। लोग तरह-तरह से घटना की व्याख्या करते हुए दोषियों पर सख्त कार्यवाही की मांग करने लगे। घटना पर सबसे खराब टिप्पणी जद यू के प्रदेश अध्यक्ष ने की। उन्होंने इसे छिटपुट घटना बताया। वहीं जमुई की विधायक और मंत्री श्रेयशी ने कहा कि मोरल पुलिसिंग सभ्य व शालीन तरीके से भी की जा सकती है। यानी वे इस बात को स्वीकार करती हैं कि अगर कोई महिला या लड़की अपने पुरुष मित्र के साथ जा रही है तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। उसके साथ पूछताछ जायज है।

घटना के बाद मोदी, सम्राट चौधरी और नयी-नयी विधायक बनी मिथिला के विडिओ भी वायरल हो रहे हैं जिसमें वे बिहार में महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। दरअसल इस घटना ने उनके इन दावों की हवा निकालकर असली तस्वीर सामने ला दी।

पुलिस ने जमुई कांड के आरोपियों को पकड़ने की कोशिशें उस समय शुरु की जब यह विडिओ सोशल मीडिया पर वायरल हुई साथ ही उसने उन लोगों पर भी कार्यवाही की है जिन्होंने इस विडिओ को सोशल मीडिया पर डाला। सरकार और पुलिस प्रशासन का ऐसा करने का मकसद लोगों को डराना है ताकि ऐसी घटनाओं पर उनकी किरकिरी न हो।

दरअसल यह घटना भारतीय समाज में महिलाओं के साथ बढ़ रही यौन उत्पीड़न की घटना को तो दिखाती ही है साथ ही यह लम्बे समय से समाज में बढ़ रही मोरल पुलिसिंग को भी दिखाती है। जैसे 14 फरवरी (वेलेंटाइन डे) पर बजरंग दल के लोगों द्वारा पार्कों में बैठे पुरुष व महिला मित्रों का उत्पीड़न। यह मोरल पुलिसिंग महिलाओं के मामले में तो तुरंत ही नज़र में आ जाती है लेकिन और भी कई तरह की मोरल पुलिसिंग समाज में मौजूद है जिसको संज्ञान में लेना जरूरी है।

जब से हिंदू फासीवादी सत्ता में आये हैं तबसे खाने के मामले में भी मोरल पुलिसिंग की घटनायें समाज में बढ़ी हैं। किसी के घर में क्या बना है या कोई क्या खाने का सामान लेकर जा रहा है, या किसी खास समय पर क्या नहीं खाया जायेगा इसकी निगरानी समाज में हो रही है। खाने के मामले में मोरल पुलिसिंग करने वाले मारपीट करने के साथ लोगों की जान भी ले लेते हैं।

हिंदू फ़ासीवादियों ने समान नागरिक संहिता के रूप में ऐसा ही कानून बनाया है जो समाज में मोरल पुलिसिंग को बढ़ाकर पुलिस प्रशासन को भी इसमें शामिल कर लेता है और समाज में महिलाओं के अधिकारों पर चोट करता है।

दरअसल मोरल पुलिसिंग संविधान के नियमों से अलग हटकर शासन कर रहे फासीवादियों की सोच का परिणाम है। नैतिकता कायम करने के नाम पर यह समाज में एक लम्पट गिरोह को पैदा करते हैं जो खुद किसी नैतिकता को नहीं मानता। यह समाज में मौजूद पुरानी सोच और पूर्वाग्रहों का फायदा उठाते हैं और समाज में आतंक का राज कायम करते हैं। लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप कर वह उन्हें अपने अनुसार चलने को बाध्य करते हैं। अतः हर तरह की मोरल पुलिसिंग का विरोध किया जाना जरूरी है।

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