कम्यूनार्ड का संकल्प -बर्टोल्ट ब्रेख्त

यह समझना कि यह हमारी कमजोरी है यह आपको अपने कानूनों को पारित करने में सक्षम बनाता है हम भविष्य में नम्रता को त्यागने का संकल्प करते हैं और यहां का कानून हमारे कारण को सही ठहराएगा यह जानकर कि आपने हमें बंदी बना लिया है सिर पर भरी हुई पिस्टल लिए हम भविष्य में आपकी यातना से नहीं डरने का संकल्प लेते हैं गुलामी मौत से भी बदतर है यह जानकर कि आप हमें भूखा रखते हैं ताकि तुम्हारे पास और भी बहुत कुछ हो हम संकल्प करते हैं कि वह सब जो हमें पेंट्री से दूर रखता है दरवाजा तोड़कर काबू पाया जा सकता है यह जानकर कि आपने हमें बंदी बना लिया है सिर पर भरी हुई पिस्टल लिए हम भविष्य में आपकी यातना से नहीं डरने का संकल्प लेते हैं गुलामी मौत से भी बदतर है यह जानकर कि आप हमें बेघर रखते हैं जबकि हमारे आस-पास घर अनुपयोगी खड़े हैं हमने अब अतिक्रमण को खत्म करने का संकल्प लिया है अब से हर कार्यकर्ता को आवास दिया जाएगा यह जानकर कि आपने हमें बंदी बना लिया है सिर पर भरी हुई पिस्टल लिए हम भविष्य में आपकी यातना से नहीं डरने का संकल्प लेते हैं गुलामी मौत से भी बदतर है यह समझते हुए कि हम आपको राजी नहीं करेंगे हमें एक बेहतर मजदूरी का भुगतान करने में हम संकल्प करते हैं कि हम आपसे फैक्ट्रियां लेंगे यह जानकर कि आपका नुकसान हमारा लाभ होगा यह जानकर कि आपने हमें बंदी बना लिया है सिर पर भरी हुई पिस्टल लिए हम भविष्य में आपकी यातना से नहीं डरने का संकल्प लेते हैं गुलामी मौत से भी बदतर है यह समझते हुए कि हम निर्भर नहीं रह सकते हमारे शासक जो भी वादे करते हैं उन पर हमने अपने लिए संकल्प लिया है कि अच्छे जीवन की शुरुआत आजादी से होती है हमारा भविष्य हमारे हुक्म से बनना चाहिए यह समझते हुए कि तोपों की गर्जना ही केवल वे शब्द हैं जो आपसे बात करते हैं हमें आपको यह साबित करना होगा कि हमने अपना सबक सीख लिया है भविष्य में हम आप पर बंदूक तानेंगे

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।