मनरेगा और वित्तमंत्री का अर्द्धसत्य बयान

बीते दिनों वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में बताया कि मनरेगा के तहत काम की मांग लगातार गिर रही है। इस तरह इस बयान के जरिये वित्त मंत्री ने यह दिखलाने की कोशिश की कि भारतीय अर्थव्यवस्था सुधर रही है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों को दूसरे क्षेत्रों में रोजगार मिल रहा है इसलिए वे मनरेगा में कम संख्या में काम मांगने आ रहे हैं।

वित्त मंत्री की उपरोक्त बातें अर्द्धसत्य ही थीं। वित्तमंत्री यह बताना भूल गयीं कि मनरेगा में काम की मांग बीते 2 वर्षों में कोविड काल में मजदूरों के गांवों को पलायन के चलते बढ़ गयी थी। अब कोविड प्रतिबंध हटने से मजदूरों की आबादी फिर से शहरों का रुख कर चुकी है और इस वजह से आंकड़ों में मनरेगा में काम मांगने वाली आबादी कम होती दिख रही है।

तालिका-1 से स्पष्ट है कि 2020-21 में मनरेगा में काम मांगने वालों की तादाद 13.32manrega करोड़ व्यक्तियों व 8.55 करोड़ घरों तक पहुंच गयी थी। यह कोविड काल था। इसके बाद से यह गिरना शुरू हुआ पर 2018-19 से तुलना करें तो यह मांग घटने के बजाय 2022-23 में बढ़ी ही है। जबकि 2022-23 के आंकड़े दिसम्बर 22 तक के हैं यानि अगले 3 माह में इसमें और वृद्धि ही होगी।

आज भी मनरेगा में 8 करोड़ से ऊपर लोग काम मांग रहे हैं। यह स्थिति कहीं से भी अर्थव्यवस्था की सुखद तस्वीर नहीं दिखलाती। इसके अलावा यह आंकड़ा भी देहातों में बदहाली की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखलाता। मनरेगा में बेहद कम दिहाड़ी और बड़ी तादाद में लम्बित मजदूरी भी काम के इच्छुक लोगों को मनरेगा से दूर ले जाने का काम करती है।

13 दिसम्बर को संसद में मंत्री साध्वी निरंजन ने बताया कि देश में मनरेगा मजदूरों का 4447.92 करोड़ रु. सरकार पर बकाया है। पं. बंगाल में यह राशि 2744.76 करोड़ रु. है जिसमें केन्द्र सरकार पर बकाया 68 प्रतिशत है। केरल के लिए बकाये की राशि 456.2 करोड़ रु., तमिलनाडु में 210.74 करोड़ रु. है। 12 राज्यों में बकाया राशि 40 करोड़ रु. से ऊपर है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में काम की इच्छुक आबादी के मनरेगा से दूर होने का कारण समझ में आता है।

अतः वास्तविकता यह नहीं है कि देश आर्थिक विकास की पटरी पर लौट चुका है जैसा वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण देश को बताना चाहती हैं। वास्तविकता यही है कि देहातों की हालत बेहद दयनीय बनी हुई है। शहरों में भी काम के मिलने की घटती संभावना ने देहातों पर दबाव बेहद बढ़ा दिया है। परिणाम यह हुआ कि देहातों में जिन कामों में लोगों को पहले 20-25 दिन प्रतिमाह काम मिल जाता था अब घटकर वह 10-15 दिन प्रतिमाह रह गया है। खेती की बदहाली देहातों की मजदूर आबादी की दुर्दशा और बढ़ा देती है।

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि