मोदी ये ना करे तो क्या करे

आम चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद कुछ ऐसा हुआ कि मोदी एण्ड कम्पनी को लगने लगा कि चुनाव जीतना है तो अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा। मोदी का ब्रह्मास्त्र क्या था। मुसलमानों को राक्षस, आक्रान्ता आदि के रूप में दिखाओ और हिन्दुओं का भयादोहन करो। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा हवा-हवाई नारा था। असल नारा तो मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’, ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वाला’ आदि गालियां देना है। ‘वोहरा मुसलमान’, ‘शिया मुसलमान’, ‘पसमांदा मुसलमान’ जिनको कल तक मोदी-भाजपा-संघ को अपने खेमे में लाना था अब सब घुसपैठिये, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हो गये। पहले चरण के मतदान के तुरंत बाद मोदी ने अपने चेहरे पर अपने आप चढ़ा हुआ नकाब खुद ही उतार फेंका। दूसरे, तीसरे, आदि चरण के बाद मोदी का कौन सा चेहरा सामने होगा। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, साम्प्रदायिक उन्माद के लिए अब और खराब बातें मोदी एण्ड कम्पनी करेगी। 
    
असल में मोदी ये ना करे तो क्या करे। यही उनका चुनाव जीतने का मूल मंत्र रहा है। गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा ऐसे ही किया गया है।  

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मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

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सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।