मक्का रक्षा समझौता

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/mecca-defence-pact

7 अगस्त को तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, साऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का में एक रक्षा समझौते की घोषणा की। इससे पहले साऊदी अरब व पाकिस्तान बीते वर्ष इसी तरह का समझौता कर चुके थे। इस परस्पर रक्षा समझौते में यह प्रावधान शामिल है कि किसी भी एक देश पर हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जायेगा। 
    
इस तरह यह समझौता एक नये क्षेत्रीय गठबंधन की शुरूआत की संभावना लिये हुए है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका-ईरान तनाव में यह समझौता किस पाले की ओर झुका हुआ है। संकेत इसी के मिल रहे हैं कि इस तनाव में यह समझौता अमेरिकी छत्रछाया से निकल एक स्वतंत्र गठबंधन बनाने का प्रयास है। 
    
पाकिस्तान परमाणु सम्पन्न देश है तो तुर्की द्रोण प्रौद्योगिकी व रक्षा विनिर्माण क्षमता में अग्रणी है व साऊदी अरब वित्तीय शक्ति है। ऐसे में इन तीनों देशों का एक साथ आना अपने आप में एक बड़ी ताकत बन सकता है। 
    
हालिया अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बीच साऊदी अरब व अन्य अरब मुल्कों ने पाया कि अमेरिका उनकी रक्षा करने के बजाय उन पर ईरानी हमले का कारण बन रहा है। इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को ईरान ने निशाना बनाया। ऐसे में साऊदी अरब व कई अन्य अरब के देश अमेरिकी छत्रछाया से निकल अपने स्वतंत्र विकल्प तलाशने में जुट गये हैं। यह समझौता भी उसी दिशा में एक प्रयास है। 
    
यद्यपि ये देश अभी इजरायल व ईरान दोनों से एक निश्चित दूरी बनाते दिख रहे हैं। पर फिर भी ये गठबंधन अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए भविष्य में परेशानी का सबब बन सकता है।
    
भारत के विस्तारवादी शासक जो पाकिस्तान को अपना लम्बे समय से दुश्मन मानते रहे हैं, इस समझौते से पाकिस्तान की ताकत बढ़ने के प्रति सशंकित हैं।
    
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस गठबंधन में अरब के बाकी देश शामिल किये जायेंगे कि नहीं। इजरायल के नेतन्याहू ने इसे सुन्नी गठबंधन करार दे ईरान के इससे दूर रहने का दावा किया। गठबंधन में शामिल तीनों देश सुन्नी बहुल हैं। जबकि ईरान शिया बहुल है। 
    
यह गठबंधन कितनी कारगर भूमिका निभाता है यह अभी भविष्य के गर्भ में है। पर यह इतना संकेत तो दे ही रहा है कि मध्य पूर्व में पुराने समीकरण बदल रहे हैं। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?