मोदी जी का भविष्य

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भारत ने एक बार फिर अपना स्वतंत्रता दिवस मना लिया। मोदी जी ने लाल किले की प्राचीर से जो कहना था, कह दिया। चंद लोगों के अलावा शायद ही किसी की आजकल इस बात में दिलचस्पी है कि वे क्या कहते हैं। और कैसे कहते हैं। देश में एक बहुत बड़ा तबका है जो चाहता है कि अब इस देश को मोदी से मुक्ति चाहिए।
    
मोदी से मुक्ति चाहने वालों की तादाद इस देश में दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। मोदी जी की खुलेआम प्रशंसा करने वाले लुप्त होते जा रहे हैं। वे आम नंगे समर्थक तो गायब ही हो गये हैं जो मोदी जी के बारे में एक लफ्ज सुनते ही आग-बबूला हो जाते थे। और किसी का भी सर फोड़ने को तैयार हो जाते थे। ‘खास’ समर्थकों की बात और है। 
    
पिछले ग्यारह सालों में उन लोगों के सिर से भी मोदी जी का भूत उतर गया है जो उन्हें अपने सिर पर चढ़ाये हुए थे। इस बात की तस्दीक तो पिछले वर्ष हुए आम चुनाव में भी अच्छे ढंग से हो गयी थी। भाजपा अपने दम पर बहुमत पाने से बहुत दूर हो गयी थी। नायडू व नीतिश कुमार जैसों के बगैर वे सत्ता पा ही नहीं सकते थे। 
    
आम चुनाव के बाद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ हर बीते दिन के साथ और नीचे गिरता गया है। और इसमें गिरावट, पहलगाम की आतंकी घटना (प्रायोजित, पूर्व नियोजित के सवालों के संग) के बाद और तेजी से आयी। ‘आपरेशन सिंदूर’, मोदी के माथे पर सफलता का तिलक नहीं लगा सका। और उससे भी बुरा यह हुआ है कि ‘युद्ध विराम’ का श्रेय मोदी के ‘परम मित्र’ डोनाल्ड ट्रम्प ने दोनों हाथों से लूट लिया। और अब भी लूटे जा रहे हैं और अब तो वे ‘शांति के नोबेल पुरूस्कार’ के प्रबल दावेदार बन गये हैं।
    
मोदी जी डोनाल्ड ट्रम्प के न तो ‘युद्ध विराम’ वाले दावे का विरोध कर सके और न फिर जब डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के ऊपर पचास प्रतिशत का शुल्क का बोझ डाल दिया तब वे ठीक से कुछ बोल सके। खाली देशी धरती में देशी हीरो बनने के लिए कहने लगे कि भारत की कृषि व डेयरी के लिए ‘वे व्यक्तिगत नुकसान भी उठा लेंगे’। 
    
मोदी जी ट्रम्प का तो कुछ नहीं बिगाड़ सके परन्तु उन्होंने जगदीप धनखड़ को जरूर अपने कूचे से बाहर का रास्ता दिखा दिया। मोदी जी ने इस बात का भी लिहाज नहीं किया कि जगदीप धनखड़ ने उनकी कितने-कितने तरह से सेवा की थी। जगदीप धनखड़ के बहाने मोदी जी ने अपनी गली में शेर वाली कहावत को चरितार्थ ही नहीं किया बल्कि हर पुराने-नये वफादार को पैगाम पहुंचा दिया कि जो कोई भी अपनी सीमा लांघेगा उसका हश्र जगदीप धनखड़ सरीखा होगा। उनका संदेश साफ है या तो ‘शेर-शेर’ के नारे लगाओ या फिर पतली गली से निकल लो। 
    
जगदीप धनखड़ का मोदी जी की अमानत में खयानत करना उनको भारी पड़ गया। लेकिन यह बात इतनी ही नहीं है। असल में जगदीप धनखड़ का मोदी जी अमानत में खयानत डालना ही दिखलाता है कि अब बादशाह का पुराना वाला रुतबा रहा नहीं। और वे लोग भी उनको आंखें तरेरने लगे हैं जो कल तक उनके सामने हाथ जोड़कर आंखें नीची किये रहते थे। 
    
यह मोदी जी के साथ होना ही है कि वे उसी जगह पर पहुंचेंगे जहां भारत के पूर्व शासकों की खण्डित मूर्तियां रखी गयी हैं। उन्होंने ही बड़े शौक से एक ऐसी जगह का निर्माण करवाया है जहां आजाद भारत के सारे प्रधानमंत्रियों का अजायबघर है। ‘खैर! वे उस जगह या अपने आप जायेंगे या फिर वहां जबरदस्ती पहुंचा दिये जायेंगे’। यह सवाल इस वक्त, इस देश में नाच रहा है। मोदी जी का ग्राफ नीचे गिर रहा है, यह हर वह व्यक्ति महसूस कर रहा है जिन्होंने मोदी जी के गुब्बारे में खूब हवा भरी थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अगर इनमें से एक है तो दूसरे वे हैं जो इस देश के असली मालिक बने बैठे हैं। 
    
असली मालिक न तो संसद में विराजमान हैं और न सरकार में बैठे हैं। वे कहीं दूर बैठे-बैठे ही इस देश को अपनी मर्जी से चलाते हैं। मोदी जी ने इनके लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। संघ के हिन्दू फासीवादी एजेण्डे को खूब चलाया और भारत ही नहीं विदेशी एकाधिकारी घरानों व वित्तीय पूंजी के धंधे की भी खूब मदद की। परन्तु मोदी जी का यह दुर्भाग्य है कि संघी कारकूनों व वित्तीय पूंजी के मालिकों से ही भारत की जनता नहीं बनी है। संघ और एकाधिकारी घरानों के मालिकों के अलावा भी भारत में करोड़ों मजदूर, किसान, मेहनतकश हैं। वे कैसे उन पर भरोसा कर सकते हैं।
    
क्या वे मजदूर भरोसा करें जिनकी हालत दिनों दिन खराब होती गयी है। इस देश में जो लोग प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं उनमें सबसे बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है। महंगाई बढ़ती गयी है और मजदूरी सालों से वहीं की वहीं खड़ी है। बेरोजगारी का काला भूत मजदूरों के ही नहीं बल्कि नौजवानों के भी पीछे पड़ा है। और आपने मजदूरों के लिए किया क्या? ‘नई श्रम संहिताओं’ के नाम पर उसके खून और पसीने की एक-एक बूंद को निचोड़ने का बंदोबस्त कर डाला। 
    
यही बात किसानों पर खासकर छोटे-मझौले किसानों पर भी लागू होती है। हर किसान अच्छे ढंग से जानता है कि वह कैसे और किस तरह से जिंदा है। कैसे फसल दर फसल उसके सपने आंसुओं की धार में बह जाते हैं। कभी उसे बीज, खाद के लिए भटकना पड़ता है तो कभी उसे अपनी फसल की वाजिब कीमत के लिए संघर्ष करना पड़ता है। और आप समझते हैं कि साल में कुछेक किसानों को 6000 रुपया देकर हमेशा हमेशा के लिए खरीद लेंगे। और आप जब भारत के किसानों, मछुवारों, पशुपालकों के हितों की रक्षा में अपने व्यक्तिगत नुकसान तक को उठाने की हुंकार भरते हैं तो उस पर कौन भरोसा करेगा। ट्रम्प के सामने जिनकी जुबान न खुलती हो और जिसने देशी-विदेशी पूंजीपतियों के लिए काले कृषि कानून लादने की कोशिश की हो उस पर मेहनतकश किसान कैसे और क्यों कर भरोसा कर सकते हैं। आपके ‘‘दुगुनी आय’’ वाले जुमले पर तो एक दिन भी भारत के किसानों ने भरोसा नहीं किया था। 
    
यही बात भारत के दलितों, आदिवासियों, औरतों के लिए भी बनती जायेगी कि वे क्यों कर आपकी बातों पर अब भरोसा करें। और भारत के मुसलमान और ईसाई तो पहले दिन से जानते हैं कि भारत में आपकी पार्टी और आपकी मातृ संस्था संघ का लक्ष्य ही उनको दोयम दर्जे का नागरिक बनाना है। धार्मिक ध्रुवीकरण से ही आपने अपना राजनैतिक कद जब बनाया हो तो कौन धार्मिक अल्पसंख्यक आप पर भरोसा करेगा। 
    
बात यह नहीं है कि मोदी जी आपके विरोधी चाहते हैं कि आप अब अपना रास्ता देखें बल्कि आपके कल के समर्थक, अंध समर्थक भी अब आपके उतने बड़े प्रशंसक नहीं रहे। ऐसे में आप सत्ता में तब तक ही बने रह सकते हैं जब तक आप किसी न किसी प्रकार सत्ता से चिपके रहें। और सत्ता में बने रहने के लिए वह सब कुछ करें जो तानाशाह करते आये हैं। ऐसे में तब यही होगा कि आप से मुक्ति चाहने वालों की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ेगी। 
    
भारत के वर्ग सचेत मजदूर अच्छे से जानते हैं कि मोदी जी के बने रहने अथवा सत्ता के उठा पटक के खेल में बाहर हो जाने से उनके जीवन में कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा। ‘कोऊ नृप हो’। उसकी स्थिति जैसी है वैसी ही रहेगी। फर्क तब ही पड़ सकता है जब वह जमीन खत्म हो जाये जहां से मोदी जी जैसे शासक पैदा होते हैं। और उस जमीन के खत्म होने का मतलब होगा कि भारत के मजदूर-मेहनतकशों को स्वयं अपने हाथों में भारत की कमान को लेना होगा। एक नया भारत मजदूरों-किसानों का भारत- समाजवादी भारत बनाना होगा। पन्द्रह अगस्त तो हर साल आयेगा-जायेगा। नेहरू से लेकर मोदी तक की यात्रा इस देश के मजदूर-मेहनतकशों ने देख ली है। बात यह है कि अब उन्हें ये सोचना है कि यही सब कुछ देखते-सुनते रहना है कि कुछ एकदम नया सोचना है। यह एकदम नया इंकलाब के सिवा और भला क्या हो सकता है। 

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