नागरिकता हनन की साजिश

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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कुछ चीजें हवा-पानी की तरह होती हैं जिनका आम-तौर पर अहसास भी नहीं होता। आदमी सांस लेता रहता है पर उसे पता भी नहीं चलता। इसका पता उसे तब चलता है जब हवा में आक्सीजन की कमी हो जाती है या वह बहुत जहरीली हो जाती है। 
    
आधुनिक समाज में नागरिकता भी कुछ इसी तरह की चीज है। आम तौर पर हर व्यक्ति किसी-न-किसी देश का पैदाइशी नागरिक होता है। पैदाइशी नागरिक होने के चलते उसे नागरिक के सारे अधिकार मिले होते हैं, जिन्हें वह मानकर चलता है। नागरिकता के बारे में उसे तभी ख्याल होता है जब उसे किसी फार्म में नागरिकता का कालम भरना होता है। थोड़ा ज्यादा ख्याल तब आता है जब उसे विदेश जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा का इंतजाम करना होता है। 
    
रोजमर्रा के जीवन में नागरिकता के इस क्षीण अहसास के बावजूद आधुनिक समाज में नागरिकता हवा-पानी की तरह ही अत्यन्त जरूरी चीज है। बल्कि आधुनिक समाज में नागरिकता लोगों के अस्तित्व का आधार है। नागरिकता से वंचित होने पर व्यक्ति के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो जाता है। 
    
आधुनिक दुनिया निश्चित सीमा रेखा वाले देशों में विभाजित है। धरती पर जीवन का कोई टुकड़ा नहीं है (उत्तरी ध्रुव व दक्षिण ध्रुव के आर्कटिक व अंटार्कटिका को छोड़कर) जो किसी न किसी देश में न आता हो। देशों की सीमाएं उनके संविधान में दर्ज होती हैं। 
    
निश्चित सीमा रेखा वाले देशों में विभाजित इस दुनिया में हर व्यक्ति अपनी पैदाइश के देश का नागरिक माना जाता है। यह पैदाइशी नागरिकता की धारणा है। उसे उस देश में नागरिक के सारे अधिकार मिले होते हैं जिसमें जान-माल की सुरक्षा भी शामिल होती है। एक देश का नागरिक सामान्यतया उसी देश में रहता है। दूसरे देश में जाने पर उसे पासपोर्ट-वीजा की जरूरत पड़ती है। पासपोर्ट व्यक्ति के अपने देश की नागरिकता व व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित करता है जबकि वीजा जाने वाले देश की सरकार द्वारा अपने यहां आने की अनुमति होती है। इसलिए वीजा निश्चित अवधि के लिए ही होता है। 
    
इन स्थितियों में किसी व्यक्ति द्वारा अपने देश की नागरिकता छोड़ना व दूसरे देश की नागरिकता ग्रहण करना आसान नहीं होता। इसके लिए सभी देशों ने कठोर कानून बना रखे हैं। इसीलिए बहुत थोड़े लोग ही पैदाइशी नागरिकता को छोड़कर अन्य देश के नागरिक बन पाते हैं।
    
यदि आधुनिक समाज में नागरिकता इतनी महत्वपूर्ण चीज है, यदि वह व्यक्ति के अस्तित्व का आधार है तो उसे छीना जाना व्यक्ति को अस्तित्व विहीन करने के बराबर है। और यदि यह गैर-कानूनी तरीके से किया जा रहा है तो यह घोर अपराध है। 
    
भारत की आज की हिन्दू फासीवादी सरकार और उसके इशारे पर चलने वाला भारत का चुनाव आयोग ठीक यही अपराध कर रहे हैं। वे करोड़ों भारतीयों की नागरिकता छीन रहे हैं। उनका निशाना अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमान हैं पर उनके अभियान की जद में हिन्दू भी आ रहे हैं। यह मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के नाम पर किया जा रहा है। 
    
साल 2019 में गृहमंत्री अमितशाह ने बहुत शान से घोषणा की थी कि वे सारे देश में एन आर सी करवायेंगे। इसका मतलब था कि वे देश के सभी लोगों की जांच कर भारतीय नागरिकों का एक रजिस्टर बनवायेंगे। इससे जो देश के नागरिक नहीं होंगे वे रजिस्टर से बाहर हो जायेंगे। फिर उन्हें देश से बाहर निकालने का काम किया जायेगा। सबके लिए स्पष्ट था कि इसका निशाना मुसलमान थे। किसी को शक न रह जाये इसलिए गृहमंत्री ने बार-बार ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ का नाम लिया जो मुसलमानों के लिए ‘कोडवर्ड’ था। 
    
गृहमंत्री की इस दंभी घोषणा के बावजूद संघी सरकार एन आर सी की ओर नहीं बढ़़ पाई। एक तो दिसम्बर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून का सशक्त विरोध हुआ (शाहीन बाग आंदोलन)। उससे सरकार पीछे हटी। दूसरे असम में एन आर सी का जो परिणाम निकला उससे भी सरकार परेशानी में फंसी, क्योंकि असम में उन्नीस लाख ‘गैर-नागरिक’ घोषित किये गये लोगों में तेरह लाख हिन्दू थे। 
    
कुछ दिन तक चुप लगाने के बाद 2025 में सरकार ने मतदाता सूची को ‘‘शुद्ध’’ करने के नाम पर यह अभियान फिर शुरू किया। अब साथ ही उसका उद्देश्य था भाजपा विरोधी मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करना जिससे चुनावों में भाजपा की जीत को पक्का किया जा सके। मुसलमानों को मतदाता सूची से बाहर करने पर दोनों उद्देश्य पूरे हो जाते थे क्योंकि मुसलमान तो भाजपा के विरोध में ही वोट देते हैं। 
    
मतदाता सूची से बाहर होते ही व्यक्ति की नागरिकता स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर यह कहकर मुहर लगा दी कि वैसे तो मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण नागरिकता की जांच नहीं है, पर चुनाव आयोग संदिग्ध लोगों की सूची सरकार को नागरिकता की जांच के लिए भेज सकता है। यह स्पष्टतः ही परोक्ष ढंग से नागरिकता की जांच है यानी मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण प्रकारांतर से नागरिकता रजिस्टर तैयार करने का मामला है। 
    
यदि किसी ने सर्वोच्च न्यायालय की बात पर ध्यान न दिया हो तो भाजपा के बड़़बोले मुख्यमंत्रियों ने इसे जोर-शोर से प्रचारित करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग मतदाता सूची से बाहर हो गये हैं उन्हें कोई सरकारी राहत नहीं मिलेगी। वे सभी सरकारी योजनाओं से वंचित हो जायेंगे। उनका राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड सब छिन जायेगा। अब बस एक कदम और आगे बढ़कर यह कहने की बात थी कि उनकी नागरिकता भी छिन जायेगी। 
    
आज सारी विपक्षी पूंजीवादी पार्टियां व नेता मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के मामले में केवल ‘वोट चोरी’ पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। वे केवल चुनावी जीत-हार की बात कर रहे हैं। वे इससे कहीं ज्यादा गंभीर अपराध यानी लोगों की नागरिकता छीनने के षड्यंत्र को नजरअंदाज कर रहे हैं। 
    
हिन्दू फासीवादियों का हमेशा से सपना रहा है कि देश के मुसलमानों को नागरिकता से वंचित कर दें। गोलवलकर ने तो संघ प्रमुख बनने से पहले ही कह दिया था मुसलमान चाहें तो इस देश में रह सकते हैं पर वे केवल हिन्दुओं के रहमो-करम पर ही रह सकते हैं। वे काम करें और जिन्दा रहें। बस! उन्हें नागरिक अधिकारों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उन्हें देश के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करने का अधिकार नहीं मिलेगा। 
    
‘हिन्दू हृदय सम्राट’ और ‘कापीबुक फासिस्ट’ मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हिन्दू फासीवादियों ने अपने इस सपने को साकार करने की मुहिम शुरू कर दी। नागरिकता संशोधन कानून और असम एन आर सी पर झटका खाने के बाद उन्होंने प्रकारांतर से मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के जरिये यह करने की योजना बनाई। इस मुहिम में वे देश के तेरह करोड़ लोगों की नागरिकता पहले ही संदेह के दायरे में डाल चुके हैं। इस अभियान के पूरा होते-होते इस संख्या के बीस करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है। 
    
जैसा कि असम एन आर सी के मामले में हुआ, मुसलमानों की नागरिकता छीनने की इस मुहिम में भारी संख्या में हिन्दू भी लपेटे में आ रहे हैं। हिन्दू फासीवादियों के लिए यह ‘कोलैटरल डैमेज’ है यानी साथ में अनपेक्षित नुकसान। पर जो लोग इस अभियान से प्रभावित हो रहे हैं, उनके लिए यह सांत्वना की बात नहीं हो सकती। गरीब हिन्दू अपनी नागरिकता छिनने पर इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि इससे मुसलमानों को ठिकाने लगाया जा रहा है। 
    
किसी भी दृष्टि से हिन्दू फासीवादी सरकार द्वारा लोगों की नागरिकता छीनने का यह अभियान घोर अपराध है। यह लोगों का जान-माल छीन लेने का अभियान है। इस अभियान को ‘‘वोटचोरी’’ तक सीमित कर देना अपराध को अत्यन्त कम कर बताना होगा। विपक्षी पूंजीवादी पार्टियां हिन्दू मतदाताओं को नाराज न करने की मंशा से इस घोर अपराध पर चुप्पी भले ही साध रही हों पर मजदूर वर्ग के क्रांतिकारियों के लिए यही ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए। यहीं से चुनाव आयोग और हिन्दू फासीवादी सरकार की सारी साजिशों का भंडाफोड़ किया जाना चाहिए। यहीं से सड़क पर उतर कर इनका विरोध करना चाहिए। बेशक चुनावों में धांधली व चुनाव चोरी भी मुद्दा है पर नागरिकता का हनन उससे कहीं ज्यादा गंभीर मुद्दा है।  

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