स्पेन में समय से पहले चुनाव की घोषणा

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
/spain-mein-samay-se-pahale-chunav-ki-ghoshana

87 वर्षीया वृद्धा को घर से निकालना पड़ा भारी

87 वर्षीया वृद्धा मारिकामेन अबास्कल को उसके किराये के घर से निकालना स्पेन की सरकार के लिए भारी पड़ गया है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज को समय से 8 महीने पहले 29 नवम्बर 2026 को चुनाव कराने की घोषणा करनी पड़ी। यह घोषणा सांचेज ने उस समय की जब उसकी सरकार किराये के मकानों के सम्बन्ध में दो बिल पास कराने में विफल हो गयी। इस घटना ने ‘‘बटर फ्लाई इफेक्ट’’ को सही साबित कर दिया है। 
    
दरअसल 87 वर्षीया वृद्धा मारिकामेन अबास्कल 70 साल से एक घर में रह रही थीं। इस घर को उसके पुराने मालिक ने एक निवेश फंड कम्पनी अबारगेस्टियन को 2018 में बेच दिया। तभी से कम्पनी और अबास्कल के बीच किराये को लेकर विवाद शुरू हो गया। कम्पनी ने उनका किराया 500 यूरो से बढ़ाकर 2650 यूरो कर दिया जबकि उनकी पेंशन मात्र 1350 यूरो है। यानी अगर वे अपनी पूरी पेंशन भी दे देंगी तब भी वे कमरे का किराया नहीं चुका पायेंगी। कम्पनी ने उनको कमरे का किराया न देने की वजह से घर से निकाल दिया। 
    
इस घटना ने बाकी लोगों के अंदर भी एक डर और आक्रोश को पैदा कर दिया। डर बढ़ते किराये के कारण घर से निकाले जाने का और आक्रोश एक वृद्धा को घर से निकाले जाने का। दरअसल स्पेन में निवेश फंड अब आवासीय संपत्तियों में निवेश कर रहे हैं जिन्होंने मकान के किरायों में भारी वृद्धि कर दी है। मकानों की कमी उनको किराये में वृद्धि का अवसर प्रदान करती है। एक आंकड़े के मुताबिक स्पेन में 7 लाख मकानों की कमी है। सस्ते सरकारी मकानों की संख्या बेहद कम है और यह कुल मकानों की संख्या का मात्र 1.5 प्रतिशत है। बड़े शहरों में किराये की दरों में वृद्धि का आलम यह है कि प्रति वर्ग मीटर का किराया 23 यूरो तक है। यही कारण है कि निवेश फंड कम्पनियां आवासीय सम्पत्ति को खरीद कर भारी मुनाफा कमाने की तरफ बढ़ रही हैं। 
    
23 सितम्बर को स्पेन में मकान के किराये को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गये। 87 वर्षीय वृद्धा को घर से निकाले जाने की घटना ने पहले से ही किराये की दरों में वृद्धि होने से परेशान और आक्रोशित लोगों को सड़क पर उतार दिया। प्रदर्शनकारी सड़कों पर नारा लगा रहे थे - ‘हम अपने भविष्य के लिए पढ़ाई कर रहे हैं न कि छोटे घर में रहने के लिए’ ‘जब तक किराया प्रथा रहेगी तब तक हम शांत नहीं रहेंगे’ ‘हमारे पास पूरे शहर की चाबियां हैं’। 
    
लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए जिस कम्पनी ने महिला को घर से बाहर निकाला था, उसने कम किराये में ही महिला को वापस मकान देने की बात की लेकिन यह समस्या केवल किसी एक महिला या परिवार की नहीं थी। प्रदर्शकारियों ने स्पेन की राजधानी मेड्रिड के पुएर्ता डेल सोल में घेरा डाल दिया तो बारसिलोना जैसे बड़े शहरों में प्रदर्शन हुए। इससे पेद्रो सांचेज की सरकार को इस मामले पर कार्यवाही के लिए आगे आना पड़ा। उसने इस मामले को हल करने के लिए 2 अक्टूबर को संसद में एक विधेयक पेश किया जिसे दो भागों में विभाजित कर दिया था। पहले भाग के अनुसार 2030 तक कमजोर किरायेदारों को बेदखल करने पर रोक लगाना, 2028 से पहले समाप्त होने वाले किराये के अनुबंध को दो साल के लिए बढ़ाना, पर्यटक अपार्टमेंट पर करों में वृद्धि करना और तथाकथित ‘गिद्ध निधियों’ (निवेश फंडों, रियल एस्टेट कम्पनियों) द्वारा आवासीय संपत्तियों के खरीद पर प्रतिबंध लगाना शामिल था। दूसरे भाग में किराये के अनुबंधों के स्वतः नवीनीकरण का प्रावधान शामिल था। यानी किरायेदारों को अनुबंध खत्म होने पर तुरंत नहीं निकाला जा सकता था।
    
लेकिन पेद्रो सांचेज द्वारा पेश किये जा रहे विधेयक का गिरना तय था क्योंकि कंजरवेटिव पीपल्स पार्टी और धुर दक्षिणपंथी पार्टी वोक्स ने इस विधेयक का विरोध किया और अन्य छोटी पार्टी कंटोलीना ने भी इसे समर्थन नहीं दिया। परिणामस्वरूप संसद में दोनों ही भागों को बहुमत ने नकार दिया और इसने लोगों के आक्रोश को भड़का दिया।
    
अगले दिन 3 अक्टूबर को स्पेन के मेड्रिड, बारसिलोना और वालेंसिया सहित 50 शहरों में प्रदर्शन हुए। स्पेन के पूर्वी तट पर स्थित शहर वालेंसिया में शनिवार को कला केंद्र पलाऊ डे लेस आर्ट्स रीना सोफिया के पास प्रदर्शनकारियों और पुलिस अधिकारियों के बीच झड़प हुई, जहां एक रियल एस्टेट शिखर सम्मेलन आयोजित किया जा रहा था।  
    
संसद में पेश किया गया विधेयक केवल सुधार का प्रयास था लेकिन इसका भी पास न होना दिखाता है कि संसद में मौजूद सांसदों का बहुमत पूंजीपति वर्ग की लूट को ही आगे बढ़ाना चाहता है। इसके साथ ही पूंजीवाद समाज में परजीवी वर्ग के रूप में एक किरायाजीवी वर्ग भी पैदा होता है जो किराये पर जिंदा रहता है। अगर यह बिल पास होता तो उसकी आय पर असर पड़ता और संसद में उनके हितों के मद्देनजर मौजूद पार्टियों ने इस बिल को पेश नहीं होने दिया। 
    
पेद्रो सांचेज वैसे तो अपने आपको समाजवादी कहते हैं। इजरायल-फिलिस्तीन के युद्ध के समय उन्होंने उस समय खूब सुर्खियां बटोरीं जब मई 2024 में उन्होंने फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आधिकारिक मान्यता दी, इजरायल पर पूर्ण हथियार प्रतिबंध लगाया और स्पेन के क्षेत्र को इजरायल के हित में प्रयोग पर रोक लगायी, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इजरायल की कार्रवाही को ‘जनसंहार’ करार दिया। लेकिन देश के भीतर हालात लगातार बिगड़ते रहे हैं। उनका ‘समाजवाद’ स्पेन के पूंजीवाद को दीर्घकालिक जीवन प्रदान करने की झूठी कवायद है। वह सुधारों के जरिये यह भ्रम फैलाने की कोशिश करता है कि पूंजीवाद के भीतर आम मजदूर मेहनतकशों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। संसद में किराये के संबंध में जो विधेयक पेश किये थे वे इस बात को साफ करते हैं।    
    
समय से पहले चुनाव कराने का दांव पेद्रो सांचेज पहले अप्रैल 2019 में भी खेल चुके हैं। अभी वे 2023 से स्पेन में बजट पास नहीं करा सके हैं। दरअसल पेद्रो सांचेज इस समय बिल पास न होने का ठीकरा विपक्षी पार्टियों पर फोड़़कर जनता की सहानुभूति की लहर पर सवार होकर सत्ता को वापस पाना चाहते हैं। वह समाजवादी के भेष में पूंजीवाद की सेवा करते रहे हैं और आगे भी करेंगे। 

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।