मजदूर आवाज

अनिश्चितता के दौर से गुजरती सेन्चुरी पेपर मिल

लालकुंआ/ वैसे तो अनिश्चितता पूंजीवादी एवं साम्राज्यवादी समाजों में लगातार बनी रहती है। निश्चितता केवल इस बात में निहित है कि संकटग्रस्तता की ओर बढ़ता समाज

यूनियन के अधिकार के लिए संघर्षरत यूनीप्रेस कम्पनी के मजदूर

रेनाल्ट-निसान आटो कम्पनी के स्पेयर पार्ट्स बनाने वाली जापानी यूनीप्रेस कारपोरेशन के मजदूर बीते 2 माह से संघर्षरत हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में स्थित इस कंपनी ने यून

फोर्ड : यूनियन का समझौता-मजदूर आक्रोशित

अमेरिका में लम्बे समय से चल रही आटो मजदूरों की हड़ताल को यूनियन नेतृत्व क्रमशः समाप्त करने की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी आटो मजदूरां का ट्रेड यूनियन केन्द्र यूनाइटेड आटो वर्कर्

जाति जनगणना से आर्थिक जनगणना बनाम लोकतंत्र

बिहार राज्य की जाति जनगणना के आंकड़े 2 अक्टूबर 2023 को जारी किए गए। देश के राजनीतिक हलकों में कोहराम मचा हुआ है। राजनीतिक पार्टियां दो खेमों में बंट गई हैं और देश को दो खे

नफरत, दंगे, नरसंहार में मीडिया की भूमिका

मीडिया को आम तौर पर आम जनता अपनी समस्या के समाधान के तौर पर देखती रही हैं। लोगों का मानना होता था कि अगर हम अपनी समस्या मीडिया के सामने लेकर जाएंगे तो मीडिया उसको उजागर क

देश की पतंग बहुत ऊंची उड़ रही है, कभी भी कट सकती है

हर रोज खबर अखबार जब भी खोलता हूं तो पूरे पेज पर मोदी की फोटो छपी होती है। हर रोज ही मोदी के पोस्टर मोदी की फोटो। हर रोज मोदी कोई न कोई बड़ा इवेंट कर रहे होते हैं। हर योजना

मोदी राज में उजड़ती दुनिया

देश में जब से फासीवादी मोदी सरकार आई, पूरे देश में डर, भय, आतंक का माहौल बना हुआ है। किस राज्य में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता है। फिलहाल मणिपुर राज्य में पूरी तरह से

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था एक आइना : बी.एच.यू. के संदर्भ से

वाराणसी/ उत्तर भारत के अस्पतालों में बनारस स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मेडिकल संस्थान का एक प्रमुख स्थान है। जिसका पूरा नाम प्ण्डण्ैण् ठण्भ्ण्न्ण्

आलेख

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।