मजदूर आवाज

मेवाती थोड़े और मुसलमान हो गये हैं और जाट थोड़े और हिन्दू

नूंह दंगों को थोड़ा और ज्यादा समझने के लिए एक टीम नूंह गयी। फरीदाबाद, दिल्ली, भटिंडा और सिरसा के कुछ जनसंगठनों के कार्यकर्ता नूंह व गुड़गांव गये। वहां पर अलग-अलग लोगों से ज

सावधान! खतरा बरकरार है।

मुल्क के करोड़ों युवा-छात्र-नौजवान
खड़ा करते हैं सवाल, शिक्षा, स्वास्थ्य 
और रोजगार का
पूछते हैं सवाल? सुनो सरकार
कहां है हमारा रोजगार?
तभी कहीं से उठती है आवाज

सत्ता की कुर्सी अब और ज्यादा खूनी होती जा रही है

पूंजीवादी व्यवस्था का संकट जैसे-जैसे  बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे सत्ता की कुर्सी की ख़ून की प्यास भी बढ़ती जा रही है। इस कुर्सी को मेहनतकश जनता का ज्यादा से ज्यादा ख़ून चाह

इस साल की बरसात ने किया बुरा हाल

इस साल बरसात के मौसम में काफी तबाही-बरबादी देखने को मिली। पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक बारिश ने काफी कहर बरपा किया। बरसात के पानी में मकान माचिस की डिब्बियों की तरह बहते

लो हिसाब हाकिम से

अधमरा पड़ा है जमीन पर 
बची सांसें थोड़ी हैं।
लो हिसाब हाकिम से उसने कितनी लाठियां 
तोड़ी हैं।
कतरा-कतरा पड़ा है 
सांस का नब्ज उसकी टटोली है।

मोदी के 18-18 घंटे काम के परिणाम आने लगे

मोदी ने केन्द्र की सत्ता में बैठते ही लफ्फाजियों की झड़ियां लगानी शुरू कर दी थीं। मोदी ने अपने आप को 18-18 घंटे काम करने वाले के रूप में प्रचारित कराया। इस बात को इस रूप म

शहतूत

फैक्टरी में सीमेंट की चादरें बदलनी हैं, काम पर ठेकेदार ने जल्दी बुलाया है। अर्जुन को ठेकेदार के अंडर में काम करते हुए एक लम्बा अरसा हो गया था। अलग-अलग फैक्टरियों में काम

शहतूत के गिरने के बाद

शहतूत के गिरने के बाद
जमीन लाल रंग के निशानों से भर जाती है
और नुकीले टुकड़ों पर
रक्त और लिपटा मांस
गिरने की पीड़ादायी यंत्रणा को 
बयां करता है

काशी विश्वनाथ टेक्सटाइल कम्पनी : बस पलटने से एक मजदूर की मौत व दर्जनों घायल

पिछले दिनों काशीपुर में काशी विश्वनाथ टेक्सटाइल कम्पनी की बस पलटने से एक मजदूर की दर्दनाक मौत हो गयी और दर्जनों मजदूर घायल हो गये। मृतक मजदूर फैक्टरी से कुछ ही दूरी पर प्

आलेख

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।