वंदे मातरम और हिंदू फासीवाद

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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‘वंदे मातरम’ एक बार फिर से चर्चा में है। मोदी सरकार और संघ के लिए राष्ट्र गीत और नारा भी उसी तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार है जैसे राम। राम के नाम पर लूट-खसोट मचाने के बाद ये फिर से वंदे मातरम के मुद्दे पर कूद पड़े हैं।
    
आखिर इन हिंदू फासीवादियों का इस गीत के प्रति इतना अनुराग क्यों है? क्यों इसके जरिए ये समाज में हंगामा खड़ा करना चाहते हैं? इस गीत में ऐसा क्या है जिसे लागू करके ये उसकी अवहेलना पर तीन साल तक की सजा देना चाहते हैं?
    
जिस भाजपा के मातृ संगठन आर एस एस को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गुलामी से मुक्ति के युद्ध से कोई अनुराग नहीं रहा और वह ब्रिटिश एजेंट की ही तरह आचरण करता रहा, ब्रिटिश शासकों के ‘बांटो और राज करो’ अभियान को जी जान से व्यवहार में उतारने में लगा रहा, आखिर उसे ‘वंदे मातरम’ से इतना लगाव क्यों? 
    
इस लगाव का एकमात्र कारण है इस गीत के साथ जुड़ी हुई आपत्तियां और इस गीत के एक हिस्से का घोर सांप्रदायिक रुख। यह आनंद मठ में हिंदू संन्यासियों का मुस्लिमों के खिलाफ संघर्ष को दिखाता है। उपन्यास, संन्यासी विद्रोह जो हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ जनता का अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष था, को विकृत करके घोर सांप्रदायिक रुख में बदल देता है। जाहिर है ऐसा करने का एक ही मकसद था, अंग्रेजी हुकूमत की तरफदारी और अपनी नौकरी को पक्का सुरक्षित रखना। यही बंकिम चंद्र चटर्जी का वंदे मातरम गीत था जिसमें एक दशक पहले लिखे गए वंदे मातरम गीत में कुछ नई पंक्तियां जोड़कर विस्तारित किया गया जो कि सीधे मुस्लिमों को निशाने पर लेता है।
    
इस गीत का यह घोर सांप्रदायिक पक्ष हिंदू फासीवादियों के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए बेहद फायदेमंद है और यही वजह है कि संघी इसे अपने मन मुताबिक लागू करने को बेचैन थे। 
    
इसीलिए 20 जुलाई 2026 को राज्यसभा में पेश किए गए ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ के माध्यम से वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर कानूनी सुरक्षा देने की कोशिश की जा रही है, जिसमें इस गीत के अपमान पर तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान हो सकता है। यह कदम केवल एक कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। 
    
वंदे मातरम की रचना मूल रूप से एक स्वतंत्र कविता के रूप में की गई थी। इसे पहली बार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में प्रकाशित किया गया। उस समय यह मातृभूमि की स्तुति में लिखी गई एक सरल कविता थी, इसमें फूल और हरियाली का वर्णन था- फल, नदियां, उसकी उपजाऊ धरती, जिसमें भारत की प्राकृतिक सुंदरता वर्णित थी- ‘‘सुजलां सुफलां मलयजशीतलां, शस्यश्यामलां मातरम्। 
    
मगर सात साल बाद, 1882 में, आनंदमठ में उपन्यास में शामिल करते समय बंकिम ने गीत में चार अतिरिक्त छंद जोड़े। इन बाद के छंदों में मातृभूमि को हिंदू देवियों- दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती- के रूप में चित्रित किया गयाः ‘‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी।’’ उपन्यास में ‘संतान’ नामक सन्यासियों का एक समूह है, जो अपना जीवन मातृभूमि की सेवा में समर्पित कर देता है। वे मातृभूमि को देवी के रूप में पूजते हैं और ‘वंदे मातरम’ उनका गीत है। इस तरह आनंद मठ में संन्यासी विद्रोह (हिंदू संन्यासियों और मुस्लिम फकीरों का अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट संघर्ष) की वास्तविक घटनाओं को पूरी तरह सांप्रदायिक रंग-रोगन करके प्रस्तुत किया गया।
    
आजादी के संघर्ष में इसके इस्तेमाल ने आजादी के संघर्ष को कमजोर करने का काम किया था। यह इस्लाम के एकेश्वरवाद की मान्यता के खिलाफ था साथ ही इसी तरह अन्य धर्मों की अपनी मान्यताओं के खिलाफ था। इसीलिए बाद में इसके पहले वाले हिस्से को गाने और बाद वाले सांप्रदायिक हिस्से को खारिज करने पर सहमति बनी।
    
वंदे मातरम को पहली बार सार्वजनिक रूप से कलकत्ता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। टैगोर ने इस गीत को संगीतबद्ध भी किया। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद, यह गीत स्वदेशी आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया। तब इसे पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल किया गया। अंग्रेज सरकार इसके सार्वजनिक गान को देशद्रोह मानती थी। यह राजनीतिक नारा और इसका सार्वजनिक गान कांग्रेस की अपनी नरम हिंदुत्व की पहुंच और सोच के चलते ही बना। इसीलिए इस पर विवाद कांग्रेस के भीतर भी हुए और बाहर भी। अन्य धर्म विशेष के लोगों की इस पर आपत्ति स्वाभाविक थी और है।
    
गीत के बाद के धार्मिक छंदों ने मुस्लिम समुदाय में आक्रोश पैदा किया। कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में व कलकत्ता में हुई कांग्रेस कार्यसमिति (ब्ॅब्) की बैठक में विवाद पहली बार खुलकर सामने आया। कार्यसमिति की बैठक में (सर्वसम्मति से) यह निर्णय लिया गया कि राष्ट्रीय समारोहों में ‘वंदे मातरम’ गीत के केवल पहले दो छंद जो कि 1875 में लिखे गए थे, वही गाए जाएंगे। इस बैठक में कांग्रेस के कई नेता मौजूद थे- महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू सभी ने इस निर्णय में अपनी सहमति दी थी- मौलाना आजाद ने भी। रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं नेहरू को पत्र लिखकर केवल पहले दो छंदों को अपनाने का सुझाव दिया था। इस निर्णय का उद्देश्य बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के बीच राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना था। 
    
ब्रिटिश साम्राज्यवाद से राजनीतिक आजादी हासिल करने के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम सत्र में, डा. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान दिया जाएगा वह भी केवल शुरूवाती दो छंदों के लिए। इसीलिए बाद के ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम’ कानून में राष्ट्रगीत को जानबूझकर शामिल नहीं किया गया। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51।(ं) में सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का जिक्र है, ‘राष्ट्रगीत’ का नहीं।
    
मगर हिंदू फासीवादियों के लिए जरूरी है कि वे खुद को सही साबित करने के लिए इतिहास को विकृत ढंग से पेश करें। मोदी ने कहा कि गीत को ‘‘टुकड़ों’’ में सरदार पटेल, महात्मा गांधी आदि ने बांट दिया, लेकिन उन्होंने यह छिपाया कि यह निर्णय सुभाष चंद्र बोस सहित पूरी कांग्रेस कार्यसमिति का सर्वसम्मत निर्णय था। 
    
मोदी-शाह की जोड़ी, भाजपा और संघ अच्छी तरह से जानते हैं कि वंदे मातरम गीत को अनिवार्य करने का विरोध होगा ही। पश्चिम बंगाल में मदरसों में वंदे मातरम को अनिवार्य कर दिया गया। इसका विरोध हुआ। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाई।
    
वास्तव में विरोध, असहमति को खड़ा करने के लिए ही संघियों द्वारा इसे राष्ट्रगान सरीखा दर्जा देकर, गायन अनिवार्य किया जाएगा। फिर मुस्लिम समुदाय से इसका विरोध करने या इस पर असहमति जताने वालों को देश विरोधी करार दिया जाएगा। इस पर मीडिया में इन्हें हर जगह दुश्मन के बतौर प्रचारित करने के साथ ही दंडित किया जाएगा। हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत की दीवार को और ऊंचा करने की यह घृणित कोशिश होगी। अंग्रेजी दौर की ‘बांटो और राज करो’ की नीति हिंदू फासीवादी इस तरह से और जोर-शोर से आगे बढ़ाएंगे। 
    
इन तमाम कोशिशों के बावजूद भी एकाधिकारी पूंजी के नंगे सेवक हिंदू फासीवादियों को जब तब सड़कों पर अलग-अलग मुद्दों पर प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है। इस बार के जेन जी के उभार ने तो मोदी के महामानव के गुरूर को भी तार-तार कर दिया। अब वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब जनता वंदे मातरम की इनकी योजना पर पलीता लगा दे और इन्हें सत्ता से बेदखल करने के साथ ही हमेशा के लिए इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दे।
 

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