विदेश नीति और युद्ध की आउटसोर्सिंग

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आजकल आउटसोर्सिंग का जमाना है। इसमें कोई काम खुद करने के बदले किसी और से करा लिया जाता है और उसे भुगतान कर दिया जाता है। लगता है कि भारत सरकार ने भी अपनी विदेश नीति और युद्ध नीति को आतंकवादियों को आउटसोर्स कर दिया है। 
    
हालिया भारत-पाक झड़प के बाद भारत सरकार की ओर से बड़ी शान के साथ घोषणा की गई कि देश में किसी भी आतंकवादी घटना को भारत सरकार पाकिस्तान की ओर से युद्ध की कार्यवाही मानेगी और उसी रूप में उसका जवाब देगी यानी पाकिस्तान पर हमला करेगी। सरकार समर्थकों ने इसे ‘न्यू नार्मल’ कहा।
    
भारत सरकार द्वारा यह बात चाहे हेकड़ी में कही गई हो या देश की जनता की मिजाजपुर्सी के लिए पर यह स्पष्ट है इसके निहितार्थों पर जरा भी विचार नहीं किया गया। यह विचार किया गया होता तो यह समझते देर नहीं लगती कि इस घोषणा से भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को चलाने का अधिकार आतंकवादियों को दे दिया है।  
    
यदि किसी आतंकवादी समूह को लगता है कि उसके उद्देश्यों की पूर्ति भारत-पाक जंग से ज्यादा बेहतर ढंग से होगी तो उसे बस इतना करना होगा कि वह भारत में किसी बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम दे दे। तब भारत सरकार स्वतः ही अपनी घोषणा के अनुसार पाकिस्तान से युद्ध में उलझ जाएगी। 
    
इससे भी आगे दुनिया के किसी भी देश को यदि लगता है कि भारत-पाक युद्ध उसके लिए फायदेमंद रहेगा तो वह भारत में कोई आतंकवादी घटना करवा कर यह हासिल कर सकता है। यह अपने खुफिया एजेंट के जरिए भी करवाया जा सकता है और देश में मौजूद आतंकवादी समूहों द्वारा भी। भांति-भांति के समीकरणों के तहत यह अमेरिका, रूस या चीन किसी के भी द्वारा करवाया जा सकता है। यहां तक कि छोटे देश भी करवा सकते हैं। 
    
और चूंकि भारत की विदेश नीति का अच्छा-खासा हिस्सा भारत-पाक संबंधों से निर्धारित होता है, ऐसे में स्वयं भारत की विदेश नीति ही आतंकवादी समूहों या इनके पीछे के देशों द्वारा तय होने लगेगी। इससे बड़ी बेवकूफी की बात भला क्या होगी? 
    
कहा जा सकता है कि इस समस्या का एक समाधान है। भारत सरकार केवल उन्हीं आतंकवादी घटनाओं को पाकिस्तान द्वारा युद्ध की कार्रवाई मानेगी जिसमें पाकिस्तान का हाथ होगा। पर इसका निर्धारण कैसे होगा? सबूतों के जरिए? लेकिन पहलगाम वाली आतंकवादी घटना में इन्हीं सबूत का तो अभाव था। भारत सरकार बस दावा करती रही कि उसके पास सबूत हैं लेकिन उसने कोई सबूत पेश नहीं किया। यदि भारत के तथाकथित मित्र देश भी भारत-पाक झड़प के समय भारत के साथ खुलकर नहीं आए तो उसका बड़ा कारण यही था। किसी ने भी भारत सरकार के दावों पर विश्वास नहीं किया क्योंकि कोई सबूत नहीं पेश किया गया। यही नहीं, आज पुलवामा आतंकवादी हमले के 6 साल हो चुके हैं। आज भी उस मामले में रहस्य बना हुआ है। 
    
वैसे भी, जब भारत सरकार ने घोषित कर दिया है कि किसी भी आतंकवादी घटना को वह पाकिस्तान की तरफ से युद्ध की कार्रवाई मानेगी तब क्या पाकिस्तान इस मामले में ज्यादा सचेत नहीं हो जाएगा? यदि पुलवामा और पहलगाम में कोई सबूत नहीं मिले तो आगे कैसे सबूत मिल जाएंगे? 
    
यदि भारत सरकार खुद ही पाकिस्तान के साथ निरंतर युद्ध की अवस्था में नहीं रहना चाहती तो आतंकी घटना को लेकर उसकी ताजा घोषणा आत्मघाती है। यह घोषणा स्वयं उसके हाथ बांध देती है। हर आतंकी घटना उसे एक खास दिशा में कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर देगी। 
    
लेकिन हो सकता है कि वर्तमान सरकार यही चाहती हो। वह चाहती हो कि देश में लगातार युद्ध का माहौल रहे जिससे युद्धोन्माद बना रहे। आखिर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में मोदी ने यूं ही तो नहीं कहा कि ‘आपरेशन सिंदूर’ जारी है। यदि ‘आपरेशन सिंदूर’ एक सैनिक कार्रवाई था तो उसके जारी रहने का क्या मतलब है? यही कि देश निरंतर युद्ध की अवस्था में है। 
    
निरंतर युद्ध की यह अवस्था हर मोर्चे पर विफल इस सरकार के लिए तो फायदेमंद हो सकती है पर देश की मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए नहीं। उसे इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी।
 

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