विकास दर को मुंह चिढ़ाती महंगाई-बेकारी की मार

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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पिछले दिनों खबर सामने आयी कि इस वर्ष की पहली तिमाही में भारत की विकास दर 7.8 प्रतिशत रही। इस खबर पर मोदी सरकार ने सफलता का ढिंढोरा पीटना चाहा। पर यह विकास की बात लोगों के जीवन के यथार्थ से इतनी बेमेल थी कि संघ-भाजपा के कार्यकर्ता और टी वी चैनलों के एंकर इस पर हल्ला काटने में शर्म महसूस करने लगे। 
    
जल्द ही 7.8 प्रतिशत की विकास दर के दावे पर मोदी सरकार का सोशल मीडिया पर मजाक बनने लगा। कोई 7ग8त्र56 इंच की बातें करने लगा तो कोई अम्बानी-अडाणी को ही भारत मान उनकी विकास दर को देश की विकासदर बताने का आरोप सरकार पर लगाने लगा।
    
ऊंची विकास दर के दावे को मोदी सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने ही खारिज करते हुए महज 2.6 प्रतिशत होने का दावा कर दिया। उन्होंने सरकार पर हेराफेरी कर वर्तमान आंकड़े खुशनुमा दिखाने का आरोप लगाया। 
    
बेकारी की मार झेल रहे भारतीय युवा-आम जनता बीते कुछ माह से तेज महंगाई को भी झेलने को मजबूर हो गये हैं। इस महंगाई की मार के चलते घर चलाने का खर्च 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है। ऐसे में जब मोदी ने विदेश से भारतीय जनता को 7.8 प्रतिशत विकास दर की बधाई दी तो जनता को यह जले पर नमक छिड़़कने सरीखा ही दर्दनाक महसूस हुआ।
    
खुद सरकारी सूचकांकों के हिसाब से अगस्त 2026 के माह में थोक मूल्य सूचकांक 9.78 से बढ़कर 9.92 प्रतिशत हो गया। ईंधन, ऊर्जा व खाने-पीने के सामानों में महंगाई में तेज वृद्धि देखी गयी। 
    
पेट्रोलियम-रसोई गैस के दाम बढ़ने के बाद चीनी के आसमान छूते भाव लोगों की रसोई पर बोझ बढ़ाने लगे। चीनी के भाव बढ़ने के पीछे सरकार द्वारा चीनी के उत्पादन, कुल मांग का ध्यान न रखना रहा। गन्ना उत्पादन गिरने के बाद भी सरकार इससे एथेनाल बनाने में जुटी रही। परिणाम यह हुआ कि दाम 70 पार जाने पर सरकार को विदेश से चीनी आयात की सूझी। 
    
चीनी के बाद तो मानो बाजार में हर जरूरी सामान के भाव बढ़ने की होड़ सी लग गई। राशन-सब्जी से लेकर दूध तक सब महंगे होने लगे। इस महंगाई के पीछे खेती में लागत बढ़ने से लेकर यातायात खर्च बढ़ने व जमाखोरों की भूमिका सभी कारक हैं। 
    
महंगाई की इस मार के बीच भी भारतीय नीरो प्रधानमंत्री चैन की बंशी बजा रहा है। सरकार अपने भण्डारों को घटाकर इनके जरिये कीमत नियंत्रण की काबिलियत पहले ही खो चुकी है। अब जमाखोरों को नियंत्रित कर व मूल्य सीमा निर्धारित कर व सख्ती से लागू कर ही वह जनता का दर्द कुछ कम कर सकती है। 
    
पर प्रचार से झूठ को सच साबित करने वाली सरकार जनता के दुःख, अभाव को भी समृद्धि दिखाने पर अधिक ध्यान दे रही है। संघी मंत्री निर्लज्जता से ‘कहां है महंगाई?’ के बयान दे रहे हैं। 
    
इन सबके बीच रिजर्व बैंक रेपो रेट को लेकर अपनी उलझन सुलझा नहीं पा रहा है। वह बेरोजगारी-महंगाई दोनों को सम्बोधित करने की राह नहीं निकाल पा रहा है। महंगाई के मद्देनजर रेपो रेट बढ़ाने पर बेकारी बढ़ने लगेगी। व बेकारी के मद््देनजर रेपो रेट गिराने पर महंगाई बढ़ेगी। इस उधेड़बुन में वह कोई कदम नहीं उठा रहा है। 
    
बेकारी-महंगाई की मार अब उस स्थिति में पहुंच गयी है कि भाषणवीर प्रधानमंत्री की बातें अब जनता को अधिकाधिक लफ्फाजी लगने लगी हैं। मोदी काल के अंत की आहट आने लगी है।  

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