आम हड़ताल : कुछ बातें
केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत आम हड़ताल 9 जुलाई को सफल हो गई। इस हड़ताल में केन्द्रीय फेडरेशनों ने करोड़ों मजदूरों की भागीदारी का दावा कर हड़ताल को सफल घोषित क
केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत आम हड़ताल 9 जुलाई को सफल हो गई। इस हड़ताल में केन्द्रीय फेडरेशनों ने करोड़ों मजदूरों की भागीदारी का दावा कर हड़ताल को सफल घोषित क
चुनाव आयोग और संघी सरकार के मंत्रियों का दावा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पहली बार नहीं हो रही, पहले भी कई बार हो चुकी है यह सामान्य प्रक्रिया है, इस पर हंगामा क्यों! वास्तव में ये, यहां भी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। वास्तव में यह पहले के मतदाताओं का पुनरीक्षण भी है। विपक्ष का जहां तक सवाल है यह बुनियादी सवाल खड़ा करने के बजाय व्यवहारिकता पर ज्यादा प्रश्न खड़े कर रहा है। परीक्षण के लिए बेहद कम समय होना एक समस्या है मगर बुनियादी प्रश्न नहीं।
एक बार फिर ‘डायन कुप्रथा’ अमानवीय कुकृत्य एवं 5 लोगों की हत्या के कारण चर्चा में है। 6-7 जुलाई की दरमियानी रात को बिहार के पूर्णिया जिले के टेटगामा गांव में ग्रामीणों की
ग्रीस के श्रम मंत्रालय ने मजदूरों के काम के घंटे प्रति दिन 13 किये जाने के सम्बन्ध में एक नियम पारित करने का तय किया है। इस नियम के अनुसार अब मजदूर एक ही नियोक्ता के अधीन
केंद्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा मोदी सरकार की मजदूर-मेहनतकश जन विरोधी नीतियों के विरोध में 9 जुलाई को देशव्यापी आम हड़ताल का आह्वान किया गया था। संघर्षशील मजदूर संग
काश ये बेटियां बिगड़ जाएं
इतना बिगड़ें के ये बिफर जाएं
उन पे बिफरें जो तीर-ओ-तेशा लिए
राह में बुन रहे हैं दार ओ रसन
और हर आजमाइश द- ए -दार -ओ द- रसन
बरेली/ उत्तर प्रदेश सरकार कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के करीब 27,000 सरकारी प्राइमरी और जूनियर स्कूलों को मर्ज (विलय) करने की तैयारी कर रही है। पहले चरण में 50
यह याद रखना होगा कि अपने पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग ने आम जन को बहुत मजबूरी में दाखिल होने दिया था। उसने हर कदम पर प्रतिरोध किया था। केवल आम जन के तीखे संघर्षों के दबाव में ही वह क्रमशः पीछे हटा था। पीछे हट कर भी वह हमेशा असुविधा महसूस करता रहा। जनतंत्र में आम जनों के प्रवेश के बाद उनसे निपटने के लिए कभी फासीवाद की शरण लेता रहा तो कभी जनतंत्र को एकदम खोखला, औपचारिक बनाता रहा। अब फासीवादियों के एक बार फिर उभार के दौर में वह आम जन को भांति-भांति से जनतंत्र से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।
अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को
तुम जादू की तरह गायब हो गये
चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं लेकिन
दिल्ली पुलिस तुम्हें ढूंढ नहीं पायी
उमर खालिद तुम जेल में बंद हो
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।