उ.प्र. में योगी सरकार मुसलमानों पर क्रूर हमलों, बुलडोजर कार्यवाही के लिए कुख्यात रही है। भारत के कानून-न्याय प्रणाली को धता बता कर योगी सरकार मुसलमानों को सबक सिखाने के इरादे से काम करती रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फटकार के बावजूद यह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। इसी कड़ी में जब मुसलमान समुदाय के लोगों ने कानपुर से शुरू कर अलग-अलग जगहों पर ‘आई लव मोहम्मद’ के नारे के तहत गोलबंदी के प्रयास किये तो योगी सरकार उन पर ऐसे टूट पड़ी मानो वे अपने खुदा की नहीं बल्कि किसी देश के दुश्मन की जय जयकार कर रहे हों। एक बार फिर अंधाधुंध युवाओं की गिरफ्तारी-टार्चर, बुलडोजर की तोड़-फोड़ में योगी सरकार जुट गयी। खुद योगी प्रदर्शन को सात पीढ़ियों तक याद रखने वाला सबक सिखाने की भाषा पर उतर आये। अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपनी जनता से इस भाषा में बात करने लगे तो उसके शासन के असली चरित्र को समझा जा सकता है।
कानपुर से लेकर बरेली तक ‘आई लव मोहम्मद’ के नारे की शुरूवात करने वाले चाहे जो भी लोग हों व वे जिस भी मंशा से इस नारे पर गोलबंदी कर रहे हों पर संघ-भाजपा को शायद अब यह भी बर्दाश्त नहीं है कि मुसलमान अपने खुदा से अपने प्रेम की घोषणा करें। उन्हें इसमें भी षड्यंत्र, दंगे की बू आने लगी और योगी सरकार सारे कायदे-कानून को ताक पर रख ‘सबक’ सिखाने में जुट गयी। कहीं बगैर अनुमति जुटान का तो कहीं पथराव का आरोप लगा लाठियां भांजी गयी-गिरफ्तारी की गयी। सैकड़ों युवाओं का पुलिसिया टार्चर किया गया और फिर बुलडोजर भी भला कहां पीछे रहता। तरह-तरह के कानूनी पेंचों का इस्तेमाल कर उसे भी विध्वंस के लिए उतार दिया गया।
यहां यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि किसी भी धार्मिक नारे के तहत की जाने वाली धार्मिक लामबंदी कहीं से भी प्रगतिशील कदम नहीं है। यह धार्मिक गोलबंदी जहां एक ओर मुस्लिम समुदाय को कट्टरपंथियों कठमुल्लाओं के चंगुल में ढकेलती है वहीं दूसरी ओर यह अपनी बारी में हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों को भी खाद-पानी मुहैय्या कराती है। जहां अल्पसंख्यक धार्मिक गोलबंदी अलगाववाद- आतंकवाद की ओर ले जा सकती है वहीं बहुसंख्यक धार्मिक गोलबंदी फासीवाद की ओर बढ़ने की संभावना लिए होती है। दोनों तरह की साम्प्रदायिकता एक-दूसरे को मजबूत करने का साधन बन जाती है।
इसीलिए अल्पसंख्यकों पर संघी हमले का मुकाबला किसी किस्म की धार्मिक गोलबंदी से नहीं बल्कि सभी धर्मों के मेहनतकशों की एकता व फासीवादी ताकतों से संघर्ष से ही किया जा सकता है।
योगी शासन में अपने इस आतंक के जरिये संघ-भाजपा मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक पहले ही बना चुकी है। अब वह उनसे अपने खुदा की इबादत की जनवादी स्वतंत्रता भी छीनने पर उतारू है। या फिर मानो उसने तय कर लिया है कि सड़कें कांवड़ यात्रा, रामनवमी-हनुमान जयंती-दुर्गा पूजा आदि-आदि हिन्दू त्यौहारों के लिए ही हैं कि सड़कों पर अब मुसलमान अपना जुटान नहीं कर सकते।
कांवड़ यात्रा पर फूलों की बरसात व मुसलमानों के जुलूस पर लाठी-गोली-गिरफ्तारी बुलडोजर आज यही उ.प्र. की हकीकत है। संघी लंपट कांवड़ यात्रा में हुड़दंग, गौरक्षा के नाम पर गुण्डागर्दी, दलितों-महिलाओं पर अत्याचार के लिए स्वतंत्र हैं पर मुसलमान समुदाय को सड़क पर नमाज पढ़ने तक पर भी पीटा जा रहा है। इस तरह उ.प्र. संघ की ‘हिन्दू राष्ट्र’ की नयी प्रयोगशाला बनता जा रहा है।
उत्तराखण्ड में योगी की नकल करती धामी सरकार ने ऐसा ही दमन चक्र काशीपुर शहर में रच डाला। यहां मुसलमानों के जुलूस को रोकने वाले पुलिसवाले को कुछ लोगों द्वारा पीटने की कार्यवाही ने पुलिस-प्रशासन को अतिरिक्त दमन का मौका दे दिया। समूचे मुस्लिम मोहल्ले को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। गिरफ्तारी-टार्चर का दौर जारी है।
मोदी-योगी-धामी सरकार भूल जाती है कि दमन से हक-हकूक की आवाज कुछ वक्त के लिए शांत तो की जा सकती है पर खत्म नहीं की जा सकती। आने वाले वक्त में दमन से जनता के दिलों में इकट्ठा हो रहा आक्रोश जिस दिन फूट पड़ेगा उस दिन संघी ताकतों को पूछने वाला कोई नहीं होगा।