बांग्लाभाषी मजदूरों के उत्पीड़न का विरोध

/banglabhashi-majdooron-ke-utpidan-ka-virodha

गुड़गांव/ पिछले 15-20 दिनों से गुरुग्राम में हरियाणा पुलिस द्वारा सरेआम किसी भी बांग्लाभाषी लोगों को (जिनमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय से हैं) बिना किसी आरोप के पकड़ा जा रहा है, धमकाया जा रहा है, बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताया जा रहा है और जबरदस्ती उन्हें बादशाहपुर में एक डिटेंशन कैंप में रखा जा रहा है। इसके  विरोध में इंकलाबी मजदूर केन्द्र, क्रान्तिकारी नौजवान सभा, ब्ैज्न् ने गुडगांव उपायुक्त कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा। सभा में वक्ताओं ने कहा कि बेकसूर जनता के साथ मारपीट हो रही है, यहां तक कि बच्चों व महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया है। आधार कार्ड और वोटर आईडी होने के बावजूद उन्हें सिर्फ बंगाली बोलने के कारण पुलिस पीट रही है। वक्ताओं ने मजदूरों पर इस हमले का पुरजोर विरोध किया। उपरोक्त घटना के विरोध में टी यू सी गुडगांव ने भी ज्ञापन दिए। 
    
पुलिस के इस प्रकार की अवैध प्रताड़ना से बंगाली समुदाय के लोगों में भय और आतंक का माहौल है। ये मजदूर लगातार डर के साए में रह रहे हैं। हालात ये हैं कि पुलिस के दमन के कारण बड़ी संख्या में बंगाली मजदूरों और मेहनतकश जनता को अपने रोजगार छोड़कर सपरिवार भागना पड़ रहा है। पीड़ित बंगाली मजदूर झुग्गियों में या अस्थाई आवास में रहते हैं और निर्माण कार्य में, ड्राइवर, माली, दफ्तरों में हाउसकीपिंग, डिलीवरीबाय, कचड़ा चुनने, रेहड़ी-फड़ का काम, घरेलू महिला कामगार हैं। वे रोज की जरूरतें पूरी करने में जूझ रहे हैं। 
    
मजदूर संगठनों ने इस संविधान और विधि विरुद्ध कृत्य की तीखे शब्दों में निन्दा की और मांग की कि-

1. बांग्लादेशी के बहाने मजदूरों और मेहनतकश जनता के दमन पर रोक लगे।
2. गिरफ्तार सभी बांग्लाभाषी निवासियों को रिहा किया जाए।
3. धर्म आधारित अल्पसंख्यक जनता को चिन्हित करके प्रताड़ित करना बंद हो। 
4. भेदभाव व नफरत की राजनीति पर लगाम लगे।
5. सभी मेहनतकश जनता को नागरिकता दी जाए।             -गुड़गांव संवाददाता
 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।