भारत, चीन, रूस और अमेरिका

सारी दुनिया में भारत की बेइज्जती करवाने के बाद मोदी सरकार ने मरता क्या न करता की मुद्रा में चीन से अपने संबंधों को कुछ ठीक करने की दिशा में कदम बढ़ाये हैं। राजनयिक हलकों में इसे लेकर काफी चर्चा है कि यह महज रणकौशल है या नयी रणनीति की शुरूआत। यानी क्या भारत सं.रा.अमेरिका के साथ तीन दशकों की अपनी ‘रणनीतिक साझेदारी’ को बनाये रखते हुए उससे सौदेबाजी के लिए चीन से मेल-मिलाप का दिखावा कर रहा है या फिर इस ‘रणनीतिक साझेदारी’ में ही कुछ बदलाव किया जा रहा है?

इस सवाल का जवाब दुनिया भर के पैमाने पर कार्यरत शक्तियों के बीच के समीकरणों के आधार पर ही दिया जा सकता है।

1980 के दशक के अंत तक भारत गुट निरपेक्ष देशों का नेता था। गुट निरपेक्ष आंदोलन दुनिया के दो गुटों में बंटे होने के कारण अस्तित्व में आया था। एक था अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादियों और उनके साथ संबद्ध देशों का गुट। दूसरा था सोवियत साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों तथा उससे संबद्ध देशों का गुट। 1960 के दशक में भारत, यूगोस्लाविया और मिश्र की पहलकदमी पर गुट निरपेक्ष देशों का एक जमावड़ा अस्तित्व में आया जिसे गुट निरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। यह तीसरा गुट दोनों गुटों से दूरी बनाये रखते हुए दोनों से सौदेबाजी करता था हालांकि कुल मिलाकर यह सोवियत गुट की ओर झुका हुआ था। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि इस गुट के ज्यादातर देश पहले पश्चिमी साम्राज्यवादियों के उपनिवेश या अर्द्ध-उपनिवेश थे तथा कुछ तो ताजा-ताजा आजाद हो रहे थे- कुछ संघर्षों के बाद। सोवियत खेमा ऊपरी तौर पर इनकी आजादी का समर्थन करता था।

1970-80 के दशक में भारतीय शासक वर्ग इस गुट का नेता रहते हुए सोवियत गुट के साथ ज्यादा सट गया। इसका इसे तात्कालिक फायदा भी हुआ। पर इसके दुर्भाग्य से उसने यह तब किया जब सोवियत गुट आंतरिक संकट का शिकार हो गया था और विघटन की ओर बढ़ रहा था। सोवियत साम्राज्यवादियों की दुनिया भर में आक्रामकता ने इस विघटन में अपनी तरह से योगदान किया। अंत में 1989 में सोवियत खेमे का विघटन हो गया और 1991 में स्वयं सोवियत संघ विघटित हो गया। ‘ईश्वर की कृपा से अमरीकी साम्राज्यवादी शीत युद्ध में विजयी हुए थे’।

भारतीय शासकों के लिए सोवियत खेमे व स्वयं सोवियत संघ के विघटन ने विकट स्थिति पैदा कर दी। इसने अपनी आंतरिक व बाहृय दोनों नीतियां काफी हद तक सोवियत खेमे से बांध रखी थीं। आयात प्रतिस्थापक बंद अर्थनीति तथा गुट निरपेक्ष विदेश नीति इसी का सूचक थी। अब दोनों मामले में भारी संकट पैदा हो गया।

इस संकट से उबरने के लिए भारतीय शासक वर्ग ने 1991 में एक झटके से अपनी आतंरिक व बाहृय नीतियां दोनों बदल लीं। आर्थिक संकट पर निजीकरण-उदारीकरण व वैश्वीकरण की ओर कदम बढ़ाये गये जबकि विदेशी मामलों में अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ की ओर बढ़ा गया। 1990 तक यदि सोवियत साम्राज्यवादियों से ‘रणनीतिक साझेदारी’ थी तो वह अब अमरीकी साम्राज्यवादियों से हो गयी।

यह समझना भूल होगी कि इस बदलाव का मूल कारण सोवियत खेमे का विघटन था। बदलाव का मूल कारण तो स्वयं भारत के पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग का आंतरिक विकास था। सोवियत खेमे के विघटन ने बस इसमें उत्प्रेरक का काम किया। यह याद रखना होगा कि 1980 के दशक के मध्य से ही इस दिशा में कदम बढ़ा दिये गये थे जब किसी को भी गुमान नहीं था कि सोवियत खेमा विघटन की ओर बढ़ रहा है।

जो भी हो, 1991 से भारत का शासक पूंजीपति वर्ग अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ की ओर बढ़ गया। वह ‘दक्षिण-दक्षिण सहयोग’ की बात छोड़ अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सट गया। ऐसा करते हुए उसने कुछ इस सोच का परिचय दिया कि पूरी दुनिया में कायम हुआ अमरीकी साम्राज्यवादियों का एकछत्र प्रभुत्व एक लम्बे समय तक कायम रहेगा तथा भारत का हित इसी में है कि वह उनके साथ सट जाये। 1991 से भारतीय शासक वर्ग इसी ओर बढ़ता रहा, सत्ता में चाहे जो भी पार्टी या गठबंधन हो।

भारतीय शासक वर्ग की यह सोच निकट दृष्टि दोष का शिकार थी पर इसके वाजिब कारण थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद उसका प्रमुख उत्तराधिकारी रूस धूल धूसरित पड़ा था। चीन का उभार अभी दूर की चीज था। यूरोपीय साम्राज्यवादी यूरोपीय संघ में एकजुट होने का प्रयास कर रहे थे पर उनका सामूहिक भविष्य अभी अनिश्चित था। ऐसे में अवसरवादी भारतीय शासकों ने अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सटने में ही अपनी भलाई देखी।

पर नयी सदी में चीजें बदलने लगीं और दस-पन्द्रह सालों में नये समीकरण सामने आ गये। रूसी साम्राज्यवादी पुतिन के नेतृत्व में एक बार फिर अपना दम दिखाने लगे जबकि चीन एक नयी साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में वैश्विक पटल पर अवतरित हो गया। यूरोपीय साम्राज्यवादी भी 2012-13 के घनीभूत संकट के पहले हाथ-पांव मार रहे थे।

इन सबने भारतीय शासकों के लिए चुनौती और अवसर दोनों प्रदान किये। एक ओर इन्होंने रूसी साम्राज्यवादियों से अपने पुराने रिश्ते बरकरार रखे जो सोवियत संघ के जमाने से चली आ रही निर्भरता को देखते हुए इनकी मजबूरी भी थे। इनके हथियार अभी भी भारी मात्रा में रूसी थे। इसी तरह रूसी तेल पर भी इनकी निर्भरता थी। अमरीकी व पश्चिमी साम्राज्यवादियों के साथ सारे रिश्तों और उनके दबाव के बावजूद इस निर्भरता को समाप्त करना आसान नहीं था।

दूसरी ओर चीन के उभार ने इन्हें अधिकाधिक अमरीकी साम्राज्यवादियों से सटने की ओर धकेला। चीन के साम्राज्यवादी ताकत के रूप में सामने आने के बाद भारतीय शासकों के सामने दो विकल्प थे। पहला, वह इस नयी साम्राज्यवादी ताकत के साथ सुलह-समझौते की नीति पर चलते हुए अपने हितों की सुरक्षा करे। दूसरा, वह उसे घेरने व सीमित करने की अमरीकी व पश्चिमी साम्राज्यवादियों की नीति का अनुसरण करते हुए अपने हित साधे। भारत के शासक पूंजीपति वर्ग ने दूसरा रास्ता चुना और इस तरह वे अमरीकी साम्राज्यवादियों का मुहरा बन गये।

भारत के पूंजीपति वर्ग द्वारा इस दूसरे रास्ते को चुनने के कारण थे। भारत का पूंजीपति वर्ग आजादी के समय से ही विस्तारवादी मानसिकता का रहा है। दक्षिण एशिया को वह अपना प्रभाव क्षेत्र मानता रहा है। यही नहीं, वह समूचे हिन्द महासागर को अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार मानता रहा है। इस मामले में वह खुद को ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का उत्तराधिकारी मानता रहा है।

इसने इसे चीन के साथ खास तरह के संबंधों की ओर धकेला। समाजवादी चीन ने पंचशील के सिद्धान्तों के तहत भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाते हुए मित्रवत संबंध कायम करने हेतु हाथ बढ़ाये थे। पर भारत के पूंजीपति वर्ग को यह स्वीकार नहीं था। इसके विस्तारवादी मंसूबों ने चीन के साथ इसके रिश्तों को तनावपूर्ण बनाया जो अंततः 1962 के युद्ध तक जा पहुंचा। उस युद्ध में बुरी तरह मुंह की खाने के बाद भारतीय शासकों को इतनी अकल तो आ गयी कि वे फिर तनाव बढ़ाने से बाज आयें पर उन्होंने अपनी मूल नीति में बदलाव नहीं किया।

अब नयी सदी में चीन के साम्राज्यवादी ताकत के तौर पर उभरने के बाद भारतीय शासकों के विस्तारवादी मंसूबों के लिए नयी चुनौती खड़ी हो गयी है। चीनी साम्राज्यवादियों ने दक्षिण एशिया के उनके प्रभाव क्षेत्र में अपना दखल बढ़ाया है तथा एक के बाद दूसरे देश को अपने आगोश में ले लिया है। इसमें उनकी आर्थिक हैसियत ने उनकी राह आसान की है। भारत के लगभग सारे ही पड़ोसी देश बेल्ट एण्ड रोड परियोजना में भागीदार हैं। इन सारे ही देशों में प्रभाव के मामले में भारत दूसरे नंबर पर चला गया है।

भारत की अपनी आर्थिक व सामरिक ताकत इतनी नहीं है कि वह अपने प्रभाव क्षेत्र में चीनी साम्राज्यवादियों की इस घुसपैठ को रोक सके। ऐसे में छटपटाहट में वह और ज्यादा अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सटता गया है तथा चीन को घेरने व समेटने की उनकी रणनीति का हिस्सा बनता गया है। क्वाड का सदस्य बनना तो इसका एक उदाहरण मात्र है। आज जब अमरीकी साम्राज्यवादी एशिया-प्रशांत क्षेत्र को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र तक विस्तारित कर भारत को उसमें एक भूमिका प्रदान कर रहे हैं तो चाहे-अनचाहे भारतीय शासक वर्ग उनका मुहरा बन रहा है।

भारतीय शासकों को यह मुहरा बनना स्वीकार था, खासकर इसलिए कि पिछले तीन दशकों में उन्होंने अमरीकी साम्राज्यवादियों के तंतुजाल का स्वयं को एकीकृत हिस्सा बना दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था घनीभूत रूप से पश्चिमी साम्राज्यवादी पूंजी से, खासकर अमरीकी साम्राज्यवादी पूंजी से जुड़ी हुई है। व्यक्तिगत तौर पर भारतीय पूंजीपति वर्ग न केवल वैचारिक बल्कि भौतिक तौर पर पश्चिम से जुड़ा हुआ है। न जाने कितनों की दोहरी नागरिकता है।

ऐसे में अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ भारतीय शासकों की ‘रणनीतिक साझेदारी’ एकदम भिन्न स्वरूप ग्रहण कर लेती है। इसका स्वरूप सोवियत साम्राज्यवादियों के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ से भिन्न है। उस समय भी भारतीय मध्यम वर्ग और अभिजात पश्चिम की तरफ ही मुंह किये रहते थे। तब उनका व्यक्तिगत गंतव्य सोवियत संघ नहीं होता था। वह पश्चिम व अमरीका ही होता था। अब ‘रणनीतिक साझेदारी’ और व्यक्तिगत गंतव्य दोनों एक ही ओर हैं।

ऐसे में भारत-अमरीकी रिश्तों में वर्तमान तनाव तथा भारत-चीन सुलह-समझौता तात्कालिक और रणकौशलात्मक प्रकृति के ही हो सकते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी भारतीय शासकां की, खासकर मोदी के नेतृत्व में संघियों की कमजोरी और चाटुकारिता का इस्तेमाल कर उन्हें जरूरत से ज्यादा दबाने का प्रयास कर रहे हैं जो भारतीय शासकों को रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों से आंख-मिचौली की ओर धकेल रही है। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादी भी इसकी सीमा जानते हैं। लंपट ट्रम्प भी इस सीमा को पहचानता है। वे भारतीय शासकों के साथ अपनी ‘रणनीतिक साझेदारी’ को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे।

अब सवाल यह उठता है कि भारतीय शासक रूस, चीन व अमरीका के साथ अथवा उनके शासकों के साथ जो संबंध रख रहे हैं क्या वह भारत के हित में है? या फिर वह केवल शासकों के संकीर्ण हित में है?

कहने की बात नहीं कि भारतीय शासकों की आज की समूची विदेश नीति आंतरिक नीति की तरह ही केवल भारतीय शासकों के हित में है, देश की मजदूर-मेहनतकश जनता के हित में नहीं। रूस से तेल के आयात पर जो इतना हंगामा है, वह तो केवल कुछ कंपनियों के हित में था।

देश व देश की मजदूर-मेहनतकश जनता के हित में तो यही होता कि भारत एक स्वतंत्र व सिद्धान्तनिष्ठ विदेश नीति पर चलता। वह पंचशील के पुराने सिद्धान्तों का अनुसरण करता। वह दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता के हित में खड़ा होता। पर भारत के शासक वर्ग से यह उम्मीद नहीं की जा सकती जो स्वयं अपनी जनता की जिन्दगी को दिनोंदिन और नरक बना रहा है।

पर इससे इतनी उम्मीद तो करनी ही चाहिए अथवा इसके लिए उस पर दबाव बनाना ही चाहिए कि वह भारत को किसी साम्राज्यवादी देश का मुहरा न बना दे। वह अनावश्यक रूप से चीन के साथ तनाव न बढ़ाये, खासकर तब जब वह उसका मुकाबला करने की स्थिति में न हो। वह पड़ोसी देशों के साथ धौंसपट्टी न करे, खासकर पाकिस्तान से। वह अपने संकीर्ण हितों में पूरे देश के हित की कुर्बानी न दे दे। खासकर किसी एक व्यक्ति के सत्ता के लालच या महामानव कहलाने की ख्वाहिश के मद्देनजर समूचे देश की कुर्बानी नहीं दी जा सकती।

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