भाजपा के नवीन अध्यक्ष

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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आखिर भाजपा को उसका नया अथवा नवीन अध्यक्ष मिल गया। संयोग से उसका नाम भी नबीन है। अब नबीन का बिहार में क्या मतलब होता है पता नहीं पर वह भाजपा का नवीन अध्यक्ष होगा यह तय है। 
    
इस अध्यक्ष को मोदी-शाह ने चुना है। उन्होंने ही तय किया कि अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए भाजपा में वह नाटक भी नहीं होने दिया जायेगा जो खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के समय कांग्रेस में हुआ था। तब राहुल-सोनिया की पसंद खड़गे के खिलाफ शशि थरूर खड़े हो गये थे। शशि थरूर हार गये लेकिन तब से वे चैन से नहीं बैठे। आज वे कांग्रेस पार्टी में मोदी-शाह के आदमी माने जाते हैं। वैसे कभी शशि थरूर को कांग्रेस पार्टी में राहुल-सोनिया ही लेकर आये थे। शशि थरूर पर्याप्त एहसान फरामोश निकले। 
    
आज की भाजपा में किसी भी नेता के इस तरह मोदी-शाह से एहसान-फरामोशी की उम्मीद नहीं की जा सकती। हिरेन पाण्ड्या से लेकर जज लोया तक सबका हस्र हर किसी के लिए पर्याप्त शिक्षाप्रद है। तब भी मोदी-शाह को यह पसंद नहीं कि कोई नाम के लिए भी उनके पसंद के व्यक्ति के सामने चुनाव के लिए खड़ा हो जाये। इसीलिए उन्होंने यह प्रबंध किया कि नितिन नबीन निर्विरोध भाजपा नेता चुन लिए जायेंगे। 
    
निर्विरोध नेता चुन लिया जाना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन यह तभी बुरी बात नहीं होगी जब संबंधित व्यक्ति वास्तव में सबकी पसंद हो और सभी को लगे कि उससे बेहतर कोई और व्यक्ति उस पद पर नहीं हो सकता। लेकिन किसी तानाशाह द्वारा किसी पिद्दी से व्यक्ति को किसी पद पर निर्विरोध चुनवा देना हद दर्जे का मजाक है। और यही मजाक मोदी-शाह ने भाजपा सदस्यों और कार्यकर्ताओं के साथ किया। 
    
वैसे इस तरह के मजाक की भाजपा को आदत है। इसीलिए इसके स्थानीय निकाय के चुनावों में थोक के भाव निर्विरोध नेता चुन लिए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश विधान सभा में भाजपा ने कई सारे विधायक निर्विरोध चुनवा लिए। और वो और उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में सांसद भी निर्विरोध चुनवा लिया। इतनी सारी विपक्षी पार्टियों और महत्वाकांक्षी स्वतंत्र उम्मीदवारों के होते हुए भी निर्विरोध सांसद चुनवा लेना मोदी-शाह के लिए महती उपलब्धि थी। इस प्रयोग के जरिये उन्होंने विश्वास हासिल किया कि कभी जरूरत पड़ने पर इस तरह के निर्विरोध चुनाव के जरिए वे केन्द्र में सरकार बना सकते हैं। 
    
वैसे ‘एक नेतृत्व वर्तते’ वाले संघ परिवार के लिए यह जरा भी सिद्धान्त विरोधी नहीं है। यदि सिद्धान्त एक नेता के पीछे चलने का हो तो एक पार्टी में दो नेताओं को कैसे मान्यता दी जा सकती है। मोदी के रहते भाजपा में कोई दूसरा नेता कैसे हो सकता है? अध्यक्ष कोई भी हो भाजपा को मोदी के हिसाब से चलना होगा और शाह अपनी प्रसिद्ध चाणक्य नीति से इसे सुनिश्चित करते हैं। ऐसे में क्या फर्क पड़ता है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन हैं या नबीन नितिन। बस उसे नितिन गडकरी नहीं होना चाहिए।   

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