धर्मान्धता का शिकार नेपाली जन

/blind-relision-ka-shikar-nepaali-jan

हिन्दू समाज महिलाओं-बच्चियों को देवी के रूप में आदि काल से पूजता आ रहा है। नेपाल में भी बड़ी संख्या में हिन्दू आबादी रहती है। यहां भी प्राचीन काल से हिन्दू देवी तलेजू के अवतार के रूप में 2 से 4 वर्ष की बच्ची को जीवित देवी बनाया जाता है। आज भी इस परंपरा को काठमांडू में उसी तरह अंजाम दिया जाता है। 2017 में कृष्णा शाक्य देवी बनी थी जो इस वर्ष 11 वर्ष की हो गयी और मासिक धर्म आने से उसे उसके माता-पिता के पास भेज दिया गया और गत अष्टमी की तिथि को आर्यतारा शाक्य जो 2 वर्ष 8 माह मात्र की है उसे तलेजू देवी के अवतार के रूप में चुना गया है। सभी लड़कियों को देवी नहीं चुना जाता है। उनमें 12 विशेषताएं देखी जाती हैं :

1. नयी जीवित कुमारी देवी बनने के लिए कुछ नकाबपोश पुरुष भैंसे के रक्त पर नृत्य करते हैं। उनको बिना डरे जो लगातार 1-2 घण्टे देखती रहे। इतने समय तक बिना पलक झपकाये देखने की क्षमता रखती हो इस कठिन परीक्षा पास करने के बाद उनको निम्न मानदण्डों पर भी परखा जाता है। 
2. वह निडर हो, 3. घनी पलकें हों, 4. लाल वस्त्र पहनती हो, 5. एक चोटी बांधती हो, 6. माथे पर तीसरी आंख बनती हो, 7. शांत, 8. निष्पक्ष, निडर दृष्टि 9. अच्छा स्वास्थ्य, 10. शरीर पर कोई निशान न हो, 11. माता-पिता दोनों काठमांडू के रहने वाले हों, 12. शाक्य परिवार से हो, 2 से 4 वर्ष की आयु हो, राष्ट्र की कुण्डली और उसकी कुण्डली मेल खाती हो। 13. लक्षण शंख जैसी गर्दन, भारी पलकें, शांत स्वभाव, निश्छल दृष्टि। 
    
मां से तब तक नहीं मिल सकती जब तक वह देवी है, घर छोड़कर खास खुला घर में रहना होता है, जिसमें आधुनिक विशेष सुविधायें नहीं होती। जब अष्टमी को उनका डोला निकलता है वर्ष में एक बार, तभी उसके मां-बाप उसको देख सकते हैं। डोले में बैठने तक दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। उसको पूजने और पैर छूने के लिए अपार भीड़़ जुड़ी होती है। देवी तलेजू की अवतार कुमारी देवी अपने भक्तों के अतिरिक्त अपने देश के राष्ट्रपति को भी आशीर्वाद देती है। 
    
हिन्दू ही नहीं बौद्ध धर्म के लोग भी उनके दर्शनों को आतुर रहते हैं। पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। 
    
इस तरह आज भी धर्मान्ध लोग वर्षों पुरानी प्रथाओं को ढो रहे हैं। छोटी-छोटी बच्चियों से उनका बचपन ही नहीं मां-बाप भी छिन जाते हैं। उन्हें समाज से अलग एकांत जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। यह धर्मान्धता की पराकाष्ठा है। आज भी ढेरों हिन्दू वैज्ञानिकता से कोसों दूर धर्म के अंधेरों में बच्चियों के भविष्य के साथ खिलवाड कर रहे हैं। जब राष्ट्रपति आशीर्वाद ले तो भला इन कूपमण्डूक प्रथाओं को कौन रोके?
    
समाजवाद में ही केवल सही अर्थों में महिलायें अपने जीवन के समस्त क्षेत्रों में बराबरी पा सकती हैं उसके लिए संघर्ष जरूरी है। 
        -शीला शर्मा, रामनगर 

आलेख

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?