पूंजीवाद/साम्राज्यवाद मुर्दाबाद-निजीकरण हो बर्बाद

/capitalism-imperialism-murdabad-nijikaran-ho-barbaad

साथियो जब किसी देश में धर्मावलंबी, सांप्रदायिक लोग सत्ता में बैठे हां और पूंजीवादी लोगों के इशारे पर अपनी दुम हिलाते हुए उनके मुनाफे के लिए नित नए कानून बनाते हों तब हमें समझ लेना चाहिए कि कर्मचारियां, निविदा/संविदा कर्मियों, मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होने वाला है। ऐसे में उपर्युक्त तीनों प्रकार के कर्मचारियों को अपने क्रांतिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। देश में जब भी मजदूरों पर संकट आए हैं तो उन्होंने अपने संघर्ष के बल पर विजय हासिल की है। 
    
समय रहते विद्युत विभाग के श्रमिक संगठनों को अपने संघर्ष का तरीका बदलना चाहिए। वर्तमान में निविदा-संविदा कर्मियों की संख्या ज्यादा है। बिना संविदा कर्मचारियों के कोई भी लड़ाई नहीं जीती जा सकती।
    
निजीकरण और छंटनी की बात अब कोई नई बात नहीं है। देश में लगातार तमाम संस्थाओं को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। और देश के तमाम ऐसे भी संस्थान हैं जहां कर्मचारियों की संख्या कम करने के लिए छंटनी के नाम पर कार्य से हटाया जा रहा है जिसके चलते कर्मचारी मानसिक तनाव में हैं। तनाव के कारण ही निविदा, संविदाकर्मियों की आए दिन मौतें और आत्महत्याएं हो रही हैं। तनावपूर्ण स्थिति में बिना सुरक्षा उपकरण के काम करने से कर्मचारी अपंगता का शिकार हो रहे हैं। इसका वास्तविक जिम्मेदार कौन है? ऐसा क्यों हो रहा है इस पर विचार करने की जरूरत है। जब किसी देश की सरकार उस देश के श्रमिकों के अधिकारों को खत्म करके नई श्रम संहिताएं लागू करे तो मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होना स्वाभाविक बात है। पूंजीपति वर्ग के इशारे पर चलने वाली सरकारें उनके मुनाफे के लिए कानून बनाती हैं। इसलिए सरकारें जिम्मेदार हैं।
    
विद्युत विभाग के निजीकरण से आम जनमानस को काफी नुकसान झेलना पड़ेगा जैसे कि निजीकरण होते ही बिजली के दाम 20 से 25 प्रतिशत बढ़ जाएंगे और बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी समाप्त हो जाएगी। विभाग के निजी हाथों में जाने से आरक्षण की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। अभी विभाग में वर्षों कार्य कर रहे कर्मचारियों का व्यवहार अच्छा है इसलिए समय से समस्याओं का समाधान हो रहा है। नए कर्मचारी आने से आम जनमानस की काफी मुश्किलें बढ़ेंगी।
    
संविदा कर्मचारी वर्तमान में कई मांगों को लेकर संघर्षरत हैं जिनमें निजीकरण और छंटनी प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने, मार्च 2023 में हटाए गए कर्मचारियों के बकाया वेतन का भुगतान करते हुए उन्हें कार्य पर वापस लेने तथा कर्मचारियों/पदाधिकारियों के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी को वापस लेने, आउटसोर्स कर्मचारी को 60 वर्ष की अवस्था तक कार्य करने की अनुमति प्रदान करने व उन्हें मोबाइल व पैट्रोल भत्ता देने, महिला आउटसोर्स कर्मचारी को मातृत्व अवकाश देने, ई.पी.एफ. में हुए घोटाले की जांच कराने तथा आउटसोर्स कर्मचारी का वेतन रुपए 18,000 निर्धारित करने, आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्य कर रहे कर्मचारियों को मस्टर रोल व्यवस्था के तहत समायोजित करने व उनके स्थानांतरण पर तत्काल रोक लगाने आदि मांगें प्रमुख हैं। 
    
हम सभी को मिलकर विद्युत निजीकरण का विरोध करना और संघर्षरत लोगों का साथ देना चाहिए। 
        -एक विद्युत मजदूर

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि