चंदा चोरों की विदेशी चंदे पर भी नजर

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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एफ सी आर ए संशोधन विधेयक

बीते दिनों केन्द्र सरकार ने संसद में एफ सी आर ए संशोधन विधेयक 2026 पेश किया। जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के मुद्दे पर संसद में मचे हंगामे के चलते सरकार इस सत्र में इसे पास कराने की स्थिति में नहीं थी इसलिए इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। यह समिति शीतकालीन सत्र में इस पर अपनी रिपोर्ट देगी। 
    
एफ सी आर ए संशोधन बिल इस संदर्भ में बने 2010 के कानून में व्यापक संशोधन प्रस्तावित करता है। यह कानून विदेशी चंदे की देखरेख व जांच के संदर्भ में बना था। इस कानून के तहत सरकार ने राष्ट्र विरोधी कृत्यों मंे लिप्त संगठनों, राजनैतिक दलों आदि को विदेशी चंदे हेतु प्रतिबंधित किया था। सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-धार्मिक आदि अन्य क्षेत्रों में कार्यरत संस्थाओं को विदेशी चंदा लेने हेतु एफ सी आर ए पंजीकरण अनिवार्य बना दिया था। इस पंजीकरण का 5 वर्ष में नवीनीकरण होना था। 
    
विदेशी चंदा ज्यादातर एन जी ओ व अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा लिया जाता रहा था। ये एन जी ओ भांति-भांति के थे। इनमें मानवाधिकार, पर्यावरण से लेकर साम्प्रदायिक सौहार्द, स्त्री कल्याण, कानूनी मदद, धार्मिक, शैक्षिक सभी किस्म के संगठन थे। धार्मिक अल्पसंख्यकों में इसाई-मुसलमान धर्मों की धार्मिक संस्थायें प्रमुखता से थी जो शैक्षिक-स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में भी काम करती थी। 
    
ऐसा नहीं था कि एन जी ओ के कामों से दिक्कत पहले की सरकारों में नहीं होती थी। कुडानकुलम परमाणु संयंत्र के आंदोलन के वक्त मनमोहन सिंह ने खुद संघर्षरत संगठनों पर अमेरिका से चंदा लेने का आरोप लगाया था। पर आम तौर पर मोदी काल से पहले सरकारें एन जी ओ और उनके विदेशी चंदे के खिलाफ संगठित अभियान छेड़ने की ओर नहीं गयीं।
    
2014 के बाद से इस मामले में स्थितियां बदलती चली गयीं। मोदी सरकार ने जिस तरह से देश की तमाम संवैधानिक-प्रशासनिक-न्यायिक संस्थाओं में संघी घुसपैठ कर जनता के दमन-उत्पीड़न का क्रूर तांडव शुरू किया। जिस तरह उसने पूरे देश को साम्प्रदायिक वैमनस्य की आग में ढकेला। जिस तरह उसने अल्पसंख्यकों पर हमले-लिंचिंग की। जनता के जनवादी अधिकारों को कुचलना शुरू किया। उससे तमाम एन जी ओ इनकी कार्यवाहियों के विरोध में खड़े होने लगे। ऐसे में मोदी सरकार ने इन एन जी ओ के आर्थिक स्रोतों पर लगाम कसने की ओर बढ़ना शुरू किया। ये एन जी ओ सरकार के इसलिए भी निशाने पर आये कि ये देश के साथ विदेशों में भी मोदी सरकार की असलियत उजागर करने लगे।
    
इन गैर सरकारी संगठनों के विदेशी चंदे पर लगाम कसने के लिए पहले मोदी सरकार ने 2-3 बदलाव 2010 के कानून में किये और अब 2026 में व्यापक बदलाव वाला विधेयक ही ले आयी। पहले के बदलावों में हर बार मोदी सरकार ने राष्ट्र विरोधी कृत्यों पर लगाम लगाने को बहाने के बतौर इस्तेमाल किया। उसने विदेशी चंदे के 50 प्रतिशत तक संस्थाओं के परिचालन में खर्च की छूट को घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया। यानी विदेशी चंदा लेने वाली संस्था अब अपने रोजाना खर्च-वेतन-आफिस-यात्रा आदि पर विदेशी चंदे का अधिकतम 20 प्रतिशत ही खर्च कर सकती थी। इसी तरह व्यवहार में मोदी सरकार ने एफ सी आर ए पंजीकरण बड़े पैमाने पर रद्द करने चालू कर दिये।
    
एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में लगभग साढ़े चैदह हजार संस्थायें एफ सी आर ए पंजीकरण प्राप्त हैं। बीते वर्षों में सरकार 22 हजार संस्थाओं का पंजीकरण समाप्त कर चुकी है और 15000 संस्थाओं का पंजीकरण नवीनीकरण न कराने के चलते समाप्त हो चुका है।
    
2020 में सरकार ने एक संशोधन और कर पंजीकरण रद्द होने पर विदेशी चंदे से प्राप्त परिसम्पत्ति की देख रेख हेतु एक विधायी प्राधिकारी (सरकारी अधिकारी) की नियुक्ति की बात की थी। हालांकि अभी तक सरकार इस दिशा में व्यवहारतः आगे नहीं बढ़़ी थी। अब 2026 के प्रस्तावित संशोधनों के जरिये व्यापक शिकंजा कसने का इंतजाम कर दिया है। 
    
प्रस्तावित संशोधनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी संस्था का एफ सी आर ए पंजीकरण रद्द होने पर उसकी विदेशी चंदे से बनी सारी परिसम्पत्ति विधायी प्राधिकारी के नियंत्रण में आ जायेगी। इस प्राधिकारी पर न्यायिक शक्ति होगी और सरकार पंजीकरण रद्द करने से पहले कोई नोटिस भी नहीं देगी। संस्था जिलाधिकारी के पास 90 दिन में अपील कर सकती है व उसका पंजीकरण बहाल होने पर परिसम्पत्ति वापस संस्था को मिल जायेगी। मजेदार बात यह है कि पंजीकरण यदि आज रद्द होता है तो विदेशी चंदे के दम पर पूर्व में खड़ी की गयी सारी परिसम्पत्ति इस विधायी प्राधिकारी के पास चली जायेगी। यह प्राधिकारी शैक्षिक-स्वास्थ्य-धार्मिक परिसम्पत्ति का इस तरह प्रबंधन करेगा कि संदर्भी गतिविधियां उसमें चलती रहे। शेष परिसम्पत्ति वह बेच कर नीलाम कर सरकारी खजाने में जमा कर सकता है। 
    
एफ सी आर ए पंजीकरण हेतु वर्ष में न्यूनतम 10 लाख रु. विदेशी चंदा लेना व खर्च करना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे कम चंदा नहीं लिया जा सकता। इसी तरह केन्द्र सरकार कभी भी राष्ट्र हित में किसी पंजीकरण को रद्द कर सकती है। कोई व्यक्ति विशेष प्रयोजन हेतु केन्द्र सरकार की अनुमति से बगैर एफ सी आर ए पंजीकरण के भी चंदा ले सकता है। इसी तरह पहले जहां पंजीकरण के उल्लंघन पर संस्थायें दोषी मानी जाती थीं अब उससे संबंध ढेरों व्यक्ति भी दोषी ठहराये जा सकेंगे। सजा पूर्व में घोषित 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दी गयी है। परिवारों द्वारा अप्रवासी भारतीय रिश्तेदारों से प्राप्त राशि इस सबके दायरे में नहीं आती। 
    
इतने व्यापक बदलावों से सरकार ने सारे एन जी ओ, अल्पसंख्यक संस्थाओं पर नकेल कसने का पूरा इरादा कर लिया है। सरकार का इरादा इनकी विदेशी फंडिंग रोकना ही नहीं उनकी समस्त परिसम्पत्तियों पर कब्जा करना है। 
    
यद्यपि राजनैतिक दल, मीडिया संस्थान विदेशी चंदे के लिए पहले से प्रतिबंधित रहे हैं पर अपने से जुड़े एन जी ओ खड़े कर ये सभी विदेशी चंदा हासिल करते रहे हैं। खुद आर एस एस पर भारी मात्रा में विदेशी चंदा लेने का आरोप लगता रहा है। 2014 के बाद संघ-भाजपा ने दक्षिणपंथी-फासीवादी सोच के शैक्षिक-धार्मिक संगठनों का पूरा तंत्र खड़ा किया है।     
    
ऐसे में मोदी सरकार का इरादा स्पष्ट है वह अपने विरोधी राजनैतिक दलों-एन जी ओ-अल्पसंख्यक संस्थाओं को मिलने वाले समस्त विदेशी चंदे को रोकना चाहती है जबकि अपने समर्थक संगठनों को खुले हाथों से विदेशी चंदा लेने देना चाहती है। 
    
तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें भी सरकार के प्रस्तावित संशोधनों का विरोध कर रही हैं। वे इसे संगठन करने की स्वंतत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि मूल अधिकारों पर हमला बता रही हैं।
    
राम मंदिर का चंदा चुराने वालों के मुंह पर चंदे का जादू इस कदर बोलने लगा है कि वो सारा विदेशी चंदा भी खुद ही हड़पना चाहते हैं। इतना ही नहीं वे अपने विरोधियों की विदेशी चंदे से खड़ी सारी सम्पत्ति भी हड़प जाना चाहते हैं। 
    
जहां तक प्रश्न एन जी ओ के खतरे में पड़ने का है तो ये कुछ सामाजिक राहत कर्म कर जनता के गुस्से पर कुछ छींटे डाल पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने का काम कर शासक वर्ग की सेवा करते रहे थे। पर आज जब संघी इनके संगठन बनाने तक के अधिकार को छीनने पर उतारू हैं तो संघी कुकृत्यों के खिलाफ खड़े होना जरूरी है। ‘राष्ट्रवाद’ का चोला ओढ़ने और सारा विदेशी चंदा खुद हड़प जाने की छूट संघ-भाजपा के लंपट संगठनों को नहीं दी जा सकती। 

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