कंबोडिया-थाइलैण्ड टकराव व ट्रम्प

/combodia-thailand-takarav-v-trump

दुनिया में जगह-जगह बढ़ रहे सैन्य टकरावों की कड़ी में बीते दिनों कम्बोडिया व थाइलैण्ड के शासक भी युद्ध में उलझ पड़े। अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति को एक और युद्ध विराम कराने का मौका मिल गया। कुछ दिन टकराव चलने के बाद फिलहाल युद्ध विराम हो गया है। 
    
थाईलैण्ड और कम्बोडिया लम्बे समय से सीमा विवाद में उलझे रहे हैं। ये विवाद फ्रांसीसी शासन के वक्त दोनों देशों की सीमाओं के अलग-अलग नक्शों के चलते इनकी आजादी के वक्त से ही कायम हैं। इन विवादों के चलते इनके बीच पूर्व में भी छिटपुट टकराव हो चुके हैं। सीमा पर स्थित 2-3 मंदिरों पर दोनों देशों के अपने-अपने दावे विवाद की जटिलता को बढ़ाते रहे हैं। ये मंदिर दोनों देशों में अंधराष्ट्रवादी ज्वार पैदा करने वाली ताकतों को भड़काऊ मुद्दा भी देते रहे हैं। 
    
मौजूदा सैन्य टकराव 24 जुलाई को शुरू हुआ। विवाद के पीछे दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हमला शुरू करने का आरोप लगाया। अंततः मलयेशिया की मध्यस्थता में 28 जुलाई को युद्ध विराम समझौता हुआ। तब तक ही जंग में 38 लोग मारे जाने व दोनों पक्षों की करीब 1-1 लाख से अधिक आबादी के विस्थापित होने की खबरें हैं। समझौते में चीनी व अमेरिकी शासकों की भूमिका की बातें भी सामने आ रही हैं। 
    
बड़बोला ट्रम्प फिर खुद को नायक की तरह पेश कर एक और जंग रुकवाने का दावा कर रहा है। 
    
यह टकराव 28 मई की छोटी झड़प जिसमें एक कम्बोडियाई सैनिक मारा गया, से शुरू हुआ। इस झड़प के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के प्रयास किये गये पर वे सफल नहीं रहे। कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन मानेट इसे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय भी ले गये। इसके बाद दोनों पक्षों ने सीमा पर सैन्य जमावड़ा बढ़ाना शुरू कर दिया। 5 जून को द्विपक्षीय वार्ता बेनतीजा रही। 17 जून कंबोडिया ने व्यापार पर कुछ प्रतिबंध लगा दिये। 20 जून को थाईलैण्ड ने कम्बोडिया से अपने राजदूत को वापस बुला लिया। इस तरह तनाव धीरे-धीरे बढ़ते हुए 24 जुलाई को सीधे युद्ध तक जा पहुंचा। 
    
दरअसल यह टकराव दोनों देशों के शासकों द्वारा अपनी-अपनी जनता को युद्धोन्मादी-अंधराष्ट्रवादी माहौल की ओर ढकेलने के लिए किया गया। लम्बा युद्ध लड़ने की किसी भी पक्ष की तैयारी नहीं थी। दोनों पक्षों का इरादा सतत टकराव बनाये रख अंधराष्ट्रवादी उन्माद कायम करना था। इस मामले में दोनों देशों के पूंजीवादी शासक एक हद तक सफल रहे। जनता को अंधराष्ट्रवाद के हल्ले में डुबोने में वे सफल रहे। 
    
अमेरिकी सरगना ट्रम्प अपनी व्यापार बंद करने की धमकी के चाहे युद्ध विराम हेतु जितने ढोल पीटे। वास्तविकता यही है कि युद्ध के लिए दोनों पक्ष कुछ खास तैयार नहीं थे व इसलिए युद्ध कुछ रोज में रुकना पहले से संभावित था। 
    
आंतरिक संकट को हल करने के लिए पड़ोस से युद्ध लड़ना पतित पूंजीवादी शासकों की ऐसी रणनीति रही है जो आज भी काफी इस्तेमाल हो रही है। इसके प्रति जनता को सचेत रहने की आवश्यकता है। 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।