दमन से नहीं थमेगी मजदूर संघर्षों की लहर

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
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गुड़गांव-नोएडा में ठेका मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्ष की लहर को हरियाणा व उ.प्र. पुलिस ने दमन-फर्जी मुकदमे-गिरफ्तारी से खामोश करना चाहा था। फासीवादी संघ-भाजपा को मुगालता था कि क्रूर दमन चक्र से वे मजदूर वर्ग को खामोश कर देंगे। कि वे मजदूर संगठनों को भयभीत कर देंगे। पर संघ-भाजपा की इस समझ को उनके गढ़ कहे जाने वाले राज्य गुजरात में सूरत के मजदूरों ने संघर्ष में उतर कर गलत साबित कर दिया। सूरत के बहादुर मजदूरों ने बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर कर दिखा दिया कि इस वर्ष जो मजदूर संघर्षों की लहर पैदा हुई है उसे दमन से नहीं थामा जा सकता। 
    
सूरत के कपड़ों पर कढ़ाई करने वाले मजदूरों के भीतर अपनी बुरी कार्यपरिस्थितियों को लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा था। 12-12 घंटे हफ्ते में सातों दिन काम उन्हें त्रस्त कर रहा था। ऐसे में 16 अगस्त रविवार के दिन जब मजदूर सड़कों पर उतरे तो उनकी सर्वप्रमुख मांग साप्ताहिक अवकाश की थी। कढ़ाई के एक कारखाने में काम बंद कर मजदूर सड़कों पर उतरे और कढ़ाई की बाकी फैक्टरियों का काम बंद कराते चले गये। देखते ही देखते हजारों की तादाद में मजदूर सड़कों पर थे। मजदूर 8 घंटे काम, साप्ताहिक अवकाश और ओवरटाइम के दोगुने भुगतान की मांग कर रहे थे। 
    
एक बार फिर सत्ता ने दमन के हथकंडे से मजदूरों को खामोश करना चाहा। फैक्टरी मालिकों की तहरीर पर पुलिस ने फर्जी मुकदमे कायम किये। करीब 2 दर्जन मजदूरों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। गुड़गांव-नोएडा सरीखी मनगढंत कहानी यहां भी पुलिस की जुबान पर थी कि मजदूरों ने वाट्सएप ग्रुप के जरिये साथी मजदूरों को दंगा-तोड़फोड़ के लिए भड़काया। कि मजदूरों ने षड्यंत्र रचा। यहां भी पुलिस व मालिकों के गुण्डों ने मजदूरों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। 
    
सूरत के अमरौली इलाके की इन कपड़ा फैक्टरियों में कढ़ाई करने वाले मजदूर ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखण्ड से आते हैं। इनमें से ढेरों मजदूर कुछ वक्त पहले रसोई गैस के दाम बढ़ने पर अपने गांव वापस चले गये थे व हालात कुछ सुधरने पर फिर वापस आ गये। अपने बेइंतहा शोषण के खिलाफ इनके दिलों में आक्रोश तो था पर ये संगठित नहीं थे। इसीलिए इनका धीमे-धीमे इकट्ठा हुआ गुस्सा विस्फोटक रूप ले सड़कों पर उतर पड़ा। 
    
मजदूरों के इन मांगों को लेकर प्रदर्शन-हड़ताल 16 अगस्त के बाद भी कुछ दिनों तक चलते रहे। अंततः 24 अगस्त को पुलिस-श्रम विभाग के अधिकारियों ने 400 से अधिक कम्पनी मालिकों के साथ बैठकें कीं। बैठक के बाद बताया गया कि मजदूरों की ज्यादातर मांगें मान ली गयी हैं। श्रम अधिकारियों ने बताया कि मालिक साप्ताहिक अवकाश, माह के पहले हफ्ते में वेतन पर सहमत हो गये हैं। हालांकि 12 घंटे की जगह 8 घंटे के कार्य दिवस व ओवरटाइम के दोगुने भुगतान की मांग नहीं स्वीकारी गयी। 
    
फिलहाल अधिकतर कारखानों के मजदूर साप्ताहिक अवकाश के आश्वासन पर काम पर वापस लौट गये हैं। इस तरह आंशिक सफलता के साथ संघर्ष फिलहाल थम गया है। 
    
पुलिस मजदूरों के इस संघर्ष के अगुवा मजदूरों को फर्जी मुकदमों में फांस, 3 फर्जी मुकदमे दर्ज कर दमन चक्र को बढ़ा रही है। 500 अज्ञात मजदूरों पर मुकदमे दर्ज किये गये हैं। 
    
सूरत के मजदूर जो मांगें कर रहे थे वे सारी पुराने श्रम कानूनों ही नहीं नयी श्रम संहिताओं के हिसाब से भी कानून सम्मत थीं। 8 घंटे कार्य दिवस, समय पर वेतन, साप्ताहिक अवकाश व ओवरटाइम का दोगुना भुगतान ये सारी बातें नयी श्रम संहिताओं में भी दर्ज हैं। पर सूरत के पुलिस-श्रम विभाग के अधिकारी मालिकों को इन कानून सम्मत मांगों पर भी सहमत नहीं कर पाये। मालिक खुलेआम कहते दिखे कि 12 घंटे के कार्यदिवस में कटौती नहीं हो सकती। कि सूरत में तो हमेशा से ही 12 घंटे का काम चलता रहा है। मालिक कुछ ऐसे बातें कर रहे थे मानो गुजरात अलग ही देश हो जो भारत के कानूनों के दायरे में न आता हो। पुलिस-श्रम विभाग के अधिकारी भी मालिकों को कानून पालन के लिए मजबूर करने के बजाय मजदूरों में षड्यंत्रकारी तलाशने पर सारा ध्यान लगाये हुए हैं। 
    
दरअसल गुजरात में लम्बे वक्त से संघ-भाजपा के शासन ने मजदूरों की ऐसी शोषण की दुनिया रच दी है जहां पूंजीपतियों को सारी मनमानी की छूट मिली हुई है। मालिक कानूनों को न मानने से आगे बढ़कर डंके की चोट पर कहने लगे हैं कि वे इन कानूनी अधिकारों को मजदूरों को नहीं देंगे। ऐसे में मजदूरों के बेइंतहा शोषण-उत्पीड़न को समझा जा सकता है। 
    
गुड़गांव-नोएडा-सूरत का मजदूरों के दमन का पैटर्न अब काफी हद तक साफ हो गया है, कि अब मजदूरों के हर न्यायपूर्ण संघर्ष को एक षड्यंत्र का दर्जा दे कुचलने का प्रयास किया जायेगा। जेल-फर्जी मुकदमों में लपेट कर मजदूरों को खामोश करने का काम किया जायेगा। 
    
मजदूरों के किसी औद्योगिक क्षेत्र में बड़ी संख्या में सड़़कों पर उतर आने की ओर मजदूरों को धकेलने का काम खुद सरकारों ने ही सारे अधिकारों को व्यवहार में बेमानी बना कर किया है। अगर मजदूरों के संगठित हो यूनियन बनाने को अपराध सरीखा मान लिया जायेगा, अगर कारखानों में मामूली आवाज उठाने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया जायेगा, तो मजदूरों का गुस्सा अब इसी तरह के विस्फोटों के रूप में ही सामने आएगा। मोदी सरकार दमन के चाहे कितने भी हथकंडे अपना ले; वो मजदूरों के आक्रोश को फूटने से नहीं रोक पायेगी। खुद मजदूरों का क्रूर दमन भी नये विस्फोटों की शुरूआत कर देगा। 
    
इस वर्ष शुरू हुई मजदूर संघर्षों की लहर मोदी के गृहराज्य तक पहुंच चुकी है। इस लहर को संगठित करना व देशव्यापी एकता के सूत्र में बांधने की जरूरत है। एकजुट हो व क्रांतिकारी चेतना से लैस होकर ही मजदूर वर्ग ऐसे संघर्ष शुरू कर सकता है जो पूंजी व चाकर सरकारों को पीछे धकेल सके। 

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