फ्रांस की राजधानी पेरिस के आस-पास के क्षेत्र इले-डी-फ्रांस से सितम्बर में शुरू हुए ‘लाइसी’ (15-18 वर्ष आयु के छात्र) छात्रों के प्रदर्शन अब पूरे देश में फैल चुके हंै। इन प्रदर्शनों में कर्मचारी व कालेज के छात्र भी शामिल हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों का नेतृत्व 15 से 18 साल के छात्र कर रहे हैं। यह प्रदर्शन सरकारी स्कूलों में कक्षाओं में छात्रों की अधिक संख्या, अध्यापकों की कमी और सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी व बिल्डिंगों की जर्जर हालत के विरोध में हो रहे हैं।
फ्रांस में हो रहे इन प्रदर्शनों के दौरान छात्र फ्रांस की 1789 की महान क्रांति को याद कर रहे हैं जो ‘स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के नारे के तहत हुई थी। इस क्रांति के पोस्टर भी प्रदर्शनों में दिख रहे हैं। फ्रांस में सरकारी शिक्षा इस क्रांति के आदर्शों को एक तरह से पूरा करती रही है जिसमें गरीब व अमीरों के लिए एक से सरकारी स्कूल होते रहे हैं। लेकिन पिछले दशकों में सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर होती गयी है और अमीर व मध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने की ओर बढ़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती यह असमानता लोगों में असंतोष पैदा कर रही है।
फ्रांस में जो निजी स्कूल हैं वे कांन्ट्रेक्ट के आधार पर चलते हैं। इनमें अध्यापकों को वेतन देने का काम तो सरकार करती है और फीस से गैर शैक्षणिक खर्च पूरे किये जाते हैं। कैथोलिक चर्चों की तरफ से इन स्कूलों का संचालन किया जाता है। इन स्कूलों के पास अतिरिक्त अध्यापक भी होते हैं जिसके कारण किसी हड़ताल या अन्य अध्यापकों के छुट्टी लेने पर अमीर बच्चों की शिक्षा पर कोई खास असर नहीं पड़ता है। वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में संसाधनों व वेतन के कारण होने वाली अध्यापकों की हड़ताल से शिक्षा के घंटों में कमी होती है जिसकी वजह से गरीब बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ता है। इसी कारण अमीर लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर निजी स्कूलों में भर्ती करने की तरफ बढ़े हैं।
पिछले दिनों गर्मी में पड़ी भयंकर गर्मी के कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे स्कूलों की जर्जर बिल्डिंग के कारण काफी परेशान हुए हैं। ये बिल्डिंग गर्मी में अत्यधिक गर्म हो गयीं। जाड़ों में भी ये बिल्डिंग अत्यधिक ठंड में छात्रों के बैठने के लायक नहीं होती हैं।
शिक्षकों की कमी के कारण सरकारी स्कूलों में कक्षा में छात्र अधिक होते हैं और विषयों की पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाती है। ऐसे में छात्रों के सीखने के स्तर में भी कमी आती गयी है।
‘लाइसी’ छात्रों के आंदोलन की लहर में अब कालेज भी आते जा रहे हैं। कर्मचारी व कालेज के छात्र उनके समर्थन में हड़ताल और प्रदर्शन कर रहे हैं।
छात्रों के इस आंदोलन में अग्निशामक दल (फायर फाइटर्स) के लोग भी शामिल हुए। इस साल फ्रांस में जंगलों में लगी आग के कारण फायर फाइटर्स पर काम का अत्यधिक दबाव पड़ा और संसाधनों की कमी के कारण इन्हें अत्यधिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
ऐसे में फ्रांस की सरकार 2027 के लिए जो बजट पेश करने जा रही है उसमें 54 अरब यूरो की कमी करने जा रही है। इस बजट कटौती का असर शिक्षा के बजट पर भी पड़ेगा और पहले से ही बदहाल सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश कम हो जाएगी।
छात्रों के हो रहे प्रदर्शनों को पुलिस द्वारा सख्ती से ऐसे निपटा जा रहा है मानो वे दुश्मनों से निपट रहे हैं। अब तक हजारों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है जिसमें से अधिकांश (80 प्रतिशत तक) नाबालिग छात्र हैं। एक प्रदर्शन में तो पुलिस द्वारा ग्रेनेड सीधा छात्र के ऊपर इस्तेमाल किया गया जिससे उसका हाथ उड़ गया। कई और छात्र भी बुरी तरह घायल हुए हैं। इसके बाद जब पुलिस की बर्बरता पर सवाल उठे तो आंतरिक मंत्री लोरेंट नुनेज ने पहले तो इनको नकार दिया और बाद में कहा कि पुलिस द्वारा कठोरता प्रदर्शनकारियों द्वारा की जा रही हिंसा व उपद्रव के जवाब में बरती गयी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने इन प्रदर्शनों को अप्रवासी समस्या और इस्लाम से जोड़ दिया है। जिस तरह ट्रम्प अपने देश में अप्रवासी लोगों को समस्या के तौर पर देखते हैं और मुस्लिमों व काले लोगों को निशाना बनाते हैं वैसे ही वो फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों के लिए बयान दे रहे हैं। ट्रम्प का बयान मूल समस्या से ध्यान भटकाने की कोशिश भर है। लेकिन आंदोलन में शामिल छात्रों ने साफ कह दिया है कि यह आंदोलन शिक्षा में बजट की बढ़ोत्तरी के लिए है।
फ्रांस में अगले 6 महीनों में चुनाव हैं। फ्रांस की दक्षिणपंथी मेरी ली पेन इन आंदोलनों के जरिये फ्रांस की सत्ता पर कब्जा जमाना चाहती हैं। इस आंदोलन में दक्षिणपंथी इसलिए भी शामिल हैं। उनका छात्रों की शिक्षा से कोई मतलब नहीं है। ये पूंजीपति वर्ग के लिए और ज्यादा समर्पित होते हैं।
पूंजीपति वर्ग अपने नारे ‘स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व’ के नारे से कभी का पीछे हट चुका है और घोर प्रतिक्रियावादी हो चुका है। इसलिए आवश्यक है छात्रों का यह संघर्ष 1789 की पूंजीवादी क्रांति से आगे बढ़कर 1871 के पेरिस कम्यून के नारों को अपनाये। पूंजीवादी क्रांति के बरक्स ‘पेरिस कम्यून’, ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ से प्रेरणा पायें।
फ्रांस के इतिहास में छात्रों के आंदोलन
फ्रांस में छात्रों के आंदोलनों का एक गौरवशाली अतीत है। मई 1968 का आंदोलन ऐसा ही एक आंदोलन था। यह फ्रांस के इतिहास का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध छात्र आंदोलन था। पेरिस के नैनटेयर विश्वविद्यालय से शुरू हुआ यह विद्रोह रूढ़िवादी सामाजिक नियमों और राष्ट्रपति चाल्र्स डी गाल की नीतियों के खिलाफ था। इस आंदोलन से जुड़कर करीब 1 करोड़ मजदूर भी हड़ताल पर चले गए थे, जिससे पूरी व्यवस्था ठप सी हो गई थी।
इसी तरह 1986 के सुधार विरोधी आंदोलन में उच्च शिक्षा मंत्री एलन डेवाके के विश्वविद्यालय सुधार विधेयक के खिलाफ छात्रों ने भारी विरोध किया था। पुलिस कार्रवाई में एक छात्र की मौत के बाद प्रदर्शन इतने उग्र हुए कि सरकार को वह विधेयक वापस लेना पड़ा था।
1990 में हाईस्कूल के छात्रों ने भीड़भाड़ वाली कक्षाओं, शिक्षकों की कमी और खराब स्कूल भवनों के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसके बाद 1998 में भी लगभग 2 लाख छात्र बेहतर संसाधनों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे।