पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार एक के बाद एक कई देशों से ‘मुक्त व्यापार समझौते’ करती जा रही है। कुछों से उसका समझौता हो चुका है (जो या तो अभी लागू हो चुका है या लागू होने की प्रक्रिया में है) और कुछों से उसका समझौता होने वाला है। जिन देशों से समझौते हो चुके हैं उनमें स.अरब अमीरात, न्यूजीलैण्ड, यूनाइटेड किंगडम आदि हैं। और जिनसे समझौता होने ही वाला है उनमें सबसे प्रमुख यूरोपीय संघ है। और यूरोपीय संघ के मुख्य कर्ताधर्ता हमारे गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि भी बनाये गये हैं। 26 जनवरी को भारत अपनी सम्प्रभुता का जश्न मनायेगा और 27 जनवरी को उसके एक हिस्से का समर्पण करेगा।
इन मुक्त व्यापार समझौतों को मोदी सरकार अपनी बहुत बड़ी सफलता व उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं। और एक से बढ़कर एक काल्पनिक आंकड़े पेश किये जा रहे हैं। मसलन कहा जा रहा है कि यूरोपीय संघ से समझौते के फलस्वरूप 10 करोड़ का नया रोजगार पैदा हो जायेगा। इस तरह की सब बातें मीठी लोरियां भर हैं। और ये मीठी लोरियां मोदी सरकार के साथ भारत का राष्ट्रीय मीडिया भी सुना रहा है। मीठी लोरियों की तान ऐेसे छेड़ी जा रही है कि भारत के मजदूर-किसान मीठी-मीठी नींद में सो जायें। शासक उनके सोने के बाद जो करना चाहें वह कर सकें। शायद वे किसी दिन जागें तो पायेंगे कि उनका तो सब कुछ लुट चुका है।
‘मुक्त व्यापार समझौतों’ को मोदी सरकार के मंत्रीगण और मीडिया में उनके लगुए-भगुए इस रूप में पेश कर रहे हैं कि इससे व्यापार विविधीकृत, आपूर्ति व्यापक होगी और निवेश, औद्योगिक सहयोग बढ़ेगा। और कुल मिलाकर भारत में दूध की नदियां बहने लगेंगी। हर भारतीय के पास अपनी रोजी-रोटी होगी।
अभी हाल ही में दावोस में चल रहे ‘विश्व आर्थिक मंच’ (वर्ल्ड इकोनिमक फोरम) की सालाना बैठक में यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेमेन ने भारत से होने वाले ‘मुक्त व्यापार समझौते’ के बारे में बेहद उत्साहित होकर इसे ‘मदर आफ आल डील्स’ (सभी समझौते की अम्मा) कहा। इसे ‘असाधारण समझौते’ की उपमा भारत के अखबारों में भी दी जा रही है। यानी यूरोप की साम्राज्यवादी ताकतें भी खुश हैं और भारत के पूंजीपति भी खुश हैं।
ठीक इसी तरह से भारत से हो चुके ‘मुक्त व्यापार समझौते’ से हमारे ऊपर दो सदी तक राज कर चुके ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी खुश हैं। क्योंकि न्यूजीलैण्ड से ‘मुक्त व्यापार समझौता’ हो चुका है तो वहां के साम्राज्यवादी भी खुश हैं। और अभी कुछ दिनों में चिली, पेरू और न जाने कौन-कौन से देश खुश होने वाले हैं। जापान आदि को तो भारत ने बहुत-बहुत दिनों से खुश रखा हुआ है।
जो भारत से खुश नहीं है वह दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश स.रा.अमेरिका है। स.रा.अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आये दिन भारत के प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाता है। खुलेआम कहता है कि मोदी को उसे खुश करना पड़ेगा। ट्रम्प को खुश करने के लिए भारत अमेरिका से गुप्त वार्ताएं कर रहा है। मोदी के मंत्री अमेरिका की ट्रम्प सरकार के मंत्रियों-अधिकारियों से पूरे देश के पीठ पीछे गुप-चुप वार्ताएं कर रहे हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी जो चाहते हैं, उसका कुल मतलब यह है कि पूरे भारत को उनके थाल में सजा कर पेश कर दिया जाये। अमेरिकी साम्राज्यवादी भारत की मोदी सरकार को रोज अपमानित करते हैं। परन्तु अपने आपको भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी कहलाने वाले भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की जुबान से प्रतिकार में एक भी शब्द नहीं फूटते हैं।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने भारत की बांह मरोड़ने के लिए उस पर एक के बाद एक टैरिफ (तटकर) लगाये। इस शुल्क को लगाने का भारत ने कोई भी विरोध नहीं किया। ट्रम्प ने इस बीच भारत को अपमानित करते हुए वहां रहने वाले अप्रवासी भारतीयों की वीजा के उल्लंघन के नाम पर धरपकड़ की और फिर जंजीरों में बांधकर भारत भेज दिया। मोदी सरकार ने इसका कोई भी प्रतिकार नहीं किया। अपने देश के नागरिकों की रक्षा और सम्मान में कुछ नहीं किया। भारत के द्वारा रूस से खरीदे जा रहे सस्ते तेल की आपूर्ति को बंद करवाने के लिए उसने भारत से अमेरिका को निर्यात पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगा दिये। भारत ने अमेरिका का कोई विरोध नहीं किया और चुपचाप रूस से तेल खरीदना लगभग बंद सा कर दिया। अमेरिका इस तरह भारत को धमकाकर-डराकर उससे मुक्त व्यापार समझौता या ऐसा ही कुछ व्यापार समझौता करवाना चाहता है जिससे अमेरिका का भारत के बाजार पर कब्जा या प्रभुत्व कायम हो जाये।
बड़े साम्राज्यवादी देशों से लेकर छोटे-बड़े देशों से इन मुक्त व्यापार समझौतों को कैसे देखा जाए। जहां तक जो देश भारत के समकक्ष अथवा पिछड़े हैं उनसे भारत के पूंजीपतियों को खास लाभ होगा। और इनका मुनाफा बढ़ सकेगा। इस सूरत में भारत के मजदूरों-मेहनतकशों को क्या हासिल होगा। वह कुछ नहीं। बस इतना हो सकता है कि उसको भारत के पूंजीपतियों से अपना शोषण करवाने के लिए वह रोजगार मिल सके जो उसके जिन्दा रहने के लिए जरूरी है।
इसके उलट बड़़ी साम्राज्यवादी ताकतों के साथ व्यापार समझौते का मतलब है कि उनके माल-सेवाओं से भारत का बाजार पूरी तरह से पट जायेगा। जो कि पहले से ही अच्छा-खासा इनके मालों व सेवाओं से भरा पड़ा है। अमेरिकी, जापानी, चीनी, यूरोपीय संघ के साम्राज्यवादी चाहते हैं कि भारत के साथ व्यापार की राह में कोई बाधाएं न हों। और यह हर क्षेत्र में हो। उद्योग, कृषि, सेवा यानी अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में ऐसा हो। कृषि क्षेत्र में मुक्त व्यापार का मतलब होगा कि भारत के छोटे-मझौले और यहां तक कि धनी किसानों के निचले व मध्यम स्तर पर तबाही-बर्बादी के एक नये सिलसिले का शुरू होना। अमेरिका सहित यूरोपीय संघ चाहते हैं कि कृषि से जुड़े उत्पादों, उपकरणों, बीज आदि के व्यापार पर जो पाबंदियां भारत ने लगायी हुयी हैं वह एक झटके में खत्म हों। भारत इन्हें धीरे-धीरे इस ढंग से खत्म करना चाहता है कि किसानों, छोटे उत्पादकों का कोई मुखर विरोध न पैदा हो। और मुख्य बात यही है कि ये मुक्त व्यापार समझौते थोड़े भिन्न रूप में छोटे-मझौली मैन्युफैक्चरिंग, छोटे-मझौले व्यापारियों, छोटी-मझौले किस्म की सेवाएं देने वाले कारोबारियों को तेजी से प्रभावित करेंगे।
‘मुक्त व्यापार समझौते’ का मतलब होगा कि साम्राज्यवादियों की बहुत बड़े पैमाने पर विकसित उत्पादन शक्तियों के सामने भारत जैसे पिछड़े पूंजीवादी देशों की कम या अल्प उत्पादन शक्तियों को निगलने जैसा होगा। यह भारत पर साम्राज्यवाद की जकड़बंदी को और ज्यादा बढ़ा देगा। किसी भी वक्त भारत की बांह मरोड़ना आम बना देगा।
क्योंकि भारत के एकाधिकारी घरानों अम्बानी, अडाणी, टाटा, मित्तल आदि को इन व्यापार समझौते से बड़े लाभ की आशा व संभावना दिखती है तो इसलिए ये भी पश्चिमी साम्राज्यवादियों के जितने ही इनके प्रति उत्साह से भरे समर्थक हैं। यहां इन एकाधिकारी पूंजीपतियों की साम्राज्यवादी देशों के साथ हितों की एकता है। और मोदी सरकार जो इन एकाधिकारी घरानों के रहमोकरम से अस्तित्व में आयी और जिन्दा है तो वह वही कर रही है जो देशी-विदेशी एकाधिकारी घराने करवाना चाहते हैं।
जहां तक भारत के मजदूरों, किसानों व अन्य मेहनतकशों का सवाल है; ये मुक्त व्यापार समझौते उसके शोषण-उत्पीड़न-दमन से भरे कठिन जीवन को और बड़ी मुसीबत में धकेलेंगे। कोई भी विश्व अर्थव्यवस्था का बड़ा संकट त्वरित गति से उनके जीवन और भविष्य को अपने आगोश में ले लेगा। इसलिए जरूरी है कि भारत के मजदूर-मेहनतकश इन व्यापार समझौतों की हकीकत को समझते हुए इनका मुखर विरोध करें। यह विरोध अवश्य ही विश्व साम्राज्यवाद व भारतीय पूंजीवाद के समग्र रूप से खिलाफ होना चाहिए यानी भारत के मजदूरों-किसानों सहित मेहनतकशों को मुक्ति के लिए समाजवादी क्रांति की राह ही पकड़नी पड़ेगी।