कश्मीर से दिल्ली पहुंची पैलेट गन

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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कश्मीर घाटी में हजारों लोगों को बुरी तरह घायल कर चुकी और सैंकड़ों की आंख की रोशनी छीन चुकी पैलट गन अब देश की राजधानी दिल्ली आ पहुंची है। 20 जुलाई को छात्रों-नौजवानों के संसद मार्च के दौरान पुलिस और अर्ध सैन्य बलों ने वाटर कैनन और आंसू गैस के साथ बर्बर लाठीचार्ज ही नहीं किया बल्कि करंट देने वाली शाॅक बैटन और पैलट गन का भी इस्तेमाल किया। 
    
20 जुलाई के दमन चक्र में घायल होने वाले लोगों में से अभी तक तीन ऐसे लोगों की शिनाख्त हुई है जो कि पैलट गन से घायल हुये हैं। ये हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र साहिल, गुड़गांव में नौकरी कर रहे 25 वर्षीय इरशाद शेख और आउटलुक मैगजीन से जुड़े एक 28 वर्षीय पत्रकार।
    
पहले तो नई दिल्ली के डीसीपी (क्ब्च्) ने 20 जुलाई को पैलेट गन के इस्तेमाल की बातों को गलत और भ्रामक बताया; लेकिन, जब उक्त तीन लोगों के पैलट गन से घायल होने की एक तरह से पुष्टि हो गई और इनमें से एक को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मीडिया के सामने पेश कर दिया तो दिल्ली पुलिस के अधिकारी चुप्पी साध गये। इसके बाद सीआरपीएफ (ब्त्च्थ्) ने स्वीकार किया कि उनकी जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि आरएएफ (त्।थ्) के एक जवान ने कनाट प्लेस में पैलट गन से 7 राउंड फायरिंग की है। आरएएफ (त्।थ्) सीआरपीएफ (ब्त्च्थ्) की ही एक यूनिट है जिसका गठन 1992 में किया गया था। 
    
गौरतलब है कि इजराइल ने जिस तरह फिलिस्तीनियों पर बड़े पैमाने पर पैलट गन का इस्तेमाल किया, कुछ उसी तर्ज पर भारत सरकार ने कश्मीर घाटी में इसका इस्तेमाल किया। कश्मीर में सबसे पहले 2010 में इसका इस्तेमाल हुआ। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। इसके बाद 2016 में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में भड़के प्रदर्शनों पर वहां बड़े पैमाने पर पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ। इस दौरान 2016-17 में वहां 6 हजार से अधिक लोग पैलेट गन से घायल हुये थे। इनमें से 7 सौ से अधिक की आंखों में भी इसके छर्रे घुसे थे, और जिस कारण लगभग स्थायी रूप से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। इसके बाद भी कश्मीर में जब-तब पैलेट गन का इस्तेमाल होता रहा है। कश्मीर के अलावा जातीय दंगों की आग में झोंक दिये गये उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर में 2023 में इसका इस्तेमाल हुआ और 2024 में पंजाब-हरियाणा के खनौरी और शंभू बार्डर पर आंदोलनरत किसानों पर इसके इस्तेमाल की खबरें आईं। 
    
पैलेट गन के इस्तेमाल के कुछ नियम हैं कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों और निहत्थे लोगों पर इसका इस्तेमाल नहीं किया जायेगा। इसके बावजूद 20 जुलाई को शांतिपूर्ण संसद मार्च कर रहे निहत्थे छात्रों-नौजवानों पर इसका इस्तेमाल किया गया। इसी तरह नियम है कि पैर के निचले हिस्से में ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन, 20 जुलाई को पैलेट गन से घायल हुये साहिल, इरशाद शेख और आउटलुक मैगजीन के पत्रकार, तीनों के ही कमर से ऊपर, सीने पर, चेहरे और गर्दन पर और साहिल की आंख तक में इसके छर्रे धंसे हुये हैं। नियम-कानूनों की औपचारिकता कागजों की शोभा बढ़ाने के लिये है असल में तो पैलेट गन का इस्तेमाल सत्ता का आतंक और दहशत कायम करने के लिये किया जाता रहा है। 
    
भारत में इसका इस्तेमाल इस तर्क के साथ शुरू किया गया था कि यह कम घातक है। लेकिन, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपने शोध में पाया है कि यह बेहद क्रूर और खतरनाक है, और उसने पैलेट गन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। 
    
जिस कश्मीरी आवाम को ज्यादातर शेष भारत ने कभी अपना नहीं समझा; उसके दुख-दर्द के प्रति कोई सहानुभूति नहीं प्रदर्शित की; उसके दमन का कभी विरोध नहीं किया; उसके संघर्ष को हमेशा सत्ताधारियों के आतंकवाद और सांप्रदायिकता के चश्में से ही देखा; उसी कश्मीरी आवाम को छलनी करने और अंधा बनाने वाली पैलेट गन अब हिंदू फासीवादियों के शासन काल में राजधानी दिल्ली तक भी आ पहुंची है। यह कश्मीरी आवाम के संघर्ष को न समझ पाने, और उसके साथ न खड़े होने, बल्कि कई मामलों में उसके दमन पर खुशियां मनाने की ही शेष भारत को मिल रही एक सजा है।

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