मलिका-ए-तरन्नुम की ‘पहले सी मुहब्बत’

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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बात 1950 के दशक के शुरूआत की है। लाहौर स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में एक सरकारी कार्यक्रम के तहत नूरजहां के गानों का आयोजन था। तब जनरल अयूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे और आयोजन के मुख्य अतिथि। जब एक अफसर ने नूरजहां द्वारा गाये जाने वाले गानों की सूची देखी तो वह घबरा गया। गानों में फैज अहमद फैज की मशहूर नज्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ भी शामिल थी। यह नज्म फैज के 1942 के संकलन ‘नक्श-ए-फरियादी’ में प्रकाशित हुई थी और विद्रोही मानी जाती थी। 
    
सूची में इस नज्म को देख घबराया हुआ अफसर नूरजहां के पास पहुंचा और उनसे दरख्वास्त की कि वे यह नज्म न गायें क्योंकि जनरल साहब नाराज हो जायेंगे। नूरजहां ने इस आग्रह को नहीं माना। उनके लिए यह उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति पर पाबंदी थी जो उन्हें स्वीकार नहीं थी। उन्होंने उस अफसर से कहा कि या तो वे इस नज्म को गायेंगी, नहीं तो उस आयोजन में कोई गाना नहीं गायेंगी। हारकर आयोजकों को नूरजहां की बात माननी पड़ी और नूरजहां ने सैनिक तानाशाह अयूब खान के सामने ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ गाया। 
    
उस समय फैज अहमद फैज हैदराबाद की जेल में बंद थे, उसी अयूब खान की तानाशाही का विरोध करने के जुर्म में। कहा जाता है कि जेल में 14 कैदी एक साथ रेडियो पर नूरजहां द्वारा उस आयोजन में गाये जाने वाले गानों को सुनने के लिए बैठे हुए थे जिसे रेडियो पाकिस्तान पर सीधे प्रसारित किया गया था। इन कैदियों में एक फैज भी थे। जैसे ही सभी ने रेडियो पर नूरजहां की आवाज में ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत’ नज्म सुनी, वे आश्चर्य मिश्रित खुशी से भर गये। फैज ने भावुक होकर यह कहा कि अब से वह गाना उनका नहीं रहा, वह नूरजहां का हो गया है। 
    
नूरजहां सारी जिन्दगी इस विद्रोही नज्म को गाती रहीं। उनके आयोजनों में उनसे इस गाने की निरंतर फरमाइश भी होती रही। इसे 1962 की पाकिस्तानी फिल्म ‘‘कैदी’’ में नूरजहां की ही आवाज में शामिल किया गया। 
    
नूरजहां 21 सितम्बर 1926 को आज के पाकिस्तान पंजाब में एक पंजाबी परिवार में पैदा हुयी थीं। उन्होंने 1930 के दशक से ही गायन और अभिनय शुरू किया और 1940 के दशक के अंत में बम्बईयां फिल्मों में काफी शोहरत हासिल कर ली थी। 1946 में प्रदर्शित महबूब खान (‘मदर इंडिया’ की प्रसिद्धि वाले) की फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ ने उनके गानों की वजह से अपार सफलता हासिल की जिसमें उन्होंने अभिनय भी किया था। 
    
आजादी और विभाजन के बाद नूरजहां पाकिस्तान चली गयीं। लेकिन एक गायिका के तौर पर उनकी शोहरत सरहद के दोनों पार बरकरार रही। पाकिस्तानियों ने उन्हें प्यार से मलिक-ए-तरन्नुम (सुरों की रानी) का खिताब दिया। हालांकि पाकिस्तानी अंधभक्त उन्हें भारत की लता मंगेशकर के बरक्स खड़ा करते रहे पर स्वयं लता ने उन्हें अपना ‘रोल माडल’ बताया। 
    
नूरजहां ने अपनी जिन्दगी में कुल करीब दस हजार गाने गाये। उन्होंने 1951 में पहली पाकिस्तानी महिला निर्देशित फिल्म ‘चन्ना वे’ का निर्देशन भी किया जो काफी लोकप्रिय रही। 
    
बीता 21 सितम्बर ‘मलिका-ए-तरन्नुम’ नूरजहां का सौवां जन्मदिन था। इस अवसर पर ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ के लिए ‘मलिका के तरन्नुम’ को भावभीनी श्रद्धांजलि!

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