ममदानी, राहुल और चुनावी मुद्दे

न्यूयार्क शहर के मेयर के चुनाव में जोहरान ममदानी की जीत ने वाम उदारवादियों को खुशी से पागल कर दिया है। सरकारी वामपंथी भी पर्याप्त खुश हैं। उनकी खुशी किसी हद तक जायज भी है। दक्षिणपंथियों और फासीवादियों के हाथों लगातार थप्पड़ खाने के इस दौर में खुद को ‘जनतांत्रिक समाजवादी’ कहने वाले की जीत पलटकर एक थप्पड़ मारने जैसा ही है। जब ट्रंप से लेकर तमाम अमरीकी अरबपति ममदानी के खिलाफ खड़े हों तो उनकी जीत अपने आप ही ट्रंप एंड कंपनी की हार हो जाती है। 
    
वाम उदारवादियों का यह जश्न 1 जनवरी के बाद भी बना रहेगा, कहना मुश्किल है। ज्यादा संभावना यही है कि मेयर बनने के बाद ममदानी का हाल वही हो जो ग्रीस में सीरिजा का हुआ यानी अरबपतियों के सामने आत्मसमर्पण और मजदूर-मेहनतकश जनता से किए गए अपने वायदों से मुकर जाना। या फिर वे केजरीवाल एण्ड कंपनी की तरह व्यवहार कर सकते हैं- बिजली-पानी के लिए थोड़ा सा काम और ढेर सारा प्रचार। जो भी हो, इतना तो अभी से तय है कि अरबपतियों को खुद उनके ही शहर में पीछे धकेल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
    
लेकिन इसके बावजूद ममदानी की जीत एक सच्चाई की ओर इशारा करती है जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है तथा जिस पर मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए संघर्षरत शक्तियों को ध्यान देना चाहिए।
    
ममदानी ने स्वयं को ‘जनतांत्रिक समाजवादी’ कहा। अमेरिका के वर्तमान धुर-दक्षिणपंथी माहौल में ‘समाजवादी’ उतना ही भड़काऊ है जितना आज के भारत में ‘अर्बन नक्सल’। भारत में ज्यादातर लोग नक्सल का मतलब नहीं समझते, लेकिन तब भी, या फिर इसी कारण से समझते हैं कि अर्बन नक्सल कोई भयंकर चीज है। इसी तरह अमेरिका में ज्यादातर लोग ‘समाजवाद’ का मतलब नहीं समझते। इसीलिए ट्रंप लोगों को बताते हैं कि खुद को जनतांत्रिक समाजवादी कहने वाले ममदानी कम्युनिस्ट हैं। और कम्युनिस्ट तो और भी भयंकर चीज है। इस सबके बावजूद ममदानी चुनाव जीत जाते हैं। 
    
और ममदानी तब भी चुनाव जीत जाते हैं जब वे इस बात को छिपाते नहीं कि वे अप्रवासी मुसलमान हैं तथा फिलिस्तीन के समर्थक हैं। वे खुलेआम कहते हैं कि अगर नेतन्याहू न्यूयार्क आए तो वे उन्हें गिरफ्तार कर लेंगे।
    
आम तौर पर अमरीकी राजनीति के लिए समाजवादी होना, अप्रवासी होना, मुसलमान होना, फिलिस्तीन मुक्ति का समर्थक होना भयंकर बोझ है। इनमें से कोई एक बोझ भी चुनावी जीत के लिए भारी पड़ता है। लेकिन ममदानी इन चारों बोझ के बावजूद जीत गये। इसीलिए डेमोक्रेटिक पार्टी इनसे बचकर चलती है। इन्हीं चारों बोझ के कारण डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतागण नहीं चाहते थे कि ममदानी न्यूयार्क के मेयर पद के लिए उनके उम्मीदवार बनें। लेकिन ममदानी उनके न चाहने के बावजूद उम्मीदवार बने और जीत गये।
    
यह इसलिए संभव हुआ कि ममदानी ने वे मुद्दे उठाए जो अरबपतियों के इस शहर की ज्यादातर आबादी की जिंदगी के वास्तविक मुद्दे थे। दुनिया की वित्तीय राजधानी कहे जाने वाले इस शहर का विशाल बहुमत मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग से बना हुआ है। यह आबादी इस शहर में जिन्दा रहने के संघर्ष से जूझ रही है। ममदानी ने इससे वायदा किया कि मेयर बनने के बाद वह मकानों के किराये में कटौती करेंगे, बस यात्रा मुफ्त करेंगे, बच्चों के किए मुफ्त देख-भाल केन्द्र खोलेंगे तथा राशन की सहकारी दुकानें खोलेंगे। यह वे पूंजीपतियों पर अतिरिक्त कर लगा कर करेंगे।
    
ममदानी के ये वायदे कहीं से भी समाजवाद नहीं हैं। इन्हें अमेरिका के धुर दक्षिणपंथी माहौल में ही समाजवाद कहा जा सकता है। समुद्र पार के यूरोपीय देशों में जहां कल्याणकारी राज्य ज्यादा मजबूत है, वहां इससे मिलती-जुलती चीजें पहले से ही मौजूद हैं। लेकिन अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी यह सब करने का वायदा नहीं कर सकती इसीलिए उसने ममदानी को उम्मीदवार बनने से रोकना चाहा तथा बर्नी सैण्डर्स को तो 2015 के राष्ट्रपति पद के चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने से रोक भी दिया।
    
लेकिन ठीक इसी तरह के वायदों ने ममदानी को चुनाव जिता दिया। लोगों की जिन्दगी की बुनियादी जरूरतें बाकी सारी चीजों पर भारी पड़ीं। यहां तक कि न्यूयार्क के एक तिहाई यहूदियों ने भी ममदानी को वोट दिया।
    
इसका सीधा सा निष्कर्ष निकलता है कि बुनियादी जरूरतें लोगों के लिए सबसे प्रमुख मुद्दा है और किसी विश्वसनीय उम्मीदवार के सामने आने पर लोग अन्य चीजों को दरकिनार कर उसे चुन लेते हैं।
    
अब यह सहज सवाल बनता है कि यदि जिन्दगी की बुनियादी जरूरतें बहुलांश आबादी के लिए सर्वप्रमुख मुद्दा है तथा सामान्य तर्क के हिसाब से सर्वप्रमुख मुद्दा होना भी चाहिए तब ये चुनावों के मुद्दे क्यों नहीं बन पाते? इससे भी आगे ये आम तौर पर ही राजनीतिक मुद्दे क्यों नहीं बन पाते? क्यों इनके बदले जाति, धर्म, नस्ल, भाषा इत्यादि के मुद्दे प्रमुख हो जाते हैं। क्यों सारी पूंजीवादी राजनीति ‘पहचान’ के इर्द-गिर्द घूमती है। क्यों सारे सर्वेक्षणों में लोग अपने देश में रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं पर राजनीति ‘मंदिर-मस्जिद’ या ‘मण्डल-कमण्डल’ के इर्द-गिर्द घूमती है?
    
इस संबंध में सबसे पहली बात तो यही है कि यह स्वतः स्फूर्त ढंग से नहीं हुआ है। यानी यह नहीं हुआ कि पूंजीवादी पार्टियां और नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए भांति-भांति के मुद्दे उठाते रहे तथा जो मुद्दे ‘हिट’ कर गए उस पर उन्होंने अपनी सारी राजनीति केन्द्रित कर दी। इसके बदले शासक वर्गीय पार्टियों की ओर से यह सचेत तौर पर किया गया। उन्होंने सचेत तौर पर बुनियादी मुद्दों को छोड़कर ‘पहचान’ की राजनीति पर केन्द्रित किया।
    
उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में सारी सरकारी नीतियों की एक ही दिशा होनी थी मजदूर-मेहनतकश जनता के जीवन स्तर में कटौती। इसे सरकारी राहत में कटौती के जरिए हासिल किया जाना था तथा पूंजीपति वर्ग को लूट-पाट की छूट देकर। किसी भी पूंजीवादी पार्टी या नेता के सत्ता में आने पर उसे यही करना था। ऐसे में पूंजीवादी पार्टियां और नेता या तो मजदूर-मेहनतकश जनता से उनकी जिन्दगी में बेहतरी का वायदा कर नहीं सकते थे या झूठा वायदा करते। चूंकि झूठा वायदा करना थोड़ा मुश्किल था क्योंकि काठ की हांडी आग पर बार-बार नहीं चढ़ती तो ज्यादा सुरक्षित रास्ता यह था कि भिन्न तरह के मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर दिया जाये।
    
यह अजीबोगरीब है पर सच है कि उदारीकरण-वैश्वीकरण के ठीक उसी दौर में जब मजदूर-मेहनतकश जनता की जिन्दगी बद से बदतर होती गई, पूंजीवादी राजनीति में आर्थिक मुद्दों के बदले पहचान के मुद्दे प्रमुख होते गये। शासक वर्ग और सरकार का सारा ध्यान आर्थिक नीतियों पर होता था पर पूंजीवादी राजनीति लोगों का ध्यान इन नीतियों के बदले पहचान की राजनीति पर केंद्रित करती रही।
    
यह एक योजना के तहत था। इसी योजना के तहत अकादमिक दायरों में पहचान की राजनीति को खूब बढ़ावा दिया गया। यूरोप-अमेरिका से लेकर तीसरी दुनिया के पिछड़े देशों के विश्वविद्यालयों में ‘पहचान’ सबसे ज्यादा फैशन वाला विषय बन गया।
    
शासक वर्ग की इस कुटिल चाल का असर वामपंथी दायरे पर भी पड़ा जिसके लिए माना जाता था कि वहां आर्थिक मुद्दे ही प्रमुख होते हैं। वामपंथियों को आर्थिक मुद्दों को प्रधानता देने के लिए शर्मिंदा किया गया। उन्हें रूढ़िवादी, पिछड़ा कहा गया। अंत में मामला वहां पहुंच गया जहां वामपंथी हलके ने भी समर्पण करना शुरू कर दिया। आर्थिक मोर्चे पर यह स्थिति दिनों-दिन और विकट होते जाने की स्थिति में ‘पहचान’ की राजनीति की ओर ढुलकना किसी हद तक सुविधापरस्ती भी था।
    
ऐसा नहीं था कि पहचान की राजनीति के तहत जिन मुद्दों को उठाया जा रहा था वे आधार विहीन थे। नहीं, उन मुद्दों की सामाजिक जड़ें थीं। जातिगत या नस्ली भेदभाव तथा लैंगिक भेदभाव समाज के प्रमुख मुद्दे थे। लेकिन उन्हें जिस तरह उठाया गया तथा उनके द्वारा जिस तरह बुनियादी आर्थिक मुद्दों को किनारे लगाया गया वह एक कुटिल चाल थी। वह कुटिल चाल अंत में इस रूप में सामने आई कि किसी समाज के सबसे ज्यादा विशेषाधिकार सम्पन्न बहुमत ने ‘पहचान’ की राजनीति में अपना झंडा बुलंद कर दिया। अमेरिका में गोरों को, भारत में हिन्दुओं को तथा तुर्की में मुसलमानों को इस बात पर गोलबन्द किया कि वे खतरे में हैं। इन तीनों देशों में आज ये ही हावी हैं। पहचान की राजनीति हाशिए के लोगों से दबंगों की राजनीति बन गई।
    
आज भी सारी दुनिया में यही चल रहा है। सारी दुनिया में दक्षिणपंथी, धुर-दक्षिणपंथी और फासीवादी शासक वर्ग की सेवा में पहचान की राजनीति का झंडा बुलंद किये हुए हैं। अप्रवासी विरोध या राष्ट्रवाद की आड़ में यही सब चल रहा है। उनके विरोधी भी इसी जमीन पर खेल रहे हैं, क्योंकि यही उनके लिए भी सुविधाजनक है।
    
अपने देश के विशिष्ट संदर्भ में बात करें तो यहां भी वही चल रहा है। जैसा कि पहले कहा गया है, भारत में जनता का हर सर्वेक्षण यह दिखाता है कि यहां बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। लेकिन कोई भी पूंजीवादी पार्टी इस मुद्दे पर केन्द्रित करने को तैयार नहीं है। चुनावों के समय रोजगार देने के फर्जी वायदे तो किये जाते हैं, पर रोजगार पर केन्द्रित नहीं किया जाता। इसी तरह जिन्दगी की अन्य बुनियादी जरूरतों पर केन्द्रित नहीं किया जाता। इसके बदले ‘सामाजिक न्याय’ या जातिगत गोलबंदी केन्द्र में होते हैं। हिन्दू फासीवादियों के लिए ‘हिन्दू खतरे में हैं’ केंद्र में रहता है।
    
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी स्वयं को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है या ज्यादा सही कहें तो नए सिरे से खड़ा करने का प्रयास कर रही है। पर ऐसा वह किसी ‘कल्याणकारी राज्य’ की व्यापक परियोजना के जरिये हासिल नहीं करना चाहती। इसके बदले वह ‘सामाजिक न्याय’ को केन्द्रीय मुद्दा बना कर करना चाहती है। समूचा भारतीय समाज अथाह कंगाली में डूब रहा है। बेरोजगारी विकराल होती चली जा रही है। स्वयं संघी सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने का दावा कर रही है। लेकिन राहुल गांधी की प्रमुख चिंता है कि सचिव स्तर पर दलित और पिछड़े क्यों नहीं हैं। 
    
यह बहुत सुविधाजनक है। कंगाली और बेरोजगारी से सभी को उबारने के लिए पूंजीपति वर्ग से टकराना पड़ेगा। उसको पीछे धकेल कर उसकी आय और दौलत में कटौती करनी पड़ेगी। क्या कोई भी शासक वर्ग की पार्टी और नेता यह कर सकता है? कतई नहीं। और वह पार्टी तो बिलकुल भी नहीं जो आजादी के बाद ज्यादातर समय तक शासक पार्टी रही हो और जिसने स्वयं देश में छुट्टे पूंजीवाद को स्थापित किया हो।
    
ऐसे में राहुल गांधी व कांग्रेस पार्टी के लिए यही सुविधाजनक है कि ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति करें। ‘आर्थिक न्याय की राजनीति’ उनके लिए कतई सुविधाजनक नहीं है।
    
लेकिन जो सुविधा की राजनीति नहीं करना चाहते, जो सचमुच शासक वर्गों से टकराकर मजदूर-मेहनतकश जनता की जिंदगी में बेहतरी लाना चाहते हैं, उनके लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है, इसके सिवाय कि वे बुनियादी आर्थिक मुद्दों को उठाकर उस पर लोगों को गोलबंद करें। इससे भी आगे जाने वालों यानी समाज के क्रांतिकारी बदलाव की चाहत रखने वालों के लिए तो यह ककहरा ही है।

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