ओवरटाइम -भाग 1

हाड़-तोड़ मेहनत और ओवरटाइम

ओवरटाइम

मानव के श्रम ने ही उसे पशुवत जीवन से ऊपर उठाकर उसे मानव समाज का रूप दिया। मानव श्रम ने औजारों का रूप लिया। औजारों ने जीवित मानव के हाथों से मिलकर धरती को छुआ तो धरती ने फसलें उगलीं। फिर शुरू हुआ सभ्यता का दौर। कुछ लोग सभ्यता की सीढी चढ़ते हुए परमेश्वर बन गए। करोड़ों श्रम करने वाले हाथों को असभ्य बताकर पीढ़ी दर पीढ़ी असभ्य करार दे दिया गया। असभ्य लोग भटकने लगे जीवित रहने की खातिर। परंतु समस्त धरा तथाकथित परमेश्वरों की, सभ्य लोगों की मिल्कियत बन चुकी थी। असभ्य करार दे दिए लोगों की जिंदा रहने की एकमात्र शर्त थी हाड़-मांस के बने हुए जिंदा शरीरों में बहने वाली श्रम शक्ति। 
    
15 अगस्त को झंडारोहण सुबह 8 बजे होगा। फैक्टरी की दीवार पर एक सफेद रंग का कागज चस्पा किया हुआ है। 5-6 मजदूर इसे पढ़ रहे हैं। अरे लड्डू खाने आएगा। आकाश ने ठिठोली करते हुए कुलदीप से पूछा? कुलदीप मन ही मन सोच रहा है कि अगर कंपनी उस दिन काम पर बुला ले तो 12 घंटे ओवर टाइम मिल जायेगा, 500 रुपए का ओवरटाइम के एक्स्ट्रा हो जायेंगे। पता नहीं बुलाएंगे कि नहीं। आकाश की बात का कोई जवाब नहीं आता। इस बार रक्षा बंधन से 15 अगस्त पहले पड़ रहा है। सबके जहन में यही सवाल चल रहा है कि उस दिन ड्यूटी लगेगी या नहीं।
    
देश की सत्ता पर बैठे हकीमों के लिए भले ही आजादी के अवसर पर बोलने के लिए बहुत कुछ हो, परंतु कुलदीप जैसे आम मेहनतकशों के लिए वो 12 घण्टे ज्यादा महत्व रखते हैं। एक साधारण मजदूर का जीवन ज्यादा हसरतों भरा नहीं होता। इन साधारण करोड़ों मजदूरों के पास जीवन की सबसे बड़ी खुशी यही ओवरटाइम होता है। जिसके भीतर बच्चों की पढ़ाई, बच्चों के नए कपड़े, छोटी-मोटी शौक की कोई चीज, कभी-कभी थोड़ा बेहतर खाना, सब कुछ समाया रहता है। अभी कुछ ही दिन पहले बूढ़े माता-पिता ने 5000 रुपए मांगे हैं। मन ही मन ओवरटाइम का हिसाब लग जाता है और तय किया जाता है कि पांच तो नहीं 2500 रुपए इस महीने भेज दूंगा। इस महीने ओवरटाइम सही चला है। 15 अगस्त को ओवरटाइम मिल जाए तो अच्छा होगा फिर रक्षा बंधन में भी तो खर्चा होना है। रक्षा बंधन के आगे यहां 15 अगस्त का कोई मोल नहीं होता।
    
टाटा की गाड़ी जानी है, तुम 10 लड़कों को रात में रुकना पड़ेगा। शाम को 5 बजे सुपरवाइजर ने सूचित किया। बेटा! आज तो 1000 रुपए का ओवरटाइम। इस महीने तो 150 घंटे से ऊपर होने वाला है। मोटा भाई मजे लेते हुए कुलदीप से बोला। तो तुम भी कौन सा पीछे रहोगे मोटा भाई? साढ़े पांच फुट की लंबाई और 80 किलो वजन ने ये भारी नाम दिया है टीम लीडर को। जिसका अर्थ गुजरात वाला मोटा भाई नहीं सच का मोटा भाई है। मोटा भाई टीम लीडर हैं। टीम के बाकी लोगों की छोटी-मोटी जरूरतें पूरी कर देते हैं। साथ में बराबर मेहनत से काम करना। सभी लोगों को साथ लेकर चलना। आपस के छोटे-मोटे विवादों को निपटाना। इन्हीं इंसानी गुणों के कारण मोटा भाई का कद ग्रुप में थोड़ा ऊंचा है। कंपनी प्रबंधन द्वारा दी गई जिम्मेदारियों के प्रति निष्ठावान, मोटा भाई।
    
मां-बाप दिन भर घोंसले बनाने के परिश्रम में लगते हैं। खुद के पेट भरने से पहले नन्हें चूजों के पेट भरने का परिश्रम करते हैं। कितना नैसर्गिक है रात में परिवार का एक साथ रहना, सोना। परंतु  इस तथाकथित सभ्य समाज की नींव इस नैसर्गिकता को निर्ममता से कुचल देती है। सामान्य मजदूरों का परिवार इस निर्ममता को ही विधि का विधान मानता है और इस निर्ममता का आदी हो जाता है। तुम लोग खाना खा लेना। फोन पर सूचना देने के बाद कुलदीप निश्चित और रात को मिलने वाले ओवरटाइम को लेकर खुश है। कंपनी का समय सुबह 8 बजे से रात के 8 बजे का है जिसमे 4 घंटे ओवरटाइम शामिल हैं। जीवन का अभाव उस वास्तविकता के रूबरू ले आता है जहां मनुष्य जानता है कि 9000 रुपए की मासिक आमदनी में गुजर करना जीवन को त्रासदी बना देगा। कुलदीप और उसके जैसे मजदूर इन महज 180 रुपए ओवरटाइम की आस में खुद को रोज उन उत्पादन के औजारों को सौंप देते हैं और अक्सर ही वो 12 घंटे बढ़कर 24 और 36 घंटे तक हो जाते हैं।
    
कल गाड़ी होनी है। खाने की पर्ची पर साइन करते हुए सुपरवाइजर ने मोटा भाई को संबोधित किया। टाइम पर गाड़ी दे देना और मेरी तरफ से 200 रुपए की पार्टी कर लेना। खाने की पर्ची तुम्हें दे दी है। दिन का चावल गरम हो चुका है। दिन की बची हुई दाल में दुबारा तड़का मारते हुए कैंटीन वाले ने मोटा भाई को फोन पर सूचना दी, खाना तैयार है खाने आ जाओ। चलो भाई सरकारी खाना खा लो। मोटा भाई ने बाकी मजदूरों को आवाज दी। हंसी-मजाक और खाने को लेकर कैंटीन वाले पर की गई टिप्पणियों के बीच सरकारी खाना खत्म होता है। थोड़ी देर आराम और फिर काम पर सारे मजदूर जुट जाते हैं।
    
250 पार्ट कम हैं, तेजी से हाथ चलाएं तो 6-7घंटे में काम निपट जायेगा। मोटा भाई रात की शिफ्ट का संचालन भी कर रहे हैं। ग्राइंडर से पीस को घिसने का अनवरत क्रम, हाथ की बनी ठेलागाड़ी का लगातार गतिमान रहना, हवा में घुली हुई पेंट और थिनर की गंध और तैयार माल को सिलसिलेवार लाइन में लगाने का क्रम युद्ध स्तर पर जारी है। और ये सिलसिला रात के तीन बजे जाकर खत्म होता है। अपनी औसत क्षमता को तोड़ते हुए निर्धारित उत्पादन पूरा कर लिया गया है। 
    
दिन भर के काम के बाद रात भर की हाड़-तोड़ मेहनत सिर्फ इसलिए होती है कि कुछ घंटे आराम को मिल जाते हैं। रात भर की भीषण थकान को नींद से अधिक प्रिय कुछ नहीं होता। कुछ देर के लिए ही सही, कुछ घंटों के लिए ही सही जीवन की नैसर्गिक जरूरत सब कुछ अपने भीतर समेट लेती है। धूल से सने हुए कपड़ों पर, थकान से टूटे हुए, धूल भरे हुए जिंदा शरीर जब कुछ देर के लिए निस्तब्धता में खो जाते हैं तब रात का अंधेरा चादर बनकर इन जीवित प्राण को अपने आगोश में ले लेता है। 12 घंटे ओवरटाइम मिलने की खुशी नींद को और भी गहरा बना देती है.....शेष अगले अंक में
            -एक पाठक

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