धर्मनिरपेक्षता को छोड़ते बहुसंख्यकवादी राज्य का असली चेहरा -आकार पटेल

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
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राजस्थान का डिस्टर्ब एरिया एक्ट

राजस्थान की बीजेपी सरकार इस सप्ताह गुजरात के अलगाव वाले एक कानून की तर्ज पर ही एक कानून पास करने वाली है। इस बात की संभावना कम ही है कि ज्यादातर भारतीयों को इसके बारे में पता चलेगा क्योंकि मीडिया शायद ही इसके बारे में रिपोर्ट करेगा। आइए देखते हैं कि इसके पीछे क्या हासिल करने की मंशा है।
    
गरीब लोगों को एक साथ ऐसी जगह रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे हम झुग्गी-झोपड़ी कहते हैं। एक जातीय समूह को जबरदस्ती कुछ खास इलाकों में रहने के लिए मजबूर करना घेटो या बस्ती कहते हैं। गरीब लोगों के पास कहीं और जाने का कोई साधन नहीं होता। जातीय समूहों के पास साधन होने पर भी कोई विकल्प नहीं होता। रंगभेद का मतलब है अलगाव और यह दक्षिण अफ्रीका की उस नीति की याद दिलाता है जिसमें काले अफ्रीकियों को खास बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया जाता था। वे कानून के अनुसार केवल तय जगहों पर ही रह सकते थे।
    
अमेरिका में जब 1960 के दशक में कानूनी तौर पर रंगभेद खत्म हुआ, तो सरकार ने फेयर हाऊसिंग एक्ट जैसे कानून पास किए जिनका मकसद अलग-अलग नस्लों को एक साथ लाना था। इसके तहत संपत्ति या मकान आदि खरीदने और बेचने में होने वाले उस भेदभाव को रोका गया, जो नस्लों को अलग रख रहा था। पूरे गुजरात में, सभी बड़े शहरों और कई कस्बों में, बीजेपी सरकार ने इसका उल्टा किया है। गुजरात अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत मुसलमानों को जानबूझकर घेटो या तय बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
    
इस कानून के मुताबिक, शहरों के कुछ खास हिस्सों में नागरिकों को अपनी संपत्ति बेचने या किराएदार बदलने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होती है और उन्हें धर्म के आधार पर जांचा-परखा जाता है। आवेदन में खरीदार और बेचने वाले का नाम होना चाहिए और इसमें एक हलफनामा भी शामिल होता है कि संपत्ति की बिक्री बिना किसी दबाव के और बाजार मूल्य पर हुई है।
    
यह कानून शुरू में कांग्रेस ने पास किया था, और 2009 में, तत्कालीन मोदी सरकार ने इसमें बदलाव करके कलेक्टर या जिलाधिकारी को जांच करने और एक्ट के तहत संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विवेकाधीन शक्तियां दे दीं। जुलाई 2019 में इसमें एक और बदलाव किया गया। पहले, संपत्ति बेचने वालों को अपनी संपत्ति ट्रांसफर करने की इजाजत के लिए आवेदन करना होता था और हलफनामा देकर अपनी सहमति रजिस्टर करनी होती थी। अब, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि बिक्री मर्जी से हुई थी या नहीं, और मालिक को सही कीमत दी गई थी या नहीं। कलेक्टर अपनी मर्जी से प्रापर्टी की बिक्री रोक सकता है, अगर उसे लगता कि ट्रांसफर होने पर ‘डेमोग्राफिक संतुलन में कोई गड़बड़ी’ होगी या ‘किसी समुदाय के लोगों का गलत तरीके से एक इलाके में इकट्ठा होना’ होगा या ‘ध्रुवीकरण की संभावना’ होगी।
    
कलेक्टर इन आधारों पर जांच करने के बाद संपत्ति के कानूनी ट्रांसफर के लिए अर्जी को खारिज कर सकता है। बिना मंज़ूरी के प्रापर्टी ट्रांसफर करने पर सजा बढ़ाकर छह साल जेल कर दी गई (जब यह कानून पहली बार लागू हुआ था, तब यह छह महीने थी)। अब इस कानून ने राज्य सरकार को मोहल्लों में डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर (जनसंख्या में हो रहे बदलाव) पर नजर रखने के लिए एक ‘मानिटरिंग और एडवाइजरी कमेटी’ बनाने की भी इजाजत दे दी है। यह कमेटी कलेक्टरों को सलाह देगी कि बिक्री की इजाजत दी जा सकती है या नहीं।
    
यह कानून वर्तमान में राज्य के तीन सबसे बड़े शहरों, अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत के बड़े हिस्सों में लागू है, और भरूच, कपडवंज, आनंद और गोधरा में भी इस्तेमाल होता है। ये वही जगहें हैं जहां गुजरात के मुसलमान ज्यादा रहते हैं, जिससे वे असल में हमेशा के लिए अलग-थलग पड़ गए हैं। इसका मतलब है कि विदेशी तो गुजरात में ऐसी प्रापर्टी किराए पर ले सकते हैं और खरीद सकते हैं जो भारतीय मुसलमान नहीं खरीद सकते।
    
पिछले सप्ताह राजस्थान मंत्रिमंडल ने भी एक ऐसे कानून को मंज़ूरी दी है जो गुजरात की तर्ज पर है। राजस्थान के कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि ‘‘गलत तरीके से बसी’’ कालोनियों पर नजर रखी जाएगी। इन इलाकों में सरकार की इजाजत के बिना अचल संपत्तियों का ट्रांसफर अमान्य होगा।
    
अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले दूसरे कानूनों की तरह, इस कानून को भी एक लुभावना नाम दिया गया हैः राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के ट्रांसफर पर रोक और परिसर से किरायेदारों को बेदखल करने से सुरक्षा के प्रावधान विधेयक, 2026।
    
इसका असर बिल्कुल वैसा ही होगा जैसा हमने गुजरात में देखा है। ठीक नाजी जर्मनी की तरह यह समुदायों के बीच सामाजिक और कारोबारी या कमर्शियल लेन-देन को गैर-कानूनी बनाता है। राजस्थान कानून के प्रावधानों का उल्लंघन गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है, और इसके लिए पांच साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। प्रापर्टी किराए पर देने पर आपको जेल हो सकती है। राज्य में कांग्रेस इस कानून का विरोध कर रही है, लेकिन उसके पास जरूरी संख्या नहीं है और वह इसे रोक नहीं पाएगी। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा है कि ‘‘डेमोग्राफिक असंतुलन कोई कानूनी शब्द नहीं है। इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि किस आधार पर किसी इलाके को डिस्टर्बड घोषित किया जाएगा। बीजेपी गुजरात माडल को फालो करके सत्ता में बने रहना चाहती है।’’
    
यह सच है कि मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई ऐसे कानूनों के जरिए संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को खोखला कर दिया है, जिनका कोई तीखा विरोध भी नहीं हुआ। अदालतों ने भी इससे मुंह फेरे रखा, विपक्ष बहुत कमजोर है और मीडिया तो आंखें मूंदे ही है।
    
बीफ रखने को अपराध बनाना 2015 में शुरू किया गया था, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र और हरियाणा से हुई। अलग-अलग धर्मों में शादी को अपराध बनाना 2018 में शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत उत्तराखंड से हुई। मुस्लिम तलाक को अपराध बनाना 2019 में हुआ, और साथ ही उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम से खास तौर पर बाहर रखा गया। राजस्थान का कानून इस सिलसिले को आगे बढ़ाता है।
    
कदम दर कदम, एक के बाद एक कानून से, हम एक ऐसे न्यू इंडिया में पहुंच चुके हैं, जो एक बहुसंख्यकवादी राज्य है और धर्मनिरपेक्षता का अपना खोल उतार रहा है।           
        (साभार : नवजीवन)
 

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