शांतिदूत भेड़िए और गाजा

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मिश्र के शर्म अल शेख में गाजा में कथित युद्धविराम को लेकर सम्मेलन निपट चुका है। तकरीबन 20 से ज्यादा देशों के लंपट हुक्मरान इसमें शामिल रहे हैं। जिनके बीच संघर्ष था वही इस कथित शांति सम्मेलन में शामिल नहीं रहे। चीनी और रूसी साम्राज्यवादी शासकों को भी इस सम्मेलन के लिए आमंत्रण था। भारत, चीन और रूस के निचले स्तर के प्रतिनिधि इसमें शामिल रहे। 
    
हमास को कथित शांति सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया। अमेरिकी एवं यूरोपीय साम्राज्यवादियों के फर्जी दावे के मुताबिक हमास आतंकवादी संगठन है इसलिए शांति वार्ता के लिए मान्यता प्राप्त पक्ष नहीं माना जाता। हमास का तर्क है कि सम्मेलन में उनका प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं और उनकी बुनियादी सुरक्षा-राजनीतिक शर्तें (जैसे नाकेबंदी हटाना, हथियार निष्क्रियकरण का विरोध) सम्मिलित नहीं की गईं। बेंजामिन नेतन्याहू ने यहूदी पर्व की आड़ में कथित शांति सम्मेलन से दूरी बनाई।
    
कथित शांतिदूत ट्रंप ने शुरुवात से ही हमास पर पीछे हटने और युद्ध विराम को लेकर दबाव बनाया था। नहीं मानने पर उन्होंने गाजा को तबाह-बर्बाद कर देने की धमकी दी थी। इजरायली शासकों के साथ हर तरह से खड़े अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने नेतन्याहू की नाक में भी नकेल डालने का काम इस बार किया। इस तरह इन दोनों की गैर मौजूदगी में ‘शांति दूत’ भेड़ियों ने ‘शांति’ सम्मेलन निपटा दिया।
    
इस सम्मेलन में युद्ध विराम को छः माह तक बढ़ाए जाने पर सहमति बनी। इजरायली युद्धबंदियों और फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई पर सहमति बनी। गाजा पट्टी में तत्काल भोजन, राहत, पानी पहुंचाने की व्यवस्था किए जाने तथा 2.7 अरब डालर पुनर्निर्माण निधि जुटाने की रूपरेखा बनी।
    
सम्मेलन निपटाने के बाद ट्रंप ने इजरायल की संसद को संबोधित किया। शांति की चादर ओढ़े भेड़िए ने खुद की पीठ थपथपाते हुए इसे ऐतिहासिक सफलता बताया। आगे ट्रंप ने कहा कि युद्धविराम से लंबे और कष्टदायी दुःस्वप्न का अंत हो चुका है; कि सभ्यता के सभी शत्रु प्रतिरोध में पीछे हट चुके हैं। इसके बाद दावा किया कि इजरायल व फिलिस्तीन दोनों के लिए एक नया युग उद्घाटित होने जा रहा है।
    
ट्रंप ने तो पहले ही खुद को शांति का मसीहा घोषित कर दिया था। नोबल पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्था को इतना साहस तो अभी भी नहीं हुआ कि सीधे इस शांतिदूत भेड़िए को शांतिदूत घोषित करके नोबल पुरस्कार दे दे। मगर इजरायल और अमेरिकी साम्राज्यवादियों की घोर समर्थक या एजेंट को शांतिदूत घोषित कर दिया जिसने अपनी बारी में ट्रंप को ही पुरस्कार समर्पित कर दिया।
    
इस तरह गाजा की तबाही-बर्बादी, हजारों मासूम बच्चों की हत्याओं और जनता के कत्लेआम के लिए जिम्मेदार अमेरिकी सरगना अब अपने हितों को इजरायल के जरिए आगे बढ़ा ले जाने पर कथित शांति का जश्न मना रहा है। वास्तव में यह पश्चिमी एशिया में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के दबदबे के फिर से कायम होने का जश्न है। इजरायली शासकों ने अपनी संसद में ट्रंप के भाषण पर जोरदार समर्थन किया। क्योंकि यह सब इजरायली शासकों के किसी भी तरह से विरोध में नहीं था। 
    
मिश्र, कतर, सऊदी अरब, जार्डन, तुर्की आदि के लंपट शासकों के यहां अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ सटे रहने और फिलिस्तीनी जनता के कत्लेआम में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने में अपने हित हैं। इसी को ये आगे बढ़ा रहे हैं। 
    
शर्म-अल-शेख़ के सम्मेलन में शामिल भेड़ियों का मकसद कहीं से भी फिलिस्तीनी जनता की आकांक्षा को स्वर देना नहीं था। इसीलिए गाजा में फिलिस्तीनी जनता को इन्हीं के रहमों करम पर जीना होगा। युद्धविराम की शर्तों में दो राष्ट्र राज्य समाधान पर कोई बातचीत नहीं हुई। गाजा की इजरायल द्वारा की गई नाकेबंदी को (व्यापारिक और नागरिक आवागमन पर प्रतिबंध) पूरी तरह हटाने की मांग को अनसुना किया गया। हमास को हथियार छोड़ने और नष्ट करने के लिए बाध्य करने की कोशिश हुई साथ ही वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी प्राधिकरण जो कि इजरायली कठपुतली है, को ही गाजा का प्रशासक नियुक्त करने का इजरायल ने प्रस्ताव रखा था मगर हमास ने इसे स्वीकार नहीं किया। हमास की इस मांग को भी ठुकरा दिया गया कि गाजा और वेस्ट बैंक में स्वतंत्र चुनाव करवाए जाएं। इस तरह प्रतिरोध के स्वर को दबाकर और कुचलकर इस युद्धविराम के दावे किए जा रहे हैं। 
    
पिछले दो साल में पश्चिमी एशिया के इस क्षेत्र की स्थिति जहां पहुंच चुकी है उसमें यह स्पष्ट है कि अमेरिकी सम्राज्यवादी इजरायली शासकों के जरिए फिर से पश्चिमी एशिया में अपना प्रभाव कायम करने में तात्कालिक तौर पर सफल हो गए हैं। वे रूसी साम्राज्यवादियों को यहां से पीछे धकेल चुके हैं। 
    
गाजा के जरिए अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिमी एशिया में अपने प्रभाव को और आगे बढ़ाने जा रहे हैं। वे रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों को इस पूरे इलाके में पीछे धकेलना चाहते हैं। इसीलिए यह क्षेत्र राजनीतिक, आर्थिक और भूराजनीतिक तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए काफी महत्व ग्रहण कर चुका है। इसी अनुरूप ट्रंप योजना को परवान चढ़ा रहे हैं। जाहिर है इजरायली शासकों के तो अपने फायदे हैं ही। 
    
इसी मकसद से अमेरिका की भूमध्य सागर में नौसेना का छठवां बेड़ा तैनात करने की योजना है। यह गाजा तट की निगरानी के नाम पर होगा। मिश्र और इजरायल की गाजा सीमा पर ड्रोन निगरानी तंत्र खड़ा करने की योजना है। भूमध्य सागर और गाजा में प्राकृतिक गैस, तेल के दोहन की योजना अमेरिकी कंपनीयों की है। पुनर्निर्माण के नाम पर जिसमें शहर और अवरचना, लाजिस्टिक हब का निर्माण होगा उसके लिए 53 अरब डालर का पुनर्निर्माण कोष बनाया जाना है जिसमें विश्व बैंक अमेरिका और यूरोपीय गठबंधन का अधिकार होगा, चीन और रूस को इससे बाहर रखा गया है। गाजा में हमास को अलगाव में धकेलकर फिलिस्तीनी प्राधिकरण को, जो कि इजरायली और अमरीकी इशारे पर नाचता है ,राजनीतिक प्रभुत्व देकर कथित शांति योजना को अमल में लाने की इनकी ख्वाहिश है।

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