स्वदेशी अभियान

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘‘स्वदेशी अभियान’’ में शामिल होने की अपील करते हुए  सूचना प्रौद्योगिकी, रेलवे और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा ‘‘मैं अब जोहो पर काम कर रहा हूं। यह हमारा स्वदेशी प्लेटफार्म है।’’
    
उन्होंने लोगों से भी अपील की कि वे ‘स्वदेशी’ उत्पाद और सेवाएं अपनाएं। आपको पता है यह बात उन्होंने कहां पर पोस्ट की? अमेरिकी सेवा कंपनी ‘‘एक्स’’ ट्विटर (ज्ूपजजमत) पर।
    
एक खबर और - एप्पल का नया फोन, आईफोन 17 सीरीज, 19 सितंबर, 2025 को भारत में बिक्री के लिए उपलब्ध हुआ था। जिसके निचले माडल की कीमत लगभग 83,000 रु. और उच्च माडल की कीमत लगभग 1,35,000 रु. है जिसे खरीदने के लिए 18 तारीख की रात से ही लोग लाइनों में लग गए। इसकी कीमत से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसे मध्यम वर्ग-उच्च मध्यम वर्ग ही खरीद सकता है। और इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भक्त बना हुआ है। मोदी जी के बारे में वह कुछ नहीं सुन सकता। पर अपनी शान शौकत के लिए अब वही मोदी जी के ‘‘स्वदेशी अभियान’’ की लंका लगा रहा है।
 

आलेख

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सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

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लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?