तमिलनाडु के चेन्नई शहर में रिपन बिल्डिंग पर चल रहे सफाई कर्मचारियों के धरने को समाप्त करवाने के लिए 31 अगस्त की रात पुलिस ने हमला किया। शांतिपूर्ण चल रहे इस धरने को ख़त्म करने के लिए पुलिस ने सैकड़ों सफाई मज़दूरों को बंदी बना लिया और औरतों तथा बुढ़े लोगों को जबरदस्ती वहां से हटा दिया। यह सब पुलिस ने कोर्ट के उस आदेश के बाद किया जिसमें कोर्ट ने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन द्वारा जोन 5 व 6 में ठोस कूड़ा उठाने के लिए निजीकरण करने के निर्णय को पलटने से मना कर दिया। पुलिस द्वारा किये इस दमन के बाद तमिलनाडु के लोगों में आक्रोश पैदा हो गया है।
2021 में तमिलनाडु में डी एम के सत्ता में आयी। सत्ता में आने से पहले उसने सफाई कर्मचारियों से उन्हें स्थायी करने, बेहतर वेतन देने और सुरक्षित कार्य दशाएं देने के वादे किये थे। लेकिन सत्ता में आने के बाद वह अपना वायदा भूल गयी। तीन साल पूरा होने के बाद भी आज सफाई मज़दूरों की बुरी स्थिति है। स्थायी करने की फ़ाइलें आज भी कानूनी प्रक्रिया में धुल फांक रही हैं। सफाई के काम को प्राइवेट ठेकेदारों को दिया जा रहा है और मज़दूरों की नौकरी की असुरक्षा बढ़ती जा रही है। एक समय 23,000 रुपये तक कमाने वाले सफाई मज़दूर आज 15,000 रुपये में खर्च चलाने को मज़बूर हैं।
अपनी बुरी होती जा रही परिस्थितियों को सुधारने और सफाई के काम को ठेके में न देने के लिए इन सफाई कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन शुरु किया। इस आंदोलन की वजह से शहर में गन्दगी के ढेर इकट्ठे हो गये। इन गन्दगी के ढेरों को देखकर सरकार में बैठे लोगों को इन सफाई मज़दूरों के कामों का महत्व समझ में आना चाहिए था और उनके जीवन को बेहतर बनाने के बारे में सोचना चाहिए था लेकिन इसके बजाय सत्ता में बैठे लोग इन सफाई मजदूरों पर टूट पड़े। पहले कोर्ट ने उनके खिलाफ आदेश पारित किया और फिर बाकी काम पुलिस ने किया। लाठी-डंडों के दम पर धरना ख़त्म करवा दिया। यह वही पुलिस है जो मजदूरों के पक्ष में कभी कभार आने वाले फैसलों को लागू कराने में कोई रुचि नहीं लेती। हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहती है।
सफाई मज़दूरों के शांतिपूर्ण धरने को हटाने के खिलाफ जनता में जब आक्रोश पैदा होना शुरु हुआ तो सरकार ने उस आक्रोश को थामने के लिए कुछ घोषणाएं की जैसे सफाई मज़दूरों को सुबह का नाश्ता मिलेगा, मकान में सहयोग और इन्श्योरेन्स कवर मिलेगा। लेकिन सफाई मज़दूरों की मुख्य मांग -स्थायी रोजगार की मांग पर कोई बात नहीं की।
चेन्नई की मेयर का सफाई के काम को निजी ठेके पर देने के पीछे तर्क यह है कि निजी हाथों में देने पर काम ठीक से होगा। लेकिन वे यह नहीं बताती कि चेन्नई के 15 में से 10 जोन निजी हाथों में होने के बावजूद उनमें सफाई का स्तर इतना बढ़िया क्यों नहीं है। क्यों चेन्नई का सफाई में 38 वा स्थान है।
हकीकत यही है कि निजी हाथों में जाने पर सफाई मज़दूर् की नौकरी पर हर समय तलवार लटकती रहती है। आमदनी से परिवार का खर्च नहीं चल पाता और सफाई मज़दूर् न अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाता है न परिवार का इलाज करा पाता है। अपनी इन्हीं परिस्थितियों के खिलाफ जब वह संघर्ष में उतरता है तो पूंजीवादी सत्ता के सभी अंग उसको कुचलने को आगे आ जाते हैँ। उनका यह व्यवहार मेहनतकाश जनता में उनके खिलाफ गुस्से और नफरत को जन्म देता है।