उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुये नये खुलासे वीआईपी के रुप में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ़ 'गट्टू' का नाम आने के बाद अब लोग पुन: मामले की सीबीआई जांच की मांग के साथ सड़कों पर उतरने लगे हैं। दूसरी ओर, उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सेंगर की सजा पर रोक लगाने एवं उसे जमानत दिये जाने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले ने भी लोगों को गुस्से से भर दिया है।
ऐसे में उत्तराखंड और उन्नाव की इन दोनों बेटियों को न्याय दिलाने के लिये दिल्ली-एनसीआर से लेकर उत्तराखंड के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन किये गये। इन विरोध प्रदर्शनों में इंकलाबी मज़दूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील भोजन माता संगठन, महिला एकता मंच, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी एवं विभिन्न फैक्ट्री यूनियनों के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।
दिल्ली में शाहबाद डेरी में जुलूस निकालकर और जगह-जगह नुक्कड़ सभायें कर सत्ताधारी भाजपा के पाखंड को उजागर किया गया। वक्ताओं ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश की धामी और योगी की सरकारें कुलदीप सेंगर जैसे दुर्दांत अपराधी और अंकिता भंडारी हत्याकांड में लिप्त भाजपा नेताओं को बचाने में लगी हैं।
फरीदाबाद में अंकिता भंडारी हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ़ 'गट्टू' को गिरफ्तार करने एवं कुलदीप सेंगर की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखने व उसकी जमानत रद्द करने की मांगों के साथ केंद्र सरकार एवं उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश सरकार का पुतला दहन किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि उन्नाव की बेटी के पूरे परिवार को तबाह कर देने वाले कुलदीप सेंगर जैसे अपराधी की सजा पर रोक लगाने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले ने खुद न्यायालय को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।
हरिद्वार में भी केंद्र सरकार एवं उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश सरकार का पुतला दहन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि आज महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा के ज्यादातर मामलों में "महिला सशक्तिकरण" का जुमला उछालने वाली भाजपा के नेता सबसे अधिक शामिल हैं।
रामनगर में कुलदीप सेंगर का पुतला दहन किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि उन्नाव की रेप पीड़िता हो या उत्तराखंड की अंकिता भंडारी दोनों के अपराधी सत्ता से जुड़े लोग हैं। आज बेटियों को सबसे ज्यादा खतरा सत्ता में बैठे लोगों से ही है।
रुद्रपुर में जुलूस निकालकर मोदी सरकार का पुतला दहन किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि ये दोनों घटनायें बता रही हैं कि आर एस एम-भाजपा के हिंदू राष्ट्र में बेटियों कितनी सुरक्षित हैं!
लालकुआं-बिंदुखत्ता में मोदी-योगी-धामी सरकार का पुतला दहन किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि सत्ताधारी भाजपा खुद को सबसे अधिक संस्कारी पार्टी के रुप में पेश करती है जबकि असल में इस पार्टी के नेता सबसे अधिक भ्रष्ट-पतित और महिला विरोधी हैं। आज पूरे देश में इनके कारनामें उजागर हो रहे हैं।
उन्नाव मामले को पूरा समझने के लिए नीचे दिये लेख को पूरा पढ़ें :-
उन्नावः विश्वासघात का एक इतिहास- रामा सुंदरी
उनका जन्म भारत में हुआ था- घोर गरीबी में। उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था, एक ऐसा राज्य जहां सामंती सत्ता और धार्मिक कट्टरता काफी हद तक बेरोकटोक चलती है। उनका जन्म उन्नाव जिले के माखी गाँव में हुआ था, जो कुलदीप सेंगर का पैतृक गाँव था। कुलदीप सेंगर एक धनी व्यक्ति थे, खानदानी राजनेता थे और बिना किसी परिणाम के हर जगह अपना दबदबा कायम रख सकते थे।
उन्होंने सोलह वर्षों तक विधायक के रूप में इस निर्वाचन क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखा था। दो दलों- पहले बसपा, फिर सपा- से गुजरने के बाद, उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले भाजपा को गले लगा लिया। गांव और जिले में सत्ता उनके परिवार के हाथों में ही रहीः उनकी मां ने पचास वर्षों तक ग्राम पंचायत का नेतृत्व किया; उनकी पत्नी उन्नाव में भाजपा की जिला अध्यक्ष थीं; उनकी भाभी माखी गांव की प्रधान के रूप में कार्यरत थीं।
उस लड़की ने ऐसे आदमी का सामना करने का साहस दिखाया। उस लड़ाई में उसने अपने पिता को खो दिया। उसके चाचा जेल चले गए। वह लड़की लंबे समय तक अस्पताल में रही, जीवन और मृत्यु के बीच जूझती रही। उसका जीवित रहना उतना ही अनिश्चित हो गया जितना कि भारतीय लोकतंत्र द्वारा अपने नागरिकों को दी जाने वाली सुरक्षा का दावा। अगर वह उस समय मर जाती, तो कम से कम उसे श्रद्धांजलि तो मिलती। निर्भया कांड के बाद, जिन जागरूक समूहों ने इसे अपना अनुभव मानकर कानून बनने तक संघर्ष किया, वे उसके साथ खड़े नहीं हुए। उसके आसपास के लोग बेहद कमजोर थे। उसका जन्म इस देश के सबसे क्रूर दौर में हुआ था। वह ‘‘बेटी बचाओ’’ के नारे के दौर में बड़ी हुई।
हम लड़कियों को “अच्छा स्पर्श“ और “बुरा स्पर्श“ के बीच अंतर करना सिखाते हैं। लेकिन जब स्पर्श बुरा हो तो एक बेचारी लड़की के पास क्या चारा बचता है? उसके माता-पिता क्या कर सकते हैं जब उन्होंने पंद्रह साल तक उस अपराधी के लिए काम किया हो, उसे भगवान की तरह पूजा हो और पूरी तरह से उसकी दया पर निर्भर रहे हों?
ग्यारह साल की उम्र से ही लड़की विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के घिनौने यौन कृत्यों का शिकार होती रही। वह उसे घंटों अपने कमरे में बंद रखता था और स्कूल जाने से रोकता था। अगर वह बाहर जाती तो उसके आदमी उसे परेशान करते थे। इस पीड़ा को सहन न कर पाने के कारण उसने आठवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़ दिया और घर पर ही रहने लगी।
4 जून 2017 को, जब वह 16 साल की थी, विधायक ने उसे नौकरी दिलाने का वादा करके अपने घर बुलाया। एक साथी के बाहर पहरा देने के दौरान, उसने अपने कमरे में उसके साथ बलात्कार किया। उसकी चीखें गलियारे तक सुनाई दे रही थीं, लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया। उसने धमकी दी कि अगर उसने किसी को बताया तो वह उसके पिता और चार साल के भाई को मार डालेगा। उसने उसके आंसू पोंछे और उसे आश्वासन दिया कि वह उसे अच्छी नौकरी दिला देगा। लड़की घर चली गई और उसने इस घटना के बारे में किसी को नहीं बताया। यह सब उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ की भाजपा सरकार के सत्ता में आने के दो महीने बाद हुआ।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। सात दिन बाद, एक विधायक के तीन रिश्तेदारों ने उसे जबरन अगवा कर लिया। उन्होंने उसे नौ दिनों तक नशीली दवा देकर रखा और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। वे उसे कई जगहों पर ले गए और यहां तक कि उसे 60,000 रुपये में बेचने की कोशिश भी की।
तब तक, उसकी माँ उसकी तलाश में जुट चुकी थी और शिकायत दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन गई। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद, पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, अपनी सामान्य और टालमटोल वाली भाषा का इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि लड़की किसी के साथ भाग गई होगी। नौ दिनों तक, माँ रोज़ पुलिस स्टेशन जाती और वहाँ बैठकर इंतज़ार करती रही। आखिरकार, जब उसकी लगातार कोशिशों की खबर ज़िम्मेदार अधिकारियों तक पहुँची, तो लड़की को रिहा कर दिया गया।
पुलिस ने बाद में दावा किया कि 20 जून (2018) को उन्होंने बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले अधिनियम (च्व्ब्ैव् ।बज) के तहत, साथ ही सामूहिक बलात्कार और अपहरण के आरोपों के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि, उन्होंने इस बात का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया कि लड़की को रिहा किए जाने के पांच दिन बाद तक उसकी चिकित्सा जांच क्यों नहीं की गई।
इसके बाद पीड़िता उन्नाव से दिल्ली जाकर अपने चाचा के घर रहने लगी। वहीं उसने पहली बार अपनी चाची को विधायक द्वारा किए गए हमले के बारे में बताया। चाची के माध्यम से ही परिवार को कुलदीप के कारनामों के बारे में पता चला। क्रोधित होकर उसके पिता विधायक के आवास पर गए, लेकिन उन्हें पता चला कि विधायक उस समय वहां मौजूद नहीं थे।
पिता अपनी बेटी को दिल्ली से वापस ले आए और अगस्त में उन्होंने उन्नाव पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की। एक बार फिर, पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया। अधिकारियों की लगातार निष्क्रियता से निराश होकर, लड़की ने मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर बताया कि उसकी शिकायत को नजरअंदाज किया जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने पत्र को उन्नाव जिला अधिकारियों को भेज दिया और मामले से पल्ला झाड़ लिया।
इसके बाद उसने न्याय की मांग करते हुए अदालत का रुख किया। हालांकि, आठ महीने बीत जाने के बाद भी मामला दर्ज नहीं हुआ। इस दौरान परिवार को लगातार धमकियों का सामना करना पड़ा। लड़की के पिता, पप्पू सिंह (उर्फ सुरेंद्र सिंह), पर माखी गांव में बेरहमी से हमला किया गया। हमलावरों में कुलदीप सिंह का भाई अतुल सिंह भी शामिल था।
इसके बाद पप्पू सिंह पर शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया गया। जब दोनों पक्षों ने प्रतिद्वंद्वी बनकर मामले दर्ज कराए, तो पुलिस ने, शक्तिशाली लोगों का पक्ष लेने की अपनी पुरानी प्रथा के अनुसार, लड़की के पिता को शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इस निरंतर उत्पीड़न को सहन न कर पाने के कारण पीड़िता और उसके परिवार ने 8 अप्रैल को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के आवास के बाहर आत्मदाह का प्रयास किया।
इन घटनाओं से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक व्यवस्था, पुलिस और कानून-व्यवस्था तंत्र की कार्यप्रणाली का पर्दाफाश हो गया। दो दिन बाद, 10 अप्रैल को, अतुल सिंह, पुलिस और अन्य लोगों द्वारा किए गए हमलों में लगी चोटों के कारण लड़की के पिता की हिरासत में मौत हो गई।
उन दो दिनों के दौरान, कुलदीप सिंह के भाइयों ने पुलिस की मदद से उन पर बेरहमी से हमला किया ताकि वे मुकदमा वापस ले लें। उनकी हालत गंभीर होने पर ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहां उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए उन लोगों के नाम बताए जिन्होंने उन पर हमला किया था, जिनमें कुलदीप सिंह का भाई अतुल सिंह भी शामिल था। उन्होंने बताया कि जब अतुल सिंह उन्हें पीट रहा था, तब मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी खड़े होकर देखते रहे, लेकिन उनकी मदद के लिए आगे नहीं आए।
उनकी मृत्यु के बाद, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर चौदह चोटें दर्ज की गईं और पता चला कि उनकी आंतें फट गई थीं।
इन घटनाओं के जवाब में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग से स्पष्टीकरण मांगा। आयोग ने सवाल उठाया कि हिरासत में हुई मौत की सूचना अनिवार्य रूप से 24 घंटे के भीतर आयोग को क्यों नहीं दी गई। एनएचआरसी ने लड़की के परिवार को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने का भी निर्देश दिया।
इसके बजाय, पुलिस ने परिवार को एक होटल के कमरे में बंद कर दिया और दावा किया कि वे जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर कार्रवाई कर रहे हैं। सुरक्षा के नाम पर, उन्हें प्रभावी रूप से हिरासत में रखा गया और घर से बाहर निकलने से रोक दिया गया। परिवार को भोजन और पानी तक नहीं दिया गया।
‘पुलिस ने मेरे घायल पिता को अस्पताल ले जाने के बजाय हिरासत में ले लिया, और उनकी मौत के लिए वे भी जिम्मेदार हैं। मैं यह लड़ाई हार गई हूँ। मुझे इस आदमी के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठानी चाहिए थी। कम से कम मेरे पिता तो आज जीवित होते,’ पीड़ित ने कहा।
उस समय लड़की ने मांग की कि मामला सीबीआई को सौंप दिया जाए।
इन सबके बावजूद विधायक के खिलाफ बलात्कार का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। पप्पू सिंह पर हमले में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ हत्या का आरोप लगाया गया, जबकि विधायक के भाई अतुल सिंह, जिसने पप्पू सिंह की पिटाई की थी, को इस मामले से बरी कर दिया गया।
प्रक्रियात्मक नियमों का हवाला देते हुए पुलिस ने कहा कि घटना और शिकायत दर्ज करने के बीच तीन महीने से अधिक का अंतराल होने पर मामला दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य है। तदनुसार, पुलिस ने जांच करने के लिए एक विशेष/स्थायी जांच दल (एसआईटी) का गठन किया।
उत्तर प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक आनंद कुमार ने आगे कहा कि लड़की के बयान में ’कई विसंगतियां’ थीं, और जब किसी ’सम्मानित विधायक’ के खिलाफ इस तरह के गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो सभी पहलुओं की बहुत सावधानी से जांच की जानी चाहिए।
इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल स्वरूप चतुर्वेदी ने इस मामले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ध्यान में लाया और उससे मामले का स्वतः संज्ञान लेने तथा निष्पक्ष जांच का आदेश देने का आग्रह किया। न्यायमूर्ति डीबी भोसले और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की खंडपीठ ने सामूहिक बलात्कार के आरोप का संज्ञान लिया और निर्देश दिया कि पप्पू सिंह के शव का अंतिम संस्कार न किया जाए। पीठ ने इस मामले में राज्य सरकार का पक्ष भी जानना चाहा। हालांकि, तब तक पप्पू सिंह का अंतिम संस्कार हो चुका था।
अदालत के हस्तक्षेप के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने आखिरकार कार्रवाई की और विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश जारी किए। लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले के साथ-साथ उसके पिता की हिरासत में मौत से संबंधित मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। तीन जेल डाक्टरों और चार पुलिस कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया गया। ये घटनाक्रम लड़की द्वारा अपनी शिकायत दर्ज कराने के लगभग नौ महीने बाद हुए।
एफआईआर दर्ज होने के बावजूद विधायक को गिरफ्तार नहीं किया गया। 12 अप्रैल को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बार फिर हस्तक्षेप करते हुए सवाल उठाया कि उन्हें हिरासत में क्यों नहीं लिया गया। न्यायालय ने सरकार को दोपहर के भोजन अवकाश से पहले इस मामले पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया। उस समय तक मामला एसआईटी और सीबीआई दोनों के दायरे में था।
राज्य की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह ने अदालत को बताया कि कुलदीप सिंह के खिलाफ कोई सबूत नहीं है और न ही यह साबित करने का कोई प्रमाण है कि उसने बलात्कार किया है।
हालांकि, अदालत ने इस रुख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार, डाक्टरों और पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों को बचाने के लिए मिलीभगत की थी। अदालत ने टिप्पणी की, ‘‘इसके बावजूद, आप उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई किए बिना आगे की जांच की मांग कर रहे हैं।’’
पीठ ने आगे टिप्पणी की, ‘यदि पुलिस इसी तरह का व्यवहार करती रही, तो पीड़ित न्याय के लिए किसके पास जाएंगे? यदि ऐसी प्रथाएं जारी रहीं, तो हमें यह निष्कर्ष निकालने के लिए विवश होना पड़ेगा कि राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है।’
जहां इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिम्मेदारी की भावना से प्रतिक्रिया दी, वहीं सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया बिल्कुल विपरीत थी। पुलिस द्वारा सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी का हवाला देते हुए और उन्नाव बलात्कार मामले में भी इसी तरह की स्थिति का जिक्र करते हुए, अधिवक्ता एमएल शर्मा ने सीबीआई जांच की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की।
न्यायमूर्ति एस.ए. बोबड़े और न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में जनहित याचिकाएं स्वीकार्य नहीं हैं। सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिका खारिज करने से पहले एक अपमानजनक प्रश्न पूछा - ’क्या आपके परिवार में किसी का बलात्कार हुआ है?’
उच्च न्यायालय, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और नागरिक समाज समूहों के बढ़ते दबाव से...... अंततः अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 13 अप्रैल, 2018 को कुलदीप सिंह सेंगर को हिरासत में ले लिया गया।
यह घटना ऐसे समय घटी जब कठुआ में आठ वर्षीय आसिफा के बलात्कार और हत्या को लेकर देशभर में आक्रोश फैल चुका था। जन जागरूकता के इस माहौल में उन्नाव मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर गहन ध्यान आकर्षित किया। .......
जनता के भारी दबाव के कारण उत्तर प्रदेश सरकार के पास कोई और विकल्प नहीं बचा था। सरकार के आदेश पर सीबीआई ने हस्तक्षेप किया और कुलदीप सिंह के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।
लड़की के चाचा ने इन घटनाक्रमों पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अगर अधिकारियों ने थोड़ी देर पहले ही कार्रवाई की होती, तो उनका भाई आज भी जीवित होता। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका और सरकार पर उनका विश्वास और मजबूत हुआ है। साथ ही, उन्होंने अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी जान को खतरा है।
पीड़िता के परिवार द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर को उन्नाव जेल से स्थानांतरित करने की याचिका पर कार्रवाई करते हुए, अदालत ने उन्हें सीतापुर जेल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। इसी बीच, लड़की की मां ने अदालत में याचिका दायर कर अपने पति के खिलाफ हथियार का मामला दर्ज कराने वाले पिंकू सिंह की पहचान उजागर करने की मांग की।
21 मई को सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपनी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। 25 मई को उसने उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। जहाँ एक ओर आम जनता को लग रहा था कि मामला सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पीड़िता का परिवार वास्तव में अपने जीवन के निरंतर खतरे में जी रहा था।
जेल से कुलदीप सिंह लड़की के चाचा को लगातार धमकी भरे फोन करता रहा। माँ घर से बाहर निकलने से डरती थी। पीड़िता के अलावा, उसे तीन बेटियों और एक छोटे बेटे की देखभाल भी करनी थी। उसने कहा, ’उसके आदमी हर जगह हमारा पीछा कर रहे हैं।’ परिवार को गाँव से कोई समर्थन या सहानुभूति नहीं मिली; पप्पू सिंह के अंतिम संस्कार में एक भी ग्रामीण नहीं आया।
12 जुलाई को परिवार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर सुरक्षा की गुहार लगाई और बताया कि विधायक के भाई उनकी जान को खतरा दे रहे हैं। इसी पत्र की एक प्रति उन्नाव पुलिस के सर्किल इंस्पेक्टर को भी सौंपी गई। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बजाय, उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपना वही पुराना बहाना दोहराया - परिवार से ’समझौता करने और मामले को समाप्त करने’ का आग्रह किया।
इसी बीच, लड़की के चाचाकृजो इस समय परिवार के एकमात्र सहारा थेकृको एक झूठे मामले में गिरफ्तार कर लिया गया, जिसे परिवार ने झूठा करार दिया। उन्हें इस बहाने हिरासत में लिया गया कि अठारह साल पहले उनके पैतृक गांव मखी में पंचायत चुनाव के दौरान हुई गोलीबारी की घटना में उनके पास हथियार थे। गौरतलब है कि उन्हें दिल्ली में गिरफ्तार किया गया, जहां वे रह रहे थे। यह गिरफ्तारी उन्नाव और दिल्ली पुलिस के संयुक्त अभियान में हुई।
लगभग उसी समय, लड़की के पिता पप्पू सिंह की हत्या के मामले में अहम गवाह यूनुस अहमद की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। हालांकि उनके चाचा ने इस मौत को लेकर गंभीर चिंता जताई, लेकिन किसी भी अधिकारी ने उनकी आशंकाओं पर ध्यान नहीं दिया।
पिता की मृत्यु हो जाने, चाचा के जेल में होने और उन्नाव मामले को दुनिया द्वारा धीरे-धीरे भुला दिए जाने के बावजूद, आरोपी परिवार को नहीं भूला था। पीड़िता अपनी चाची के साथ रायबरेली जेल में बंद चाचा से मिलने जा रही थी, तभी उनकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में चाची (चाचा की पत्नी) और बहन की मौत हो गई।
पीड़िता और उसके वकील गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें लखनऊ के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वे जीवन-मरण के बीच जूझ रहे हैं। परिवार को मजबूरन विरोध प्रदर्शन करना पड़ा और मांग करनी पड़ी कि चाचा को हिरासत से अस्थायी रूप से रिहा किया जाए ताकि वह अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार कर सकें।
भाजपा द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर को उस दिन तक पार्टी से निष्कासित न करना ही ’बेटी बचाओ’ नारे की परिभाषा को स्पष्ट करता है। जिस समय पीड़िता वेंटिलेटर पर जीवन के लिए संघर्ष कर रही थी, उसी समय भारतीय संसद में तीन तलाक विधेयक पारित हो गया।
अपने पतियों से मुस्लिम महिलाओं की रक्षा करने का दावा करते हुए, भाजपा अपने ही विधायक के अपराधों का समर्थन कर रही है, अपराधियों को पनाह दे रही है, बलात्कारियों और हत्यारों को पुलिस तंत्र के सहयोग से बढ़ावा दे रही है। भाजपा उनका साथ दे रही है और उन्हें संरक्षण दे रही है।
पीड़ित के परिवार को मंडरा रहे गंभीर खतरे को देखते हुए, अदालत ने मामले को उत्तर प्रदेश से दिल्ली की एक निचली अदालत में स्थानांतरित कर दिया।
उन्नाव पीड़िता के समर्थन में चले निरंतर जन आंदोलनों और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के आवास के बाहर आत्मदाह करने के उसके हताश प्रयास ने न्याय की प्रक्रिया पर निर्णायक प्रभाव डाला। मार्च 2020 में, निचली अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
हालांकि, 2019 की सड़क दुर्घटना में जीवित बचे व्यक्ति की चाचियों की मौत को संदिग्ध मामले के रूप में नहीं लिया गया।
साढ़े सात साल जेल में बिताने के बाद, 23 दिसंबर 2025 को उसी दिल्ली अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की सजा रद्द कर उन्हें जमानत दे दी। अपनी जान के खतरे को भांपते हुए पीड़िता की मां ने कार्यकर्ता योगिता भयाना के साथ दिल्ली अदालत के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने उन्हें जबरन अदालत परिसर से हटा दिया।
दिल्ली की अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को इस आधार पर रद्द कर दिया कि वह “लोक सेवक“ नहीं था और इसलिए उस पर पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 5(सी) लागू नहीं होती। हालांकि, पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 5(सी) को हटा देने पर भी, वह इसी अधिनियम की धारा 4 के तहत उम्रकैद का पात्र बना रहता है। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत भी उसके द्वारा किए गए बलात्कार के अपराध में उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।
हालांकि निश्चित अवधि की सजाओं को रद्द करना असामान्य नहीं है, लेकिन आजीवन कारावास की सजा को रद्द करना अत्यंत दुर्लभ है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि एक बार किसी व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुना दी जाए तो उसे बाद में निर्दोष नहीं माना जा सकता। इस संदर्भ में, यह असाधारण है कि उनकी सजा को केवल इस संकीर्ण आधार पर रद्द कर दिया गया कि उन पर पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 5(सी) लागू नहीं होती।
उच्च न्यायालय का आदेश अपराध की गंभीरता और पीड़ित पर इसके प्रभाव को नजरअंदाज करता है। इन पहलुओं को महत्वहीन बनाकर, यह निर्णय उन मामलों में सजा को निलंबित करने के दृष्टिकोण के बारे में चिंताजनक प्रश्न उठाता है जिनमें अत्यधिक गंभीरता, सत्ता का घोर दुरुपयोग और स्पष्ट धमकी शामिल हैं।
भाजपा नेताओं का इस फैसले का बचाव करने के लिए तुरंत आगे आना, मानो कोई अपराध हुआ ही न हो और खुलेआम आरोपियों का समर्थन करना बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है।
अब आवश्यकता उन विरोध प्रदर्शनों की है जो बिल्किस बानो मामले में सजा की माफी को चुनौती देने वाले विरोध प्रदर्शनों से कहीं अधिक सशक्त हों।.....
साभार : काउंटर करंट.ऑर्ग